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Supreme Court: मणिपुर हिंसा मामले में कोर्ट ने सीबीआई से मांगी स्थिति रिपोर्ट, पुनर्वास पर दिए ये निर्देश
Fri, 13 Feb 2026 05:37 PM IST
अमन तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंफाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंफाल
Published by: अमन तिवारी
Updated Fri, 13 Feb 2026 05:37 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर हिंसा की जांच कर रही सीबीआई से दो हफ्ते में स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि अब मणिपुर या गुवाहाटी हाई कोर्ट इन मामलों की निगरानी करें। साथ ही, सरकार को पीड़ितों के पुनर्वास के लिए बनी कमेटी की सिफारिशें जल्द लागू करने का आदेश दिया है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मणिपुर में 2023 में हुई जातीय हिंसा के मामलों पर सुनवाई की। कोर्ट ने सीबीआई को आदेश दिया कि वह जातीय हिंसा से जुटी 11 एफआईआर की जांच पर दो हफ्ते के अंदर स्टेटस रिपोर्ट पेश करे। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने एक महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के बजाय मणिपुर हाई कोर्ट या गुवाहाटी हाई कोर्ट को इन मामलों के ट्रायल और जांच की निगरानी करनी चाहिए। बेंच के अनुसार, मणिपुर हाई कोर्ट में अब नए चीफ जस्टिस आ चुके हैं, इसलिए वे स्थानीय हालात को बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं।
कोर्ट ने दिया निर्देश
कोर्ट ने केंद्र और मणिपुर सरकार को निर्देश दिया कि वे जस्टिस गीता मित्तल कमेटी की सिफारिशों को हर हाल में लागू करें। यह कमेटी पीड़ितों के पुनर्वास और उनके कल्याण के लिए बनाई गई थी। इस कमेटी में तीन पूर्व महिला जज शामिल हैं, जो अब तक पीड़ितों की मदद के लिए कई रिपोर्ट सौंप चुकी हैं।
मणिपुर में मई 2023 से शुरू हुई हिंसा में अब तक 200 से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं। हजारों लोग बेघर हुए हैं और कई घायल हुए हैं। यह हिंसा तब भड़की थी जब मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग के खिलाफ प्रदर्शन किया गया था।
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ये भी पढ़ें: RERA: सुप्रीम कोर्ट ने रेरा को लगाई कड़ी फटकार, कहा- वह सिर्फ दिवालिया बिल्डरों के लिए काम करता है
सुनवाई के दौरान क्या बोले वकील?
सुनवाई के दौरान पीड़ित की तरफ से पेश हुईं वकील वृंदा ग्रोवर ने एक पीड़ित महिला का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि गैंगरेप की शिकार एक कुकी महिला की पिछले महीने सदमे और बीमारी से मौत हो गई। वकील ने आरोप लगाया कि सीबीआई ने चार्जशीट के बारे में कोई जानकारी नहीं दी और मुख्य आरोपी भी कोर्ट में पेश नहीं हो रहा है। उन्होंने जांच में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया। इस पर सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि मणिपुर में अब हालात पहले से बेहतर और शांतिपूर्ण हैं।
26 फरवरी को अगली सुनवाई
चीफ जस्टिस ने कहा कि पीड़ितों को मुफ्त कानूनी मदद मिलनी चाहिए। अगर स्थानीय स्तर पर वकील उपलब्ध नहीं हैं, तो गुवाहाटी बार से वकील भेजे जा सकते हैं। वहीं, वकील कॉलिन गोंसाल्वेस ने शिकायत की कि उन्हें कमेटी की रिपोर्ट नहीं मिल रही है, जिससे पुनर्वास का काम धीमा पड़ा है। कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट में कुछ संवेदनशील जानकारी हो सकती है, इसलिए उसे सावधानी से साझा किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले पर 26 फरवरी को अगली सुनवाई करेगा। कोर्ट ने जस्टिस गीता मित्तल कमेटी का कार्यकाल भी 31 जुलाई तक बढ़ा दिया है ताकि राहत कार्य जारी रह सके।
अन्य वीडियो-
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कोर्ट ने दिया निर्देश
कोर्ट ने केंद्र और मणिपुर सरकार को निर्देश दिया कि वे जस्टिस गीता मित्तल कमेटी की सिफारिशों को हर हाल में लागू करें। यह कमेटी पीड़ितों के पुनर्वास और उनके कल्याण के लिए बनाई गई थी। इस कमेटी में तीन पूर्व महिला जज शामिल हैं, जो अब तक पीड़ितों की मदद के लिए कई रिपोर्ट सौंप चुकी हैं।
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मणिपुर में मई 2023 से शुरू हुई हिंसा में अब तक 200 से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं। हजारों लोग बेघर हुए हैं और कई घायल हुए हैं। यह हिंसा तब भड़की थी जब मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग के खिलाफ प्रदर्शन किया गया था।
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सुनवाई के दौरान क्या बोले वकील?
सुनवाई के दौरान पीड़ित की तरफ से पेश हुईं वकील वृंदा ग्रोवर ने एक पीड़ित महिला का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि गैंगरेप की शिकार एक कुकी महिला की पिछले महीने सदमे और बीमारी से मौत हो गई। वकील ने आरोप लगाया कि सीबीआई ने चार्जशीट के बारे में कोई जानकारी नहीं दी और मुख्य आरोपी भी कोर्ट में पेश नहीं हो रहा है। उन्होंने जांच में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया। इस पर सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि मणिपुर में अब हालात पहले से बेहतर और शांतिपूर्ण हैं।
26 फरवरी को अगली सुनवाई
चीफ जस्टिस ने कहा कि पीड़ितों को मुफ्त कानूनी मदद मिलनी चाहिए। अगर स्थानीय स्तर पर वकील उपलब्ध नहीं हैं, तो गुवाहाटी बार से वकील भेजे जा सकते हैं। वहीं, वकील कॉलिन गोंसाल्वेस ने शिकायत की कि उन्हें कमेटी की रिपोर्ट नहीं मिल रही है, जिससे पुनर्वास का काम धीमा पड़ा है। कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट में कुछ संवेदनशील जानकारी हो सकती है, इसलिए उसे सावधानी से साझा किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले पर 26 फरवरी को अगली सुनवाई करेगा। कोर्ट ने जस्टिस गीता मित्तल कमेटी का कार्यकाल भी 31 जुलाई तक बढ़ा दिया है ताकि राहत कार्य जारी रह सके।
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खेल सुविधाएं और अवसर समाज की साझा संपत्ति, इन्हें कुछ लोगों तक सीमित न करें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खेल की सुविधाएं और अवसर समाज की साझा संपत्ति हैं, इन्हें कुछ लोगों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि खेल संस्थानों का संचालन पारदर्शी, पेशेवर और जनहित में होना चाहिए, ताकि खेल का समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।
जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने राज्य क्रिकेट संघों को सुधार की पहल करने की सलाह दी। पीठ ने कहा कि राज्य संघों की जिम्मेदारी है कि वे जिला क्रिकेट संघों में भी सुशासन, बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता लागू करें। खिलाड़ियों के चयन, अनुबंध और प्रशासनिक फैसलों में निष्पक्षता जरूरी है। हितों के टकराव से बचना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह टिप्पणी तिरुचिरापल्ली जिला क्रिकेट संघ की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। इस याचिका में मद्रास हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी गई है, जो मतदान और सदस्यता अधिकारों से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सदस्यता और संघ की संरचना से जुड़े मुद्दे फिलहाल हाईकोर्ट और संबंधित प्राधिकरण के समक्ष लंबित हैं, इसलिए उनका जल्द निपटारा किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि खेल राष्ट्रीय जीवन का अहम हिस्सा हैं। खेल लोगों को सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक भेदभाव से ऊपर उठाकर एक मंच पर लाते हैं और भाईचारे की भावना को मजबूत करते हैं। मैदान पर टीम भावना लोगों को व्यक्तिगत मतभेद भुलाकर साझा लक्ष्य के लिए काम करना सिखाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खेल की सुविधाएं और अवसर समाज की साझा संपत्ति हैं, इन्हें कुछ लोगों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि खेल संस्थानों का संचालन पारदर्शी, पेशेवर और जनहित में होना चाहिए, ताकि खेल का समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।
जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने राज्य क्रिकेट संघों को सुधार की पहल करने की सलाह दी। पीठ ने कहा कि राज्य संघों की जिम्मेदारी है कि वे जिला क्रिकेट संघों में भी सुशासन, बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता लागू करें। खिलाड़ियों के चयन, अनुबंध और प्रशासनिक फैसलों में निष्पक्षता जरूरी है। हितों के टकराव से बचना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह टिप्पणी तिरुचिरापल्ली जिला क्रिकेट संघ की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। इस याचिका में मद्रास हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी गई है, जो मतदान और सदस्यता अधिकारों से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सदस्यता और संघ की संरचना से जुड़े मुद्दे फिलहाल हाईकोर्ट और संबंधित प्राधिकरण के समक्ष लंबित हैं, इसलिए उनका जल्द निपटारा किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि खेल राष्ट्रीय जीवन का अहम हिस्सा हैं। खेल लोगों को सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक भेदभाव से ऊपर उठाकर एक मंच पर लाते हैं और भाईचारे की भावना को मजबूत करते हैं। मैदान पर टीम भावना लोगों को व्यक्तिगत मतभेद भुलाकर साझा लक्ष्य के लिए काम करना सिखाती है।
छह साल से फरार आरोपी को मिली हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने छह साल से फरार आरोपी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत रद्द कर दी। शीर्ष अदालत ने आरोपी को चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। अदालत ने हालांकि उसे वहां नियमित जमानत का आवेदन करने की छूट दी। जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि सह-आरोपियों के बरी होने का लाभ किसी फरार व्यक्ति को देना एक गलत मिसाल कायम करता है और कानून से बचने के लिए प्रोत्साहन देता है।
पीठ ने मामले के तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट का आदेश पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण और अनुचित है। मौजूद दस्तावेजों के अनुसार, आरोपी को अग्रिम जमानत देने का कोई अपवाद नहीं बनता है। पीठ ने गौर किया कि राज्य ने भी अपीलकर्ता की इस दलील का समर्थन किया है कि हाईकोर्ट के अग्रिम जमानत आदेश को रद्द किया जाए। पीठ ने कहा, हालांकि, यह निर्विवाद है कि राज्य ने विवादित आदेश को चुनौती देते हुए कोई विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर नहीं की है। हम यह समझने में असमर्थ हैं कि प्रतिवादी राज्य ने, अपने ज्ञात कारणों से, इस न्यायालय में विवादित आदेश के विरुद्ध अपील क्यों नहीं की, जबकि वास्तव में उसने अपने प्रति-हलफनामे के माध्यम से आरोपी को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने के लिए अपीलकर्ता/मूल शिकायतकर्ता के मामले का पूरी तरह से समर्थन किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने छह साल से फरार आरोपी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत रद्द कर दी। शीर्ष अदालत ने आरोपी को चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। अदालत ने हालांकि उसे वहां नियमित जमानत का आवेदन करने की छूट दी। जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि सह-आरोपियों के बरी होने का लाभ किसी फरार व्यक्ति को देना एक गलत मिसाल कायम करता है और कानून से बचने के लिए प्रोत्साहन देता है।
पीठ ने मामले के तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट का आदेश पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण और अनुचित है। मौजूद दस्तावेजों के अनुसार, आरोपी को अग्रिम जमानत देने का कोई अपवाद नहीं बनता है। पीठ ने गौर किया कि राज्य ने भी अपीलकर्ता की इस दलील का समर्थन किया है कि हाईकोर्ट के अग्रिम जमानत आदेश को रद्द किया जाए। पीठ ने कहा, हालांकि, यह निर्विवाद है कि राज्य ने विवादित आदेश को चुनौती देते हुए कोई विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर नहीं की है। हम यह समझने में असमर्थ हैं कि प्रतिवादी राज्य ने, अपने ज्ञात कारणों से, इस न्यायालय में विवादित आदेश के विरुद्ध अपील क्यों नहीं की, जबकि वास्तव में उसने अपने प्रति-हलफनामे के माध्यम से आरोपी को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने के लिए अपीलकर्ता/मूल शिकायतकर्ता के मामले का पूरी तरह से समर्थन किया है।
निष्कासित छात्र को परीक्षा में बैठने की सुप्रीम अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों के बारे में आपत्तिजनक मीम प्रसारित करने के आरोप में निष्कासित नाबालिग छात्र को कक्षा 10 की परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी। शीर्ष कोर्ट ने काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस को इस छात्र को एडमिट कार्ड जारी करने का निर्देश दिया।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि लड़के ने परीक्षा देने के लिए सीआईएससीई में पहले ही पंजीकरण करा लिया है और यदि उसे अनुमति नहीं दी गई तो उसका एक शैक्षणिक वर्ष बर्बाद हो जाएगा। इन परिस्थितियों में, हम निर्देश देते हैं कि याचिकाकर्ता के बेटे को एडमिट कार्ड-हॉल टिकट जारी करके परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए। विवाद की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, अन्य छात्रों के साथ नहीं बल्कि एक अलग कमरे में परीक्षा देने की अनुमति देने के लिए स्वतंत्र है। इसके अलावा, स्कूल को विद्यालय में शारीरिक शिक्षा और सामाजिक रूप से उपयोगी उत्पादक कार्य का आंतरिक मूल्यांकन करना होगा। सुनवाई के दौरान, पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, उसे सुधारने के बजाय, स्कूल ने उसे निष्कासित करने का फैसला किया है। एक स्कूल के रूप में, आपको बच्चे को सुधारने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी, लेकिन आपने उसे केवल इसलिए निष्कासित कर दिया क्योंकि वह एक शरारती लड़का है।
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों के बारे में आपत्तिजनक मीम प्रसारित करने के आरोप में निष्कासित नाबालिग छात्र को कक्षा 10 की परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी। शीर्ष कोर्ट ने काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस को इस छात्र को एडमिट कार्ड जारी करने का निर्देश दिया।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि लड़के ने परीक्षा देने के लिए सीआईएससीई में पहले ही पंजीकरण करा लिया है और यदि उसे अनुमति नहीं दी गई तो उसका एक शैक्षणिक वर्ष बर्बाद हो जाएगा। इन परिस्थितियों में, हम निर्देश देते हैं कि याचिकाकर्ता के बेटे को एडमिट कार्ड-हॉल टिकट जारी करके परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए। विवाद की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, अन्य छात्रों के साथ नहीं बल्कि एक अलग कमरे में परीक्षा देने की अनुमति देने के लिए स्वतंत्र है। इसके अलावा, स्कूल को विद्यालय में शारीरिक शिक्षा और सामाजिक रूप से उपयोगी उत्पादक कार्य का आंतरिक मूल्यांकन करना होगा। सुनवाई के दौरान, पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, उसे सुधारने के बजाय, स्कूल ने उसे निष्कासित करने का फैसला किया है। एक स्कूल के रूप में, आपको बच्चे को सुधारने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी, लेकिन आपने उसे केवल इसलिए निष्कासित कर दिया क्योंकि वह एक शरारती लड़का है।
गाना विवाद में एआर रहमान को डागरवानी परंपरा का कुछ योगदान स्वीकारने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने संगीतकार एआर रहमान और फिल्म पोन्नियिन सेल्वन 2 के निर्माताओं से फिल्म के गीत वीरा राजा वीरा के लिए डागरवानी परंपरा के योगदान को भी स्वीकार करने को कहा। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ध्रुपद गायक उस्ताद फैयाज वसीफुद्दीन डागर की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें सितंबर 2025 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश चुनौती दी गई थी जिसमें कहा गया था कि जूनियर डागर ब्रदर्स की ‘शिव स्तुति’ के शास्त्रीय गायन की रचना के प्रथम दृष्टया कोई सबूत नहीं है। सुनवाई के दौरान पीठ ने डागर के वकील से कहा, प्रथम प्रस्तुति का अर्थ यह नहीं है कि रचनाकार आप ही हैं। आपका मामला प्रथम प्रस्तुति से ही रचनाकार होने का अनुमान लगाने पर आधारित है। मुद्दा यह है कि क्या आप इसके रचयिता थे या आपने इसे डागर परंपरा से प्राप्त किया और पहली बार गाया? इस पर वकील ने कहा, मैं एक विशिष्ट रचना पर अधिकार का दावा कर रहा हूं। मेरा अधिकार रचना पर है। मेरे पिता और भाई ने इसकी रचना की थी। पीठ ने फिर डागर के वकील से पूछा कि क्या वे राग की मौलिकता का दावा कर रहे हैं, जिस पर उन्होंने कहा कि अधिकार रचना पर है, न कि गायन शैली पर। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि डागरवानी परंपरा के योगदान को स्वीकार किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने संगीतकार एआर रहमान और फिल्म पोन्नियिन सेल्वन 2 के निर्माताओं से फिल्म के गीत वीरा राजा वीरा के लिए डागरवानी परंपरा के योगदान को भी स्वीकार करने को कहा। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ध्रुपद गायक उस्ताद फैयाज वसीफुद्दीन डागर की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें सितंबर 2025 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश चुनौती दी गई थी जिसमें कहा गया था कि जूनियर डागर ब्रदर्स की ‘शिव स्तुति’ के शास्त्रीय गायन की रचना के प्रथम दृष्टया कोई सबूत नहीं है। सुनवाई के दौरान पीठ ने डागर के वकील से कहा, प्रथम प्रस्तुति का अर्थ यह नहीं है कि रचनाकार आप ही हैं। आपका मामला प्रथम प्रस्तुति से ही रचनाकार होने का अनुमान लगाने पर आधारित है। मुद्दा यह है कि क्या आप इसके रचयिता थे या आपने इसे डागर परंपरा से प्राप्त किया और पहली बार गाया? इस पर वकील ने कहा, मैं एक विशिष्ट रचना पर अधिकार का दावा कर रहा हूं। मेरा अधिकार रचना पर है। मेरे पिता और भाई ने इसकी रचना की थी। पीठ ने फिर डागर के वकील से पूछा कि क्या वे राग की मौलिकता का दावा कर रहे हैं, जिस पर उन्होंने कहा कि अधिकार रचना पर है, न कि गायन शैली पर। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि डागरवानी परंपरा के योगदान को स्वीकार किया जाना चाहिए।
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