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Supreme Court: भाई को फोन कर आदेश के बारे में पूछताछ करने पर सीजेआई का सख्त संदेश, अवमानना की चेतावनी
Wed, 25 Mar 2026 10:36 PM IST
Nirmal Kant
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: Nirmal Kant
Updated Wed, 25 Mar 2026 10:36 PM IST
सार
Supreme Court: सीजेआई सूर्य कांत ने अपने आदेश पर सवाल उठाने की कोशिश को गंभीरता से लिया और अवमानना की चेतावनी दी। जस्टिस सूर्य कांत ने यह टिप्पणी उस समय की, जब वह सुभारती मेडिकल कॉलेज में बौद्ध अल्पसंख्यक कोटा के तहत लाभ की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। पढ़िए रिपोर्ट-
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर)
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत ने उनके आदेश पर सवाल उठाने की कोशिश को लेकर कड़ी नाराजगी जताई और आपराधिक अवमानना की चेतावनी दी।
मेडिकल प्रवेश से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई ने चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने कहा, किसी ने मेरे भाई को फोन कर पूछा कि मैंने ऐसा आदेश कैसे पारित किया। उसके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए?
हरियाणा सरकार की ओर से पेश वकील को संबोधित करते हुए उन्होंने सख्त लहजे में कहा, वह मेरे भाई को कॉल कर पूछता है कि सीजेआई ने ऐसा आदेश कैसे दिया? क्या वह मुझे निर्देश देगा? पहले आप इसकी पुष्टि करें और वकील के तौर पर आपको खुद को इस मामले से अलग कर लेना चाहिए।
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सीजेआई ने आगे कड़ी चेतावनी देते हुए कहा, वह विदेश में छिप जाए, तब भी मुझे पता है कि ऐसे लोगों से कैसे निपटना है। दोबारा ऐसी हरकत कभी न करें। मैं पिछले 23 वर्षों से ऐसे तत्वों से निपटता रहा हूं।
यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें मेरठ स्थित सुभारती मेडिकल कॉलेज में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए बौद्ध अल्पसंख्यक कोटा का लाभ मांगा गया था। यह संस्थान अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए राष्ट्रीय आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त है।
याचिकाकर्ता निकिल कुमार पुनिया और एकता पुनिया ने दावा किया था कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद वे अल्पसंख्यक कोटे के पात्र हैं, जबकि इससे पहले वे सामान्य वर्ग के उम्मीदवार के रूप में परीक्षा दे चुके थे। उत्तर प्रदेश सरकार की अधिसूचना के बाद उनके दाखिले पर रोक लगा दी गई थी।
मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए अदालत ने इसे प्रणाली के दुरुपयोग का गंभीर मामला बताया। सीजेआई ने टिप्पणी की, यह एक नई तरह की धोखाधड़ी है, हमें ज्यादा कुछ कहने पर मजबूर न करें। पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि सामान्य वर्ग से आने वाले उम्मीदवार, जो पहले गैर-अल्पसंख्यक के रूप में आवेदन कर चुके हैं, वे अचानक अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र कैसे प्राप्त कर सकते हैं।
ये भी पढ़ें: दहेज मामलों पर अदालत की सख्त टिप्पणी, कहा- सामान्य आरोपों पर ससुराल पक्ष को नहीं घसीटा जा सकता
याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा, आप अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनना चाहते हैं। आप एक समृद्ध समुदाय से आते हैं, अपनी योग्यता पर गर्व करें। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने भी धर्म परिवर्तन के समय पर सवाल उठाते हुए कहा, क्या परीक्षा से ठीक पहले बौद्ध बने?
अदालत ने प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल उठाते हुए पूछा कि हिसार के उपमंडल अधिकारी ने ऐसे प्रमाणपत्र कैसे जारी किए। साथ ही हरियाणा के मुख्य सचिव को अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र जारी करने के दिशानिर्देश पेश करने का आदेश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट करने को कहा कि क्या सामान्य वर्ग, खासकर ईडब्ल्यूएस सीमा से ऊपर के उम्मीदवारों को बाद में बौद्ध अल्पसंख्यक का दर्जा देकर प्रवेश देना उचित है।
इनपुट- आईएएनएस
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मेडिकल प्रवेश से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई ने चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने कहा, किसी ने मेरे भाई को फोन कर पूछा कि मैंने ऐसा आदेश कैसे पारित किया। उसके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए?
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हरियाणा सरकार की ओर से पेश वकील को संबोधित करते हुए उन्होंने सख्त लहजे में कहा, वह मेरे भाई को कॉल कर पूछता है कि सीजेआई ने ऐसा आदेश कैसे दिया? क्या वह मुझे निर्देश देगा? पहले आप इसकी पुष्टि करें और वकील के तौर पर आपको खुद को इस मामले से अलग कर लेना चाहिए।
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सीजेआई ने आगे कड़ी चेतावनी देते हुए कहा, वह विदेश में छिप जाए, तब भी मुझे पता है कि ऐसे लोगों से कैसे निपटना है। दोबारा ऐसी हरकत कभी न करें। मैं पिछले 23 वर्षों से ऐसे तत्वों से निपटता रहा हूं।
यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें मेरठ स्थित सुभारती मेडिकल कॉलेज में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए बौद्ध अल्पसंख्यक कोटा का लाभ मांगा गया था। यह संस्थान अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए राष्ट्रीय आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त है।
याचिकाकर्ता निकिल कुमार पुनिया और एकता पुनिया ने दावा किया था कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद वे अल्पसंख्यक कोटे के पात्र हैं, जबकि इससे पहले वे सामान्य वर्ग के उम्मीदवार के रूप में परीक्षा दे चुके थे। उत्तर प्रदेश सरकार की अधिसूचना के बाद उनके दाखिले पर रोक लगा दी गई थी।
मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए अदालत ने इसे प्रणाली के दुरुपयोग का गंभीर मामला बताया। सीजेआई ने टिप्पणी की, यह एक नई तरह की धोखाधड़ी है, हमें ज्यादा कुछ कहने पर मजबूर न करें। पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि सामान्य वर्ग से आने वाले उम्मीदवार, जो पहले गैर-अल्पसंख्यक के रूप में आवेदन कर चुके हैं, वे अचानक अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र कैसे प्राप्त कर सकते हैं।
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याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा, आप अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनना चाहते हैं। आप एक समृद्ध समुदाय से आते हैं, अपनी योग्यता पर गर्व करें। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने भी धर्म परिवर्तन के समय पर सवाल उठाते हुए कहा, क्या परीक्षा से ठीक पहले बौद्ध बने?
अदालत ने प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल उठाते हुए पूछा कि हिसार के उपमंडल अधिकारी ने ऐसे प्रमाणपत्र कैसे जारी किए। साथ ही हरियाणा के मुख्य सचिव को अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र जारी करने के दिशानिर्देश पेश करने का आदेश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट करने को कहा कि क्या सामान्य वर्ग, खासकर ईडब्ल्यूएस सीमा से ऊपर के उम्मीदवारों को बाद में बौद्ध अल्पसंख्यक का दर्जा देकर प्रवेश देना उचित है।
इनपुट- आईएएनएस
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