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Supreme Court: पिता के पास रहकर बच्चा हुआ बीमार, अब अदालत ने मां को सौंपी कस्टडी; कहा- ऐसे फैसले अंतिम नहीं...
Fri, 18 Jul 2025 08:31 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Fri, 18 Jul 2025 08:31 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने एक पुराने फैसले में गलती मानते हुए कहा, पिता के पास रहकर बच्चा बीमार हो गया। अदालत ने इस टिप्पणी के साथ अपने फैसले को पलटते हुए कहा कि बच्चे की कस्टडी पिता को देकर भूल हुई है। संरक्षण पर अदालती फैसले अंतिम नहीं हैं। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने 12 साल के बच्चे की कस्टडी उसकी मां को सौंप दी। जानिए पूरा मामला
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बच्चे की कस्टडी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश सुनाते हुए 12 वर्षीय लड़के की कस्टडी उसके पिता को सौंपने के अपने ही 10 महीने पुराने फैसले को पलट दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि बच्चों की कस्टडी को लेकर अदालत के फैसले अंतिम नहीं हो सकते। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा कि कस्टडी के दौरान बच्चे के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि बच्चे की कस्टडी पिता को देकर अदालत ने गलती की है।
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बच्चे की कस्टडी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
2012 में बच्चे का जन्म हुआ, 2016 में महिला ने की दूसरी शादी
दरअसल, बच्चे के माता-पिता की शादी 2011 में हुई थी और उसका जन्म 2012 में हुआ था। एक साल बाद दोनों अलग हो गए और बच्चे की कस्टडी मां को सौंप दी गई। मां ने 2016 में दोबारा शादी कर ली। उसके दूसरे पति के पहले विवाह से दो बच्चे थे, और नए जोड़े का अपना एक बच्चा था।
दरअसल, बच्चे के माता-पिता की शादी 2011 में हुई थी और उसका जन्म 2012 में हुआ था। एक साल बाद दोनों अलग हो गए और बच्चे की कस्टडी मां को सौंप दी गई। मां ने 2016 में दोबारा शादी कर ली। उसके दूसरे पति के पहले विवाह से दो बच्चे थे, और नए जोड़े का अपना एक बच्चा था।
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बच्चे की कस्टडी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
पिता ने लगाया धर्म-परिवर्तन का आरोप
इसके बाद पिता ने बताया कि उन्हें 2019 तक बच्चे के ठिकाने के बारे में पता नहीं था, जब मां ने कुछ कागजी कार्रवाई के लिए उनसे संपर्क किया, क्योंकि वह और उनके दूसरे पति बच्चों के साथ मलयेशिया जाने का फैसला कर चुके थे। पिता ने यह भी बताया कि उन्हें पता चला कि बच्चे का धर्म उनकी सहमति या जानकारी के बिना हिंदू से ईसाई में बदल दिया गया था।
इसके बाद पिता ने बताया कि उन्हें 2019 तक बच्चे के ठिकाने के बारे में पता नहीं था, जब मां ने कुछ कागजी कार्रवाई के लिए उनसे संपर्क किया, क्योंकि वह और उनके दूसरे पति बच्चों के साथ मलयेशिया जाने का फैसला कर चुके थे। पिता ने यह भी बताया कि उन्हें पता चला कि बच्चे का धर्म उनकी सहमति या जानकारी के बिना हिंदू से ईसाई में बदल दिया गया था।
बच्चे की कस्टडी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
मानसिक तौर पर बीमार हुआ बच्चा
यह बच्चा अदालत के आदेश की वजह से अब वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग में इलाज करा रहा है। अपनी गलती का अहसास करते हुए अदालत ने कहा कि वह अब अपनी मां के साथ रहेगा। हालांकि उसकी मां ने अब दोबारा शादी कर ली है, लेकिन पिता को उससे मिलने का अधिकार होगा। यह मामला ऐसे पेचीदा और भावनात्मक मामलों में न्यायिक कार्यवाही की कमियों को उजागर करता है, जिसका फैसला अदालतों में झगड़ते माता-पिता की दलीलें सुनकर किया जाता है। बच्चे से बातचीत किए बिना यह समझना कठिन है कि उसके माता-पिता के साथ उसकी सहजता कैसी है।
यह बच्चा अदालत के आदेश की वजह से अब वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग में इलाज करा रहा है। अपनी गलती का अहसास करते हुए अदालत ने कहा कि वह अब अपनी मां के साथ रहेगा। हालांकि उसकी मां ने अब दोबारा शादी कर ली है, लेकिन पिता को उससे मिलने का अधिकार होगा। यह मामला ऐसे पेचीदा और भावनात्मक मामलों में न्यायिक कार्यवाही की कमियों को उजागर करता है, जिसका फैसला अदालतों में झगड़ते माता-पिता की दलीलें सुनकर किया जाता है। बच्चे से बातचीत किए बिना यह समझना कठिन है कि उसके माता-पिता के साथ उसकी सहजता कैसी है।
सांकतिक तस्वीर
- फोटो : ANI
बच्चा अपनी मां के पास सुरक्षित
अदालत ने स्वीकार किया कि बच्चे का बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य अदालत की ओर से कस्टडी बदलने के आदेश का नतीजा था। अदालत ने आगे कहा कि बच्चा अपनी मां, सौतेले भाई और सौतेले पिता को अपना निकटतम परिवार मानता है। उस माहौल में वह खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, जिससे पता चले कि याचिकाकर्ता की दूसरी शादी या दूसरे बच्चे के जन्म ने किसी भी तरह से नाबालिग के प्रति उसकी मातृत्व के स्तर को प्रभावित किया है। बच्चे ने अपने स्कूल में शानदार प्रदर्शन भी दिखाया है। उसकी शैक्षिक जरूरतों को लेकर भी कोई चिंताजनक बात नहीं है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेश का नाबालिग के दिल व दिमाग पर गहरा असर पड़ा है। अदालत ने कहा कि सभी मेडिकल रिपोर्टों से पता चला है कि बच्चा काफी चिंताग्रस्त है।
अदालत ने स्वीकार किया कि बच्चे का बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य अदालत की ओर से कस्टडी बदलने के आदेश का नतीजा था। अदालत ने आगे कहा कि बच्चा अपनी मां, सौतेले भाई और सौतेले पिता को अपना निकटतम परिवार मानता है। उस माहौल में वह खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, जिससे पता चले कि याचिकाकर्ता की दूसरी शादी या दूसरे बच्चे के जन्म ने किसी भी तरह से नाबालिग के प्रति उसकी मातृत्व के स्तर को प्रभावित किया है। बच्चे ने अपने स्कूल में शानदार प्रदर्शन भी दिखाया है। उसकी शैक्षिक जरूरतों को लेकर भी कोई चिंताजनक बात नहीं है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेश का नाबालिग के दिल व दिमाग पर गहरा असर पड़ा है। अदालत ने कहा कि सभी मेडिकल रिपोर्टों से पता चला है कि बच्चा काफी चिंताग्रस्त है।
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी मामले में सुनाया अहम फैसला
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
हाईकोर्ट ने सौंपी थी पिता को कस्टडी
सुप्रीम कोर्ट आने से पहले पिता ने बच्चे की कस्टडी के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। उन्होंने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद बच्चे की कस्टडी पिता को दे दी गई। हालांकि, मां ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन अदालत ने पिछले साल अगस्त में उनकी अपील खारिज कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट आने से पहले पिता ने बच्चे की कस्टडी के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। उन्होंने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद बच्चे की कस्टडी पिता को दे दी गई। हालांकि, मां ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन अदालत ने पिछले साल अगस्त में उनकी अपील खारिज कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : एएनआई (फाइल)
अदालतों के लिए यह बेहद कठोर और असंवेदनशील
इसके बाद बच्चे की मां ने अदालत में एक नई अर्जी पेश की, जिसमें कहा गया कि कस्टडी बदलने के आदेश की वजह से बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ा है। उनकी दलीलों को एक नैदानिक मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट का भी समर्थन प्राप्त था। उसकी याचिका स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि कानूनी अदालतों के लिए यह बेहद कठोर और असंवेदनशील होगा कि वे बच्चे से यह अपेक्षा करें कि वह एक एलियन हाउस स्वीकार करे। वहां फले-फूले, जहां उसका अपना पिता उसके लिए अजनबी जैसा है। हम उस आघात को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
इसके बाद बच्चे की मां ने अदालत में एक नई अर्जी पेश की, जिसमें कहा गया कि कस्टडी बदलने के आदेश की वजह से बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ा है। उनकी दलीलों को एक नैदानिक मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट का भी समर्थन प्राप्त था। उसकी याचिका स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि कानूनी अदालतों के लिए यह बेहद कठोर और असंवेदनशील होगा कि वे बच्चे से यह अपेक्षा करें कि वह एक एलियन हाउस स्वीकार करे। वहां फले-फूले, जहां उसका अपना पिता उसके लिए अजनबी जैसा है। हम उस आघात को नजरअंदाज नहीं कर सकते।