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Hindi News ›   India News ›   Supreme Court: Changes regarding dowry should also come from within need to strengthen the law but it is the work of the legislature Latest News Update

सुप्रीम कोर्ट: दहेज को लेकर बदलाव अपने भीतर से भी आना चाहिए, कानून को मजबूत करने की जरुरत लेकिन यह काम विधायिका का

Mon, 06 Dec 2021 05:10 PM IST
अभिषेक दीक्षित राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Mon, 06 Dec 2021 05:10 PM IST
सार

अदालत सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिकारी के बराबर दहेज निषेध अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। केरल के साबू स्टीफन द्वारा दायर याचिका में विवाह के पंजीकरण के लिए जोड़ों के लिए विवाह पूर्व परामर्श और विवाह पूर्व परामर्श प्रमाणपत्र को अनिवार्य बनाने जैसे अन्य उपायों की भी मांग की गई थी।

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Supreme Court: Changes regarding dowry should also come from within need to strengthen the law but it is the work of the legislature Latest News Update
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : Social Media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि भारत में दहेज निषेध कानूनों को और मजबूत करने की आवश्यकता हो सकती है लेकिन ऐसा करना विधायिका पर निर्भर करता है न कि अदालतों पर। शीर्ष अदालत ने यह कहते हुए दहेज से निपटने के लिए कई उपायों की मांग करने वाले एक याचिकाकर्ता से भारत के विधि आयोग के समक्ष अपने मुद्दों को उठाने के लिए कहा। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील वीके बीजू से कहा, 'आपके द्वारा उठाए गए मुद्दे सही नजर आते हैं। लेकिन यह काम विधायिका का है। आप अपने मुद्दे को विधि आयोग को संबोधित कर सकते हैं ताकि दहेज कानून में बदलाव का सुझाव दिया जा सके और हो सकता है कि कुछ संशोधन हो जाए।'

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याचिकाकर्ता के वकील ने जस्टिस डीवाई चंद्रचूड से याचिका पर नोटिस जारी करने की गुहार लगाई लेकिन पीठ ने कहा, 'नोटिस जारी करने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। विधि आयोग दहेज निषेध कानून को मजबूत करने की सिफारिश कर सकता है।' जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि कानून महत्वपूर्ण हैं लेकिन बदलाव अपने भीतर से भी आनी चाहिए। पीठ ने कहा, 'परिवर्तन भीतर से भी आना चाहिए। हम परिवार में आने वाली महिला के साथ कैसा व्यवहार करते हैं और एक महिला का सामाजिक महत्व क्या है। सुधारक इस पर भी गौर कर रहे हैं।'
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अदालत सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिकारी के बराबर दहेज निषेध अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। केरल के साबू स्टीफन द्वारा दायर याचिका में विवाह के पंजीकरण के लिए जोड़ों के लिए विवाह पूर्व परामर्श और विवाह पूर्व परामर्श प्रमाणपत्र को अनिवार्य बनाने जैसे अन्य उपायों की भी मांग की गई थी।
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याचिकाकर्ता के वकील ने केरल में दहेज से जुड़े मामलों और मौतों में वृद्धि पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, 'केरल की स्थिति से मैं परेशान हूं। एक आयुर्वेद चिकित्सक के दहेज मामले में कार्रवाई नहीं करने पर पुलिस को निलंबित कर दिया गया। केरल में यह एक बुरी प्रथा है। सोने आदि की मांग की जाती है।' जवाब में पीठ ने कहा कि वह विवाह पंजीकरण के लिए विवाह पूर्व परामर्श प्रमाणपत्र को अनिवार्य बनाने के निर्देश जारी नहीं कर सकती क्योंकि इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।


जस्टिस चंद्रचूड ने कहा, 'भारत केवल केरल, मुंबई या दिल्ली में नहीं बसता है। भारत गांवों में भी रहता है और आपको गांवों में ये करिकुलम विशेषज्ञ नहीं मिलेंगे। अगर हम कहते हैं कि जब तक कोई कोर्स नहीं करेगा, तब तक विवाह पंजीकृत नहीं होगा। इसके गंभीर परिणाम होंगे। सोचिए गांव की एक असहाय महिला का क्या होगा जो इस कोर्स में शामिल नहीं हो सकती।' पीठ ने कहा कि ये विधायी मामले हैं और अदालतें उसके अधिकारक्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकती हैं। यह कहते हुए पीठ ने याचिकाकर्ता को विधि आयोग के समक्ष इस मुद्दे को उठाने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी।

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