Article 370: 'जम्मू-कश्मीर के संविधान में था बंधन... पर भारतीअन
Supreme Court: अनुच्छेद 370 को निरस्त करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक बैच पर सुनवाई के चौथे दिन दलीलें सुनी गईं। इस दौरान कोर्ट को बताया गया कि अनुच्छेद 370 की व्याख्या भारत के लोगों और जम्मू-कश्मीर के लोगों के बीच एक सैद्धांतिक समझौते के रूप में की जानी चाहिए।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की वैधता पर चल रही कानूनी बहस के चौथे दिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर के संविधान में केंद्र सरकार की शक्तियों या भारतीय संविधान के अनुप्रयोग पर बंधन था, लेकिन भारतीय संविधान में ऐसा कोई बंधन नहीं है। जम्मू-कश्मीर के विलय का मतलब है कि वह भारत का आंतरिक हिस्सा बन गया।
सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा, हमें ध्यान देना चाहिए कि भारतीय संविधान जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की बात करता है, लेकिन यह जम्मू-कश्मीर के अलग संविधान का बिल्कुल भी उल्लेख नहीं करता है। किसी ने भी जम्मू-कश्मीर के संविधान को स्पष्ट रूप से शामिल करने के लिए भारतीय संविधान में संशोधन करने के बारे में कभी नहीं सोचा था।
पीठ ने एक याचिकाकर्ता के वकील गोपाल सुब्रमण्यम से पूछा, मान लीजिए धारा 356 लागू है और कोई अध्यादेश जारी करना हो तो क्या राष्ट्रपति अध्यादेश जारी नहीं कर सकते? इस पर सुब्रमण्यम ने कहा, भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर के संविधान का बिल्कुल भी उल्लेख नहीं है, यह कहना सही नहीं है, क्योंकि कई अनुच्छेदों में कहा गया है कि यह जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता है। अनुच्छेद 356 एक आकस्मिक प्रावधान है और इसके तहत आदेश बिल्कुल भी अपरिवर्तनीय नहीं हो सकते हैं।
अनुच्छेद 370 अपने आप में बहुत लचीला
जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा, हमने जो देखा है वह यह है कि अनुच्छेद 370 अपने आप में बहुत लचीला है। अनुच्छेद 370 खुद कहता है कि इसे भारतीय संविधान को लागू करने के लिए संशोधित किया जा सकता है जैसा इसे देश के अन्य हिस्सों में लागू किया गया है। जवाब में सुब्रमण्यम ने कहा, जम्मू-कश्मीर के संविधान को उनकी विधायिका से ही पलटा या निरस्त किया जा सकता है न कि संसद की ओर से। यह लचीला है, लेकिन अगर द्विपक्षीय सहमति या राज्य विधानसभा के साथ चर्चा के बिना निर्णय लिए जाते हैं तो उचित यह नहीं है।
जो अपनाया गया वह अपवादों के साथ भारतीय संविधान था
पीठ ने कहा, भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1957 के बाद जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की बात नहीं करता। आप इसे जम्मू-कश्मीर का संविधान कह सकते हैं, लेकिन जो अपनाया गया वह अपवादों के साथ भारतीय संविधान था।
कोई सशर्त कानून नहीं
सुब्रमण्यम ने कहा, अनुच्छेद 370 कोई सशर्त कानून नहीं है। यह संविधान के प्रावधानों को लागू करने के बारे में है। यह एक सांविधानिक अधिनियम है। अनुच्छेद 370 का इस्तेमाल आत्मविनाश के लिए नहीं किया जा सकता है और यह इस अदालत के फैसलों में स्पष्ट किया गया है।
सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि अनुच्छेद 370 में अनियंत्रित शक्ति निहित नहीं थीं, बल्कि यह एक जरिया था जिससे संविधान राज्य पर लागू होता था। याचिकाकर्ता मुजफ्फर इकबाल खान की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने अदालत को बताया कि जम्मू-कश्मीर संविधान सभा अनुच्छेद 370 को निरस्त नहीं करना चाहती थी। इसके बजाय वह इसे जारी रखने के पक्ष में थी। मुजफ्फर इकबाल खान ने 5 अगस्त 2019 और 6 अगस्त 2019 को जारी केंद्र के दो संवैधानिक आदेशों को चुनौती दी है, जिनके जरिए अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया था।
चौथे दिन अपनी दलीलें सुनी गईं
सुब्रमण्यम ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक बैच पर सुनवाई के चौथे दिन अपनी दलीलें शुरू कीं। उन्होंने कहा कि सम्मानपूर्वक यह बताया जा रहा है कि अनुच्छेद 370 को सत्ता की राजनीति या सौदेबाजी की अभिव्यक्ति के रूप में नहीं पढ़ा या समझा जाना चाहिए, बल्कि इसकी व्याख्या भारत के लोगों और जम्मू और कश्मीर के लोगों के बीच एक सैद्धांतिक समझौते के रूप में की जानी चाहिए।
केंद्र के आदेश को बताया असंवैधानिक
उन्होंने कहा कि संवैधानिक तर्कों में कई दृष्टिकोण हो सकते हैं, एक ऐतिहासिक तो दूसरा एक पाठ्य। ऐसे ही तीसरा सैद्धांतिक और अंतिम संरचनात्मक तर्क हो सकता है। ये सभी संवैधानिक व्याख्या के तरीके हैं और अदालत चाहे जो भी रुख अपनाए अंतिम परिणाम वही होगा। उन्होंने दलील दी कि पांच और छह अगस्त 2019 को केंद्र सरकार की ओर से जारी आदेश अस्वीकार्य हैं। इससे संविधान का उल्लंघन होता है।
विलय का वास्तव में क्या मतलब है : सीजेआई
सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद-370 पर सुनवाई के दौरान सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने यह भी जानना चाहा कि विलय का वास्तव में क्या मतलब है? विलय का मतलब है कि जम्मू-कश्मीर भारत का पूर्ण और आंतरिक हिस्सा बन जाता है और इससे पीछे हटने की कोई जरूरत नहीं है, क्या यह बात नहीं है?
सीजेआई चंद्रचूड़ ने सवाल किया, जम्मू-कश्मीर का संविधान अस्तित्व में आने के बाद विलय पत्र का क्या हुआ? जवाब में सुब्रमण्यम ने कहा, संविधान सभा की ओर से भारत में शामिल होने का निर्णय लेने के बाद वह निर्णय कायम रहा। विलय पत्र में कुछ आपत्तियां थीं लेकिन संविधान सभा ने भारत में विलय कर लिया। इस पर सीजेआई ने कहा, लेकिन क्या यह कहना सही होगा कि विलय के दस्तावेज का अस्तित्व समाप्त हो गया?
सुब्रमण्यम ने कहा, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। तब सीजेआई ने कहा, लेकिन क्या इसे राज्य के संविधान में शामिल किया जाएगा? सुब्रमण्यम बोले, हां, यह होगा। संविधान स्वयं विलय के दस्तावेज की बात करता है। यह बहुत ही सीमित उद्देश्य के लिए था। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में बृहस्पतिवार को भी सुनवाई करेगा।