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AMU Minority Character: शीर्ष कोर्ट की अहम टिप्पणी, एएमयू का 'माइनॉरिटी' दर्जा गैर-अल्पसंख्यकों से कमजोर नहीं

Wed, 10 Jan 2024 09:20 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ज्योति भास्कर Updated Wed, 10 Jan 2024 09:20 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में स्थित अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के अल्पसंख्यक किरदार को लेकर अहम टिप्पणी की है। मुकदमे की सुनवाई सात जजों की संविधान पीठ में हो रही है। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ पीठ की अध्यक्षता कर रहे हैं।

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Supreme Court AMU Minority Character Dilute seven-judge constitution bench CJI Chandrachud
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट में सात जजों की संविधान पीठ ने साफ किया है कि कुछ गैर-अल्पसंख्यकों की नियुक्ति से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) का माइनॉरिटी स्टेटस / प्रकृति कमजोर नहीं होता। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की संविधान पीठ संसद से मिले अल्पसंख्यक दर्जा मामले की सुनवाई कर रही है। पीठ में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेबी पारदीवाला, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, जस्टिस मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा भी शामिल हैं। गुरुवार को भी सुनवाई जारी रहेगी।
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42 साल पहले मिला दर्जा, दशकों से हो रही है जिरह
बता दें कि करीब 42 साल पहले एएमयू अलीगढ़ को अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया था। अदालत ने कहा, विश्वविद्यालय में कुछ प्रशासनिक पदों पर नियुक्त गैर-अल्पसंख्यक उम्मीदवार यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक संस्थान होने का दर्जा कमजोर नहीं करेंगे। संस्था के साथ इनके जुड़ाव के आधार पर नहीं कहा जा सकता कि एएमयू का माइनॉरिटी कैरेक्टर कमजोर होने की आशंका है। अदालत ने साफ किया कि गैर अल्पसंख्यकों की नियुक्तियां उस बिंदु तक नहीं हो सकतीं जहां पूरा प्रशासन गैर-अल्पसंख्यक हाथों में चला जाए।
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लगातार दूसरे दिन सुनवाई
सीजेआई चंद्रचूड़ की पीठ ने बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान कहा, किसी शैक्षणिक संस्थान के प्रशासन का कुछ हिस्सा गैर-अल्पसंख्यक अधिकारी देखते हैं, केवल इस दलील के आधार पर नहीं माना जा सकता कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) का अल्पसंख्यक दर्जा कमजोर होने की आशंका है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ इस जटिल मुद्दे पर लगातार दूसरे दिन सुनवाई की। अदालत ने कहा, संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत देश के सभी अल्पसंख्यकों (धार्मिक या भाषाई) को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अधिकार होगा।
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चीफ जस्टिस ने कहा- सरकार की मदद के बिना काम मुश्किल है
सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, उदाहरण के लिए अगर आपको जमीन नहीं मिलती तो आप भवन निर्माण नहीं कर सकते। इसलिए आपका अस्तित्व उस पट्टे पर निर्भर है जो आपको सरकार से मिलता है... दूसरा, आज के समय में अगर आपको (सरकार से) सहायता नहीं मिलेगी तो आप काम नहीं कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि ये सभी पहलू किसी संस्थान के अस्तित्व, व्यावहारिक अस्तित्व के मद्देनजर प्रासंगिक हो सकते हैं। हालांकि, संस्थान की स्थापना पर इन पहलुओं का कोई असर नहीं पड़ता है। 

संस्था भूमि अनुदान पर आधारित
पीठ ने कहा कि एएमयू के कुछ प्रशासनिक पदों पर गैर-अल्पसंख्यक उम्मीदवार हैं। एएमयू की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन से सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 30 की व्याख्या पर एक महत्वपूर्ण बात कही है। अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन कौन कर सकता है? इस सवाल पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, कोई भी संस्था भूमि अनुदान के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती।

राजीव धवन और कपिल सिब्बल की दलीलें
धवन ने तर्क दिया कि अज़ीज़ बाशा के मुकदमे में शीर्ष अदालत का फैसला 'अब प्रासंगिक कानून नहीं' है। उन्होंने 1981 में संसद से पारित कानून का जिक्र करते हुए कहा, संसद ने एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा बहाल किया। इस मामले में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल भी एक पक्षकार की तरफ से पैरवी कर रहे हैं। उन्होंने बाशा मामले के फैसले को बेहद पुराना करार दिया। सिब्बल ने कहा, 'मैं खुद से एक सवाल पूछना चाहता हूं कि आज अल्पसंख्यकों के पास क्या अधिकार हैं? मुझे सभी मानकों का पालन करना होगा। मैं उचित योग्यता के बिना किसी शिक्षक की नियुक्ति नहीं कर सकता।'

सरकार आरक्षण से वंचित करना चाहती है
सिब्बल ने तर्क दिया, संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत बस थोड़ा सा आरक्षण मिलता है। इसके अलावा कुछ नहीं। संस्थान स्थापना के बाद बस थोड़े से आरक्षण की मांग कर रहा हूं, लेकिन सरकार इसे भी नकारना चाहती है। अगर विश्वविद्यालय के कामकाज में कोई अनुचित हस्तक्षेप होता है, तो AMU के पास इसे चुनौती देने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा, 'प्रशासन में बाहरी लोगों की नियुक्ति से संस्थान का अल्पसंख्यक दर्जा नष्ट नहीं होता सशक्त होने का एकमात्र तरीका उच्च शिक्षा है।

कार्यपालिका संसदीय कानून के खिलाफ नहीं जा सकती
सिब्बल ने तर्क दिया, वे अदालत में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के लिए नहीं, देश के संवैधानिक लोकाचार के पक्ष में खड़े हैं। विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी कोई चीज नहीं, जो सभी के लिए एक ही रूप में उपयुक्त हो। 1981 में संसद से पारित संशोधन के खिलाफ सरकार के तर्कों का जवाब देते हुए सिब्बल ने कहा कि कार्यपालिका संसदीय कानून के खिलाफ नहीं जा सकती। बता दें कि विश्वविद्यालय ने अदालत में तर्क दिया है कि AMU की स्थापना मुस्लिम समुदाय ने की। इसका मकसद समुदाय को शिक्षित और सशक्त बनाना है।

AMU के लिए 1981 में संसद से पारित हुआ कानून
गौरतलब है कि इस मुकदमे को बेहद विवादित अल्पसंख्यक मामले के रूप में देखा जाता है। बता दें कि कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल में संसद से पारित एएमयू (संशोधन) अधिनियम, 1981 के तहत यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जा दिया गया है।

1967 में सुप्रीम कोर्ट का पहला फैसला, 14 साल बाद सरकार ने लौटाया दर्जा
एएमयू के माइनॉरिटी स्टेटस के संबंध में इससे पहले साल 1967 में एस अज़ीज़ बाशा बनाम भारत संघ मुकदमे में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला पारित किया था। इस फैसले में कहा गया था कि एएमयू एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। ऐसे में इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जा सकता है। 1875 में स्थापित इस प्रतिष्ठित संस्थान को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 14 साल बाद अल्पसंख्यक दर्जा वापस मिला था। 1981 में संसद से पारित कानून के माध्यम से तत्कालीन सरकार ने एएमयू को माइनॉरिटी स्टेटस दिया।


2006 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
हालांकि, इस पेचीदा मुकदमे में अहम मोड़ उस समय आया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की पीठ ने 2006 में 1981 के कानून को गलत ठहराया। जनवरी 2006 में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1981 में एएमयू के लिए बने कानून के उस प्रावधान को रद्द कर दिया जिसके तहत विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक दर्जा दिया गया था।
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