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Study: एक फीसदी से भी कम मानसिक रोगी ही देते हैं खुद जानकारी, मरीजों की चुप्पी रोग के निदान में बड़ी बाधा

Sat, 03 Feb 2024 07:05 AM IST
यशोधन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: यशोधन शर्मा Updated Sat, 03 Feb 2024 07:05 AM IST
सार

आईआईटी जोधपुर में स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स (एसओएलए) के सहायक प्रोफेसर डॉ. आलोक रंजन और अमेरिका के कोलंबस में ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ हेल्थ एंड रिहैबिलिटेशन साइंसेज के डॉ. ज्वेल क्रैस्टा के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया है।

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Study Only less than one percent of mental patients give information themselves
मानसिक स्वास्थ्य (सांकेतिक)। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारत में मानसिक बीमारी के बारे में स्वयं जानकारी देने (स्व-रिपोर्टिंग) की दर एक फीसदी से भी कम है। जबकि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो-साइंसेज के 2017 के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत में करीब 19.73 करोड़ लोग मानसिक विकार से पीड़ित थे।

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आईआईटी जोधपुर में स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स (एसओएलए) के सहायक प्रोफेसर डॉ. आलोक रंजन और अमेरिका के कोलंबस में ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ हेल्थ एंड रिहैबिलिटेशन साइंसेज के डॉ. ज्वेल क्रैस्टा के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया है। अध्ययन इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मेंटल हेल्थ सिस्टम्स में प्रकाशित किया गया है।
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अध्ययनकर्ता डॉ. आलोक रंजन का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य विकारों की रिपोर्ट करने में एक बड़ी बाधा समाज में बुरी नजर से देखा जाना है। इसीलिए मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों की रिपोर्ट करने के बारे में लोगों में अनिच्छा बनी रहती है और लोग अक्सर मदद मांगने के बजाय चुप्पी साध लेते हैं। यह समस्या मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों की पहचान करने और उनसे निपटने में बहुत बड़ी बाधा है। अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 8,077 गांवों और 6,181 शहरी क्षेत्रों के 5,55,115 लोगों के आंकड़े एकत्र किए गए थे।
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सामाजिक और आर्थिक असमानताएं भी जिम्मेदार
अध्ययन में एक सामाजिक आर्थिक विभाजन का भी पता चला। इसके तहत भारत में सबसे गरीब लोगों की तुलना में सबसे अमीर आय वर्ग की आबादी में मानसिक विकारों की स्व-रिपोर्टिंग दर 1.73 गुना अधिक पाई गई।

इलाज में निजी क्षेत्र का दबदबा
66.1 फीसदी बाह्य रोगियों की देखभाल और 59.2 फीसदी आंतरिक रोगियों की देखभाल के साथ निजी क्षेत्र मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के एक प्रमुख प्रदाता के रूप में सामने आया है। सरकारी क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधा बहुत अच्छी नहीं है।


सीमित स्वास्थ्य बीमा कवरेज
मानसिक विकारों के लिए अस्पताल में भर्ती लगभग 23 फीसदी लोगों के पास ही राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य बीमा कवरेज था। जिन लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा कवरेज नहीं था उनके लिए इलाज कराना काफी चुनौतीपूर्ण था। अस्पताल में भर्ती और बाह्य रोगियों की देखभाल दोनों के लिए औसत इलाज संबंधीय व्यय सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में निजी क्षेत्र में काफी अधिक देखा गया।

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