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Haryana: सीएम के लिए कांग्रेस हाईकमान तय करेगा 'हुड्डा' का कद, हुआ 2005 का दोहराव तो चलेंगे विधायकों का दांव
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हरियाणा की राजनीति।
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अमर उजाला
विस्तार
हरियाणा विधानसभा के चुनाव में पड़े वोटों की गिनती आठ अक्तूबर को होगी, लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों ने फिलहाल कांग्रेस पार्टी का चेहरा खिला दिया है। एग्जिट पोल में भारी बहुमत के साथ कांग्रेस की सरकार बनती हुई नजर आ रही है। दूसरी तरफ अभी तक भाजपा, सत्ता से दूर जाती हुई दिख रही है। कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री पद को लेकर बयानबाजी शुरु हो गई है। विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण से लेकर प्रचार, बूथ मैनेजमेंट और वोटिंग तक में सक्रिय भूमिका निभाने वाले भूपेंद्र हुड्डा, मुख्यमंत्री की दौड़ में सबसे आगे हैं। हालांकि कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री के लिए कांग्रेस हाईकमान ही 'हुड्डा' का कद तय करेगा।
इस बात से खुद हुड्डा को भी इनकार नहीं है। हुड्डा के करीबियों का कहना है, ये तय है कि वे 2005 में प्रदेश की सत्ता से दूर किए जाने वाले 'भजनलाल' नहीं बनेंगे। अगर कांग्रेस हाईकमान इस तरह का कोई जोखिम लेकर किसी दूसरे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाता है तो उस स्थिति में हुड्डा ने एक आखिरी दांव अपने पास रखा है। कांग्रेस की टिकट पर जीतने वाले कम से कम 40 विधायक ऐसे हो सकते हैं, जो किसी भी सूरत में हुड्डा के अलावा किसी दूसरे नेता को सीएम की कुर्सी पर स्वीकार नहीं करेंगे। विधायकों का दांव, ये इशारा 'हुड्डा' ने भी दिया है।
हरियाणा के विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल के नतीजे कांग्रेस पार्टी के लिए उत्साहवर्धक हैं। अधिकांश एग्जिट पोल के नतीजों में कांग्रेस पार्टी को सरकार बनाने के लिए भारी बहुमत मिलता दिखाई दे रहा है। हालांकि 8 अक्तूबर को वोटों की गिनती के बाद ही सियासत की सही तस्वीर सामने आ सकेगी।एग्जिट पोल में मनोहरलाल खट्टर की साढ़े नौ साल चली सरकार के खिलाफ हाई 'एंटी-इनकम्बेंसी' पर मुहर लगी है। रिपब्लिक पी-मार्क के सर्वे में भाजपा, सत्ता से बाहर होती नजर आ रही है। भाजपा को 90 सीटों में से 27-37, कांग्रेस को 51 से 61 तो अन्य के खाते में तीन से छह सीट मिलने का अनुमान लगाया गया है। रिपब्लिक मैट्रिज ने भाजपा को 18 से 24 तो वहीं कांग्रेस को 55-62 तक मिलने का अनुमान लगाया है। पीपुल्स पल्स का एग्जिट पोल भी कांग्रेस को 49-61 सीटें और भाजपा को 20-32 सीटें बता रहा है। सी वोटर एग्जिट पोल में भाजपा को 27, कांग्रेस को 57 और अन्य को छह सीट मिलने का अनुमान जताया है। सी वोटर के एग्जिट पोल ने कांग्रेस के पक्ष में 43.8 प्रतिशत वोट बताए हैं। भाजपा को 37 प्रतिशत वोट मिले हैं। गत चुनाव के मुकाबले इस बार भाजपा के पक्ष में लगभग एक फीसदी वोटों की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन सीटों के मामले पार्टी बुरी तरह से पिछड़ती हुई नजर आ रही है। सी वोटर ने कांग्रेस के पक्ष में 50 से 58 सीटें बताई हैं। भाजपा को 20-28 सीटें मिलती दिख रही हैं।
इस बार के चुनाव में कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं। सबसे बड़ा मामला तो कुमारी शैलजा का रहा है। भाजपा ने इसे दलित मुद्दे से जोड़कर चुनाव में राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश की है। शैलजा ने चुनाव प्रचार के बीच कहा था कि इस बार कोई दलित व्यक्ति, मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता। पीएम मोदी से लेकर गृह मंत्री शाह और जेपी नड्डा ने चुनावी रैलियों में इस मुद्दे को भुनाने का प्रयास किया। इसके जरिए कांग्रेस पर वार किया गया कि इस पार्टी में दलितों की सुनवाई नहीं होती। मोदी ने प्रचार में कहा था, कांग्रेस सरकार, अस्थिरता के लिए जानी जाती है। कांग्रेस ने दलितों, पिछड़ों, शोषितों के साथ धोखा किया है। अब कांग्रेस, इन जातियों का आरक्षण खत्म करना चाहती है। 2014 में जब हुड्डा, प्रदेश के सीएम हुआ करते थे, तब ऐसा कोई साल नहीं था, जब दलितों के साथ अन्याय नहीं हुआ। अब एग्जिट पोल के सर्वे में भाजपा का यह दांव फेल होता दिख रहा है। दलित समुदाय ने कांग्रेस को वोट किया है।
प्रदेश में कई बार मंत्री रह चुके कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने थोड़ा झिझकते हुए बताया, देखिये कांग्रेस पार्टी में तो मुख्यमंत्री का चयन हाईकमान ही तय करता है। बता दें कि उक्त नेता ने इस बार कांग्रेस की टिकट पर अपने बेटे को चुनाव लड़वाया है। वे कहते हैं, हुड्डा को कांग्रेस हाईकमान दरकिनार नहीं कर सकता। अगर आज प्रदेश का नब्बे फीसदी जाट समुदाय, कांग्रेस पार्टी के साथ है तो उसका श्रेय भूपेंद्र हुड्डा को जाता है। 2019 के एग्जिट पोल, कांग्रेस को दो अंकों में भी मुश्किल से पहुंचा रहे थे। उस साल तो लोकसभा चुनाव में मोदी की हवा चली थी। इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी को 30 सीटें मिली थी। सभी विधायक हुड्डा के नेतृत्व में एकजुट रहे। इस बार तो टिकट बंटवारे में सारी बाजी हुड्डा ही मार ले गए थे। क्या हुआ कि राज्यसभा सांसद रणदीप सुरजेवाला और लोकसभा सांसद जयप्रकाश अपने-अपने बेटों को कांग्रेस की टिकट दिलाने में कामयाब हो गए। कुमारी शैलजा ने कहा था कि वे भी विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती थीं। उन्होंने तो यह भी दिया कि प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया से उनकी बात हुए लंबा वक्त बीत चुका है। हुड्डा के साथ भी उन्होंने तभी मंच साधा किया, जब राहुल गांधी प्रचार के लिए पहुंचे थे।
प्रदेश के राजनीतिक जानकारों का कहना है, वोटों की गिनती में भी अगर एग्जिट पोल वाले नतीजे ही आते हैं तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहला हक भूपेंद्र हुड्डा का है। हालांकि इस बार वे सीएम पद पर दीपेंद्र हुड्डा को बैठाना चाहते हैं। संभव है कि इसके लिए शैलजा और सुरजेवाला जैसे नेता राजी न हों। इस स्थिति में कांग्रेस पार्टी बड़े हुड्डा पर ही दांव लगा सकती है। वजह, ऐसे में कोई भी नेता उनका विरोध नहीं कर सकेगा। इसके अलावा कांग्रेस हाईकमान इस बात से वाकिफ है कि 'हुड्डा' उसे आंख दिखाने की हिम्मत भी रखता है। ऐसा पहले हो चुका है। 2019 में हुड्डा ने पुलवामा हमले के बाद हुई एयर स्ट्राइक और जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 की विदाई, मोदी सरकार के इन फैसलों का समर्थन किया था। उसके बाद जब कांग्रेस पार्टी में असंतुष्ट नेताओं के 'जी23' समूह बनने की बात आई तो हुड्डा उसमें भी आगे रहे। ऐसे में कांग्रेस हाईकमान अगर हुड्डा की जगह किसी दूसरे व्यक्ति को सीएम बनाती है तो वे बगावत कर सकते हैं।
एग्जिट पोल के नतीजों के बाद भूपेंद्र हुड्डा ने दावा किया है कि प्रदेश में, कांग्रेस पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। कांग्रेस हाईकमान, विधायकों से राय लेने के बाद ही मुख्यमंत्री के चेहरे का फैसला करेगी। कांग्रेस में मुख्यमंत्री के चयन की एक निर्धारित प्रक्रिया है। उसमें विधायकों की राय ली जाती है। इसके बाद ही पार्टी आलाकमान कोई फैसला करता है। यहां पर हुड्डा का साफ इशारा था कि पार्टी ने अगर किसी दूसरे व्यक्ति को सीएम बनाने का प्रयास किया तो वे विधायकों का दांव चल सकते हैं। मौजूदा स्थिति में कांग्रेस पार्टी की टिकट पर जीतने वाले अधिकांश विधायकों के हुड्डा के पक्ष में खड़े होने की संभावना है।
कुमारी सैलजा और रणदीप सिंह सुरजेवाला भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं, हुड्डा ने इस सवाल के जवाब में कहा, राजनीति ऐसी चीज है कि कोई भी आकांक्षा रख सकता है। विधायक अपनी राय देंगे, जिसके बाद ही कांग्रेस आलाकमान कोई फैसला करेगा। जानकारों का कहना है कि इस बार कांग्रेस सरकार में डिप्टी सीएम जैसा पद देखने को मिल सकता है। पार्टी को दलित समुदाय, पक्के तौर पर अपने साथ जोड़ना है और दूसरे चुनावी राज्यों में इसका संदेश देना है तो कुमारी शैलजा की लॉटरी लग सकती है। ऐसी स्थिति में संभव है कि दीपेंद्र या हुड्डा परिवार के किसी विश्वासपात्र को डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है। अगर पार्टी हाईकमान, कुमारी शैलजा को किनारे करता है तो प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष उदयभान, जो दलित नेता हैं, उन्हें डिप्टी सीएम की कुर्सी मिल सकती हैं।
प्रदेश में हुड्डा को कांग्रेस हाईकमान इसलिए साइड नहीं कर सकता, क्योंकि जाट वोट, भूपेंद्र हुड्डा के चलते ही कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हुआ है। दूसरा, हुड्डा का प्रभाव प्रदेश के अधिकांश जिलों में है। अगर सुरजेवाला या शैलजा से यह कहा जाए कि वे अपने समर्थक विधायकों की सूची दें तो मुश्किल से पांच छह विधायक भी एकत्रित नहीं हो पाएंगे। कांग्रेस पार्टी के एक तबके में यह चर्चा भी चल रही है कि क्या हरियाणा में 'हुड्डा', 2005 वाले चौ. 'भजनलाल' तो नहीं बन जाएंगे। 2005 के विधानसभा चुनाव में चौ. भजनलाल के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया। कांग्रेस पार्टी ने 67 सीट हासिल कर प्रचंड बहुमत हासिल किया, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने अचानक एक ऐसा फैसला किया, जिसने सबको हैरान कर दिया। भूपेंद्र हुड्डा, चुनाव में जिनका कहीं नाम नहीं था, कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया गया।
इस बार भी चुनाव प्रचार के दौरान, कांग्रेस पार्टी ने हरियाणा में मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा, इस बाबत पत्ते नहीं खोले। 2005 में किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा, मुख्यमंत्री बन सकते हैं। कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी यही लग रहा था कि भजनलाल ही चौथी बार प्रदेश की कमान संभालेंगे, मगर ऐसा नहीं हुआ। उस वक्त विधानसभा चुनाव में सक्रिय न होने के बावजूद हुड्डा की लाटरी लग गई। उन्हें प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया गया। सियासतदान और राजनीतिक के जानकार अब वही सवाल उठा रहे हैं कि कहीं इस बार भी '2005' वाला दोहराव तो नहीं होगा।