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जवाहर बाग: 'पता नहीं कब क्या हो जाए, इसी खौफ में गुजरे ढाई साल'

Sun, 12 Jun 2016 03:12 AM IST
रामकुमार रौतेला/ अमर उजाला, मथुरा
रामकुमार रौतेला/ अमर उजाला, मथुरा Updated Sun, 12 Jun 2016 03:12 AM IST
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story of jawahar bagh mathura disclosed by an state officer of uttar pradesh
परिवार वालों ने भी कहना शुरू कर दिया था कि इस बाग को छोड़ दीजिए - फोटो : ब्यूरो/ अमर उजाला, मथुरा

जवाहर बाग के कब्जाधारियों ने ढाई साल तक बाग के आसपास भय का माहौल बनाए रखा। चाहे जिससे मारपीट की। पुलिसकर्मियों और प्रशासनिक अफसरों तक से भिड़ गए। कब्जाधारियों के दुस्साहस के सबसे पहले और बड़े शिकार उद्यानकर्मी बने।

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बाग को नुकसान पहुंचाने से रोकने पर कब्जाधारी उनसे बार-बार मारपीट करते। इन घटनाओं से खौफ इतना बढ़ा कि जिला उद्यान अधिकारी का कार्यालय ही जवाहर बाग से शिफ्ट करना पड़ा। ढाई साल के उस दौर में हालात क्या थे, जिला उद्यान अधिकारी ने ‘अमर उजाला’ से अपना अनुभव साझा किया...
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सरकारी सेवा में ये दो-ढाई साल का वक्त सबसे चुनौती और तनाव पूर्ण रहा है। खाते-पीते और सोते-जागते हर वक्त जवाहर बाग ही दिमाग में बना रहता था। डर लगा रहता कि पता नहीं कब किसके साथ क्या हादसा हो जाए। परिवार के लोग भी तनाव में रहने लगे थे। दो से ढाई साल खौफ में ही गुजरे।
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जिला उद्यान अधिकारी मुकेश कुमार ने इन्हीं शब्दों के साथ जवाहर बाग में कभी न भुलाए जाने वाले डरावने पलों को याद किया। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि शांतिप्रिय जनपद मथुरा में विभागीय सेवा के दौरान ऐसे दौर से भी गुजरना पड़ेगा। 14 मार्च, 2014 को कब्जाधारियों के आने से कुछ माह पहले ही जवाहर बाग को डीएम ने धरना-प्रदर्शन स्थल के रूप में चयनित किया था। पहले धरना-प्रदर्शन कलक्ट्रेट में होते थे। इसी प्रक्रिया में यह कब्जाधारी जवाहर बाग में पहुंच गए। पहले 1-2 माह तक सब कुछ शांतिपूर्वक चला। किसी को कोई परेशानी नहीं हुई।



( फोटो में जिला उद्यान अधिकारी मुकेश कुमार )

लगता था कि ये चले जाएंगे, लेकिन कुछ समय बाद ही इनकी संख्या बढ़ी और इन्होंने अपने उपयोग के लिए पेड़ों को नष्ट करना शुरू कर दिया। आपत्ति जताई तो कर्मचारियों के साथ मारपीट शुरू हो गई। इसी के कुछ दिन बाद बाग में फलों का ठेका लेने वाले ठेकेदार को पीट दिया। इस तरह इनकी हरकतों ने चिंता बढ़ा दी। आलाधिकारियों को अवगत कराया। कोई कार्रवाई नहीं हुई तो इनके हौसले और बुलंद हो गए।
मुकेश कुमार बताते हैं कि स्थितियां ये पैदा हो गईं कि यहां किसानों ने आना बंद कर दिया। वह खुद इनकी हरकतों से भयभीत रहते थे। हर वक्त डर लगा रहता था कि कोई वारदात न हो जाए। यहां के हालातों से घर वालों को भी चिंता लगी रहती थी। सभी कहते थे कि आफिस का काम बाहर बैठकर ही किया करें। कर्मचारी भी तनावग्रस्त रहने लगे थे। मार्च में तो यहां कार्यालय को भी बंद करना पड़ा।


फैक्ट फाइल...
-06 जून, 2014 को हुई थी कब्जाधारियों के खिलाफ पहली रिपोर्ट
-12 दिन बाद ही फल तोड़ने पर ठेकेदार को पीटा, दूसरी रिपोर्ट
-11 तहरीर दी थीं पुलिस को उद्यान विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों ने
-06 तहरीरों पर ही सदर पुलिस ने दर्ज कीं रिपोर्ट, 16 मार्च, 2016 को अंतिम रिपोर्ट
-06 नोटिस दिए गए रामवृक्ष को जवाहर बाग में आर्थिक क्षति की भरपाई के लिए
-16 मार्च, 2016 को जिला उद्यान अधिकारी कार्यालय स्थानांतरित करना पड़ा 
-1.5 करोड़ तक की क्षति का उद्यान विभाग ने किया है आकलन
-719 करोड़ के करीब है सरकारी दर से बाग की जमीन की कीमत

उद्यान विभाग और कब्जाधारियों के बीच नोटिस का दौर
जवाहर बाग के कब्जाधारियों और जिला उद्यान अधिकारी के बीच नोटिसों का दौर चला। ढाई साल के दौरान छह नोटिस उद्यान अधिकारी ने रामवृक्ष यादव को दिए। इसमें जवाहर बाग में हुई क्षति की पूर्ति को कहा गया। इनका जवाब भी रामवृक्ष यादव और चंदनबोस ने नोटिस के माध्यम से यह कहते हुए दिया कि याचिका 413/20014 सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसमें उक्त नोटिसों को चुनौती दी गई है। अब आपकी कोई भी कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना होगी।

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