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Congress: कहानी उन राज्यों की जहां ज्यादा सीटें पाने के बाद भी कांग्रेस के हाथ से निकली सत्ता, पार्टी भी टूटी
Fri, 19 May 2023 04:08 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Fri, 19 May 2023 04:08 PM IST
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सार
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कांग्रेस में फूट की कहानी
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विस्तार
सालभर के अंदर कर्नाटक दूसरा ऐसा राज्य है, जहां कांग्रेस पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है। कल यानी 20 मई को सिद्धारमैया मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। डीके शिवकुमार उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। हालांकि, पार्टी में अभी भी हलचल तेज है। डीके शिवकुमार उप-मुख्यमंत्री पद मिलने से खुश नहीं हैं, तो कई और भी नेता हैं जो नाराज हो चुके हैं। इनमें पूर्व उप-मुख्यमंत्री जी. परमेश्वर भी शामिल हैं। परमेश्वर तो यहां तक बोल चुके हैं कि अगर सूबे को दलित सीएम नहीं मिला तो वह इसका विरोध करेंगे। खैर, अब सरकार का गठन होने जा रहा है। इसके बाद संभव है कि कई अन्य नेताओं की नाराजगी सामने आ जाए।कांग्रेस में चुनाव जीतने के बाद पार्टी में एकजुटता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। ये पहली बार नहीं है, जब पार्टी को बगावत का डर सता रहा है। इसके पहले भी कई ऐसे राज्य हैं, जहां ज्यादा सीटें हासिल करने के बावजूद पार्टी या तो सरकार बनाने से चूक गई या फिर सरकार बनाने के बाद सत्ता हाथ से चली गई।
आज हम ऐसे ही राज्यों की कहानी बताएंगे। कैसे ज्यादा सीटें हासिल करने के बावजूद कांग्रेस सत्ता बरकरार नहीं रख पाई। आइए जानते हैं...
कांग्रेस में फूट की कहानी
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शुरूआत गोवा से करते हैं
2017 में यहां हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। गोवा में विधानसभा की 40 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए 21 सीटों की जरूरत पड़ती है। कांग्रेस ने चुनाव में 17 सीटों पर जीत हासिल की थी। पार्टी को सरकार बनाने के लिए महज चार विधायकों की जरूरत थी। वहीं, दूसरी तरफ भाजपा ने 13 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा ने कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए निर्दलीय और क्षेत्रीय दलों से गठबंधन कर सरकार बना ली। बाद में कांग्रेस के कई विधायक भी भाजपा में शामिल हो गए थे। यहां ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद कांग्रेस सरकार बनाने से तो चूकी ही, साथ में पार्टी के अंदर फूट भी पड़ गई।
2017 में यहां हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। गोवा में विधानसभा की 40 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए 21 सीटों की जरूरत पड़ती है। कांग्रेस ने चुनाव में 17 सीटों पर जीत हासिल की थी। पार्टी को सरकार बनाने के लिए महज चार विधायकों की जरूरत थी। वहीं, दूसरी तरफ भाजपा ने 13 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा ने कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए निर्दलीय और क्षेत्रीय दलों से गठबंधन कर सरकार बना ली। बाद में कांग्रेस के कई विधायक भी भाजपा में शामिल हो गए थे। यहां ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद कांग्रेस सरकार बनाने से तो चूकी ही, साथ में पार्टी के अंदर फूट भी पड़ गई।
मध्य प्रदेश में दो साल भी पूरी नहीं चली कांग्रेस की सरकार
2018 की बात है। यहां विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। 230 सीटों वाले सूबे में कांग्रेस को बहुमत के लिए 116 सीटों की जरूरत थी। हालांकि, चुनाव में इससे महज दो सीटें कम पार्टी को मिलीं। किसी तरह कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ ने इसकी व्यवस्था की। सरकार भी बन गई। उस वक्त भी सीएम पद को लेकर कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के बीच जंग थी। बाजी मार ले गए कमलनाथ। हालांकि, ज्यादा दिन तक उनकी ये खुशी बरकरार नहीं रही। दो साल भी पूरे नहीं हुए थे कि 2020 में पार्टी के अंदर फूट पड़ गई। ज्योतिरादित्य ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। उनके समर्थन में कई विधायकों ने भी पार्टी छोड़ दी। कमलनाथ की सरकार गिर गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बन गए। सिंधिया को इस बगावत का भाजपा ने इनाम दिया। उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री पद मिल गया।
2018 की बात है। यहां विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। 230 सीटों वाले सूबे में कांग्रेस को बहुमत के लिए 116 सीटों की जरूरत थी। हालांकि, चुनाव में इससे महज दो सीटें कम पार्टी को मिलीं। किसी तरह कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ ने इसकी व्यवस्था की। सरकार भी बन गई। उस वक्त भी सीएम पद को लेकर कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के बीच जंग थी। बाजी मार ले गए कमलनाथ। हालांकि, ज्यादा दिन तक उनकी ये खुशी बरकरार नहीं रही। दो साल भी पूरे नहीं हुए थे कि 2020 में पार्टी के अंदर फूट पड़ गई। ज्योतिरादित्य ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। उनके समर्थन में कई विधायकों ने भी पार्टी छोड़ दी। कमलनाथ की सरकार गिर गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बन गए। सिंधिया को इस बगावत का भाजपा ने इनाम दिया। उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री पद मिल गया।
मणिपुर : साल 2017 की बात है। सूबे में विधानसभा चुनाव हुए थे। कांग्रेस को 28 सीटें मिली थी। बहुमत के लिए पार्टी को सिर्फ चार सीटों की जरूरत थी। बीजेपी के पास 21 सीटें थीं। दिल्ली से लेकर मणिपुर तक कांग्रेस का कोई भी नेता चार सीटें नहीं जुटा सका। भाजपा ने छोटे-छोटे दलों के साथ मिलकर सरकार बना ली। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई है।
मेघालय : 2018 में मेघालय में 59 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए थे। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी थी लेकिन इसके बाद भी वह बहुमत से दूर रह गई थी। पार्टी को 59 सीटों में से 21 पर जीत मिली थी। वोट प्रतिशत 28.5 फीसदी था। दूसरे नंबर पर नेशनल पीपल्स पार्टी (NPP) रही, जिसके खाते में 20 सीटें आई थीं। बीजेपी को राज्य में सिर्फ दो सीटों पर ही जीत मिली थी। पार्टी 47 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। वोट प्रतिशत 9.6 फीसदी रहा था। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (UDP) को छह सीटों पर जीत मिली थी। तीन सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार जीते थे। कांग्रेस को बहुमत का आंकड़ा छूने के लिए 10 सीटों की जरूरत थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। उधर, एनपीपी ने भाजपा, यूडीपी व अन्य निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन हासिल कर सरकार बना ली। NPP अध्यक्ष कॉनराड संगमा ने छह मार्च 2018 को CM पद की शपथ ली थी। संगमा ने 34 विधायकों का समर्थन हासिल किया था। 19 विधायक उनकी पार्टी से थे। दो विधायक बीजेपी के भी उनके साथ थे। PDF के चार विधायक, हिल स्टेट डेमोक्रेटिक पार्टी (HSPDP) के दो विधायक और एक निर्दलीय विधायक भी सरकार में शामिल हुए।