{"_id":"65a794fceeaa9d169403b13b","slug":"southwest-monsoon-rain-study-ceew-2012-to-2022-over-10-per-cent-increase-2024-01-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"SW Monsoon: पिछले दशक में जमकर बरसी इंद्रदेव की कृपा, 55 फीसदी तहसीलों में 10 फीसदी अधिक बारिश; स्टडी में दावा","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
SW Monsoon: पिछले दशक में जमकर बरसी इंद्रदेव की कृपा, 55 फीसदी तहसीलों में 10 फीसदी अधिक बारिश; स्टडी में दावा
Wed, 17 Jan 2024 02:21 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Wed, 17 Jan 2024 02:21 PM IST
सार
खेती-किसानी से जुड़े श्रमिकों को मानसून की बारिश से बड़ी आस होती है। एक स्टडी में दावा किया गया है कि पिछले एक दशक के दौरान, आधे से अधिक भारत में दक्षिण पश्चिम मानसून की बारिश 10 फीसद से भी अधिक हुई है। साल 2012 से 2022 के बीच हुई मानसून की बारिश का अध्ययन किया गया है। स्टडी में अंतरिम बजट 2024 से पहले जरूरी उपायों पर बात की गई है।
विज्ञापन
2012 से 2022 के दौरान दक्षिण पश्चिम मानसून की बारिश पर स्टडी में बड़ा दावा
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
दक्षिण पश्चिम मानसून की बारिश पर अहम स्टडी सामने आई है। एक स्टडी में दावा किया गया है कि पिछले एक दशक में इंद्रदेव की कृपा जमकर बरसी है। देश के लगभग 55 फीसदी तहसीलों में 10 फीसदी से भी अधिक बारिश दर्ज की गई है। अध्ययन में दावा किया गया है कि पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों और जलवायु परिवर्तन के बावजूद 2012 से 2022 के दौरान आधे से अधिक भारत में जमकर बारिश हुई। स्टडी के मुताबिक पिछले एक दशक के दौरान 11 प्रतिशत तहसीलों में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश में गिरावट भी देखी गई।
40 साल की बारिश का डेटा; इन इलाकों में कम हुई बारिश
बारिश की मात्रा पर स्टडी करने वाली संस्था एक स्वतंत्र थिंक टैंक- 'द काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) है। इसके विश्लेषण के मुताबिक पूरे भारत की 4500 से अधिक तहसीलों में पिछले 40 साल की बारिश के डेटा का अध्ययन किया गया। जिन तहसीलों में कम बारिश हुई है उसमें सिंधु-गंगा के मैदानी इलाके प्रमुख हैं। पूर्वोत्तर भारत और हिमालय के ऊपरी इलाकों में भी बारिश कम हुई है। खास बात ये है कि इन क्षेत्रों को खेती-किसान के लिहाज से काफी अहम माना जाता है। प्रकृति के नाजुक हालात के कारण जलवायु परिवर्तन की घटनाओं का भी इन इलाकों में अधिक असर होता है।
भारत में बारिश का बदलता पैटर्न; इन राज्यों पर पड़ी मार
इस स्टडी के मुताबिक राजस्थान, गुजरात, मध्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कुछ हिस्से पारंपरिक रूप से शुष्क माने जाते हैं। इनके लगभग एक चौथाई तहसीलों में जून-सितंबर की अवधि में बारिश 30 फीसदी से भी अधिक दर्ज की गई। 'भारत में बारिश के बदलते पैटर्न को समझने' के मकसद से हुए इस अध्ययन में कहा गया है कि बारिश के बदलते पैटर्न का कारण जलवायु परिवर्तन की तेज दर है। इन तहसीलों में कम अवधि में अधिक बारिश होना चिंताजनक माना गया है। अध्ययन के मुताबिक बारिश के कारण अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं भी अधिक हो रही हैं।
विज्ञापन
बिहार, उत्तराखंड, असम और मेघालय का मंजर
बारिश में 10 फीसदी से भी अधिक बढ़ोतरी को बेहद उत्साहजनक नहीं माना जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि बारिश जरूरत के मुताबिक अलग-अलग मौसमों में नहीं हुई। जिन तहसीलों में दक्षिण पश्चिम मानसून की बारिश कम हुई है, इसमें 87 फीसदी प्रदेश- बिहार, उत्तराखंड के साथ-साथ असम और मेघालय जैसे प्रदेश भी शामिल हैं। खरीफ फसल की बुआई के लिए अहम जून-जुलाई के दौरान बारिश में कमी की मार झेलने वाले किसानों को उत्पादन खराब होने का दंश भी झेलना पड़ा है।
पिछले एक दशक में हर साल हुई ऐसी घटना चिंताजनक
CEEW ने अपनी स्टडी में कहा कि पिछले एक दशक में चार या अधिक दिन ऐसे रहे जब भारी बारिश दर्ज की गई। दक्षिण पश्चिम मॉनसून की बारिश वाले 31 फीसदी तहसीलों में ऐसा देखा गया। 2012 के पहले वाले 30 साल की तुलना बीते एक दशक से की गई है। बारिश का अध्ययन इसलिए भी अहम है क्योंकि देश की खेती का लगभग 52 फीसदी हिस्सा शुद्ध रूप से मॉनसून में होने वाली बारिश पर निर्भर होता है। खेती के अलावा इस बारिश का महत्व पीने के पानी के नजरिए से भी अहम है, क्योंकि जलाशय इससे रिचार्ज होते हैं।
अंतरिम बजट पर होंगी नजरें; खाने-पीने पर भी मानसून का असर
स्टडी करने वाली संस्था के प्रमुख विश्वास चितले के मुताबिक 2024 में भारत सरकार अंतरिम बजट पेश करेगी। इसमें अनियमित बारिश से होने वाले असर से निपटने के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित होने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था को भविष्य में कैसे अधिक सुरक्षित किया जा सकता है, इस पर मंथन जरूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि मॉनसून भोजन, पीने के पानी और ऊर्जा परिवर्तन (energy transition) को भी प्रभावित करता है।
विज्ञापन
40 साल की बारिश का डेटा; इन इलाकों में कम हुई बारिश
बारिश की मात्रा पर स्टडी करने वाली संस्था एक स्वतंत्र थिंक टैंक- 'द काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) है। इसके विश्लेषण के मुताबिक पूरे भारत की 4500 से अधिक तहसीलों में पिछले 40 साल की बारिश के डेटा का अध्ययन किया गया। जिन तहसीलों में कम बारिश हुई है उसमें सिंधु-गंगा के मैदानी इलाके प्रमुख हैं। पूर्वोत्तर भारत और हिमालय के ऊपरी इलाकों में भी बारिश कम हुई है। खास बात ये है कि इन क्षेत्रों को खेती-किसान के लिहाज से काफी अहम माना जाता है। प्रकृति के नाजुक हालात के कारण जलवायु परिवर्तन की घटनाओं का भी इन इलाकों में अधिक असर होता है।
विज्ञापन
भारत में बारिश का बदलता पैटर्न; इन राज्यों पर पड़ी मार
इस स्टडी के मुताबिक राजस्थान, गुजरात, मध्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कुछ हिस्से पारंपरिक रूप से शुष्क माने जाते हैं। इनके लगभग एक चौथाई तहसीलों में जून-सितंबर की अवधि में बारिश 30 फीसदी से भी अधिक दर्ज की गई। 'भारत में बारिश के बदलते पैटर्न को समझने' के मकसद से हुए इस अध्ययन में कहा गया है कि बारिश के बदलते पैटर्न का कारण जलवायु परिवर्तन की तेज दर है। इन तहसीलों में कम अवधि में अधिक बारिश होना चिंताजनक माना गया है। अध्ययन के मुताबिक बारिश के कारण अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं भी अधिक हो रही हैं।
विज्ञापन
बिहार, उत्तराखंड, असम और मेघालय का मंजर
बारिश में 10 फीसदी से भी अधिक बढ़ोतरी को बेहद उत्साहजनक नहीं माना जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि बारिश जरूरत के मुताबिक अलग-अलग मौसमों में नहीं हुई। जिन तहसीलों में दक्षिण पश्चिम मानसून की बारिश कम हुई है, इसमें 87 फीसदी प्रदेश- बिहार, उत्तराखंड के साथ-साथ असम और मेघालय जैसे प्रदेश भी शामिल हैं। खरीफ फसल की बुआई के लिए अहम जून-जुलाई के दौरान बारिश में कमी की मार झेलने वाले किसानों को उत्पादन खराब होने का दंश भी झेलना पड़ा है।
पिछले एक दशक में हर साल हुई ऐसी घटना चिंताजनक
CEEW ने अपनी स्टडी में कहा कि पिछले एक दशक में चार या अधिक दिन ऐसे रहे जब भारी बारिश दर्ज की गई। दक्षिण पश्चिम मॉनसून की बारिश वाले 31 फीसदी तहसीलों में ऐसा देखा गया। 2012 के पहले वाले 30 साल की तुलना बीते एक दशक से की गई है। बारिश का अध्ययन इसलिए भी अहम है क्योंकि देश की खेती का लगभग 52 फीसदी हिस्सा शुद्ध रूप से मॉनसून में होने वाली बारिश पर निर्भर होता है। खेती के अलावा इस बारिश का महत्व पीने के पानी के नजरिए से भी अहम है, क्योंकि जलाशय इससे रिचार्ज होते हैं।
अंतरिम बजट पर होंगी नजरें; खाने-पीने पर भी मानसून का असर
स्टडी करने वाली संस्था के प्रमुख विश्वास चितले के मुताबिक 2024 में भारत सरकार अंतरिम बजट पेश करेगी। इसमें अनियमित बारिश से होने वाले असर से निपटने के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित होने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था को भविष्य में कैसे अधिक सुरक्षित किया जा सकता है, इस पर मंथन जरूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि मॉनसून भोजन, पीने के पानी और ऊर्जा परिवर्तन (energy transition) को भी प्रभावित करता है।