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RSS: संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द हटाने की मांग तेज, ऑर्गेनाइजर में लिखा गया लेख

Mon, 14 Jul 2025 10:10 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पवन पांडेय Updated Mon, 14 Jul 2025 10:10 PM IST
सार

संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द हटाने की मांग तेज होने लगी है। पहले आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबाले की मांग फिर आरएसएस से जुड़ी पत्रिका पांचजन्य और अब ऑर्गेनाइजर में इसे लेकर लेख लिखा गया है।

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'Socialist', 'secular' in Preamble ideological landmines; time to undo: Article in RSS-linked weekly
ऑर्गेनाइजर, आरएसएस से जुड़ी साप्ताहिक पत्रिका - फोटो : X @eOrganiser

विस्तार

आरएसएस से जुड़ी साप्ताहिक पत्रिका ऑर्गेनाइजर में छपे एक लेख में संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्दों को वैचारिक बारूदी सुरंगें बताया गया है। लेख में दावा किया गया है कि ये शब्द भारत के धार्मिक मूल्यों को कमजोर करने और राजनीतिक तुष्टिकरण को बढ़ावा देने के लिए डाले गए थे। लेख में कहा गया है कि इन शब्दों को 1976 में इमरजेंसी के दौरान 42वें संशोधन के जरिए जोड़ा गया था, जब लोकतंत्र दबाव में था और विपक्षी नेता जेलों में बंद थे।
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लेख की प्रमुख बातें
इस लेख में कहा गया है कि प्रस्तावना में ये दो शब्द जोड़ना संवैधानिक धोखाधड़ी था। यह बदलाव तब हुआ जब संसद दबाव में थी और मीडिया पर सेंसरशिप लगी हुई थी। संविधान सभा ने कभी इन शब्दों को मंजूरी नहीं दी थी।
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लेख का तर्क क्या है?
लेखक डॉ. निरंजन बी. पूजार का कहना है कि भारत एक धर्मनिष्ठ (धार्मिक मूल्यों वाला) देश है, न कि एक नास्तिक समाजवादी राज्य। 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष शब्द भारतीय संस्कृति और लोकतंत्र की आत्मा से मेल नहीं खाते। इन शब्दों ने सरकार को हिंदू मंदिरों में दखल देने, धार्मिक शिक्षा पर नियंत्रण रखने और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में हिंदुओं के साथ भेदभाव करने का बहाना दे दिया।

धर्मनिरपेक्षता पर लेख की आपत्ति
लेख के अनुसार भारत में धर्मनिरपेक्षता का मतलब धर्म से दूरी नहीं रहा, बल्कि यह एक राजनीतिक हथियार बन गया है। इसमें अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार दिए जाते हैं, जबकि बहुसंख्यकों (विशेषकर हिंदुओं) को बराबरी नहीं मिलती।  लेख का आरोप है कि यह शब्द हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किया गया।


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समाजवाद पर लेख की राय
समाजवाद को लेख ने 'विफल और पुरानी विचारधारा' कहा। लेख में बताया गया कि समाजवाद ने सरकारी नियंत्रण बढ़ाया, व्यक्तिगत उद्यमिता को दबाया, और आर्थिक रुकावटें खड़ी कीं। 1990 के दशक में जब लाइसेंस-कोटा राज खत्म हुआ, तब जाकर देश को असली आर्थिक प्रगति मिली।

आरएसएस महासचिव की भी मांग
कुछ दिन पहले आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने भी इन दो शब्दों पर राष्ट्रीय बहस की मांग की थी। उनका कहना था कि ये शब्द संविधान में शुरुआत से नहीं थे, और इनकी वास्तविक जरूरत पर अब पुनर्विचार होना चाहिए। पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर ने 5 जुलाई को एक संपादकीय में लिखा कि अगर इमरजेंसी को कांग्रेस खुद गलती मानती है, तो उस समय किए गए संवैधानिक संशोधन भी गलत हैं। उन्होंने कहा, 'अगर राहुल गांधी सच में इमरजेंसी को गलती मानते हैं, तो उन्हें संसद में इस संशोधन को हटाने की पहल करनी चाहिए।'
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