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POK: नालंदा के बाद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में उठी यह यूनिवर्सिटी बनाने की मांग, PM मोदी से ली प्रेरणा
सार
सेव शारदा कमेटी कश्मीर से जुड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता तनवीर अहमद ने अमर उजाला से खास बातचीत में बताया कि कभी शारदा पीठ धार्मिक आस्था का केंद्र होने के अलावा अपनी शिक्षा के लिए भी प्रसिद्ध था। वहीं, जब भारत में इसके समकालीन नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का पुनरोद्धार हो रहा है, तो शारदा पीठ विश्वविद्यालय का भी पुनरोद्धार होना चाहिए।
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सामाजिक कार्यकर्ता तनवीर अहमद।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जून महीने में बिहार के राजगीर में 1600 साल पुरानी नालंदा यूनिवर्सिटी के नए परिसर का उद्घाटन किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रेरणा लेते हुए पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में भी अब शारदा पीठ के पुनरोद्धार की मांग शुरू हो गई है। शारदा पीठ विश्वविद्यालय की गिनती कभी इस्लामाबाद के पास स्थित तक्षशिला विश्वविद्यालय और बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय के समकक्ष होती थी। वहीं अब इस यूनिवर्सिटी के पुनरोद्धार का जिम्मा वहां के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता तनवीर अहमद ने उठाया है। ये वही शख्स हैं, जिन्होंने पीओके स्थित शारदा पीठ कुंड का पवित्र जल एकत्र कर उसे अयोध्या में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में इस्तेमाल करने के लिए ब्रिटेन से भारत भेजा था।
शारदा पीठ विश्वविद्यालय का हो पुनरोद्धार
सेव शारदा कमेटी कश्मीर से जुड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता तनवीर अहमद ने अमर उजाला से खास बातचीत में बताया कि कभी शारदा पीठ धार्मिक आस्था का केंद्र होने के अलावा अपनी शिक्षा के लिए भी प्रसिद्ध था। वहीं, जब भारत में इसके समकालीन नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का पुनरोद्धार हो रहा है, तो शारदा पीठ विश्वविद्यालय का भी पुनरोद्धार होना चाहिए। उन्होंने बताया कि उन्होंने शारदा पीठ विश्वविद्यालय के पुनरोद्धार की मांग को लेकर 400 किमी पैदल यात्रा करने का फैसला किया है। 27 जुलाई को उन्होंने इस यात्रा की शुरुआत अपने पैतृक गांव गुरुत्ता, तहसील सेहंसा, जिला कोटली, पाक अधिकृत कश्मीर के मीरपुर डिविजन से कर दी है।
बता दें कि तनवीर अहमद वही शख्स हैं, जिन्होंने इसी साल 11 मई को ‘पाकिस्तान से लेकर रहेंगे आजादी' मार्च में सक्रिय भूमिका निभाई थी और मुजफ्फराबाद तक बड़ा मार्च निकाला था। इस मार्च में काफी हिंसा भी हुई थी। इससे पहले तनवीर को 2020 में दादयाल इलाके में पाकिस्तानी झंडा उतारने के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया था।
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400 किमी चलेंगे पैदल
तनवीर अहमद ने बताया कि वे पैदल सेहंसा से सेहरमंडी, बरालि और कोटली होते हुए नीलम घाटी स्थित शारदा पीठ तक जाएंगे, जिसकी दूरी तकरीबन 400 किमी है। अगले तीन दिन में वे जिले की राजधानी कोटली पहुंच जाएंगे, जहां बड़ी संख्या में लोग उनसे जुड़ने का इंतजार कर रहे हैं। उनकी यह यात्रा डेढ़ महीने में पूरी होगी औऱ वे हर रोज लोगों से मिलते हुए 5-10 किमी ही पैदल चलते हैं। उन्होंने बताया कि हम पीओके (उनकी भाषा में आजाद जम्मू-कश्मीर) की सड़क या खेत पर आम आदमी के बीच ज्ञान और जागरूकता के अंतर को पाटने का प्रयास कर रहे हैं। साथ ही, आधुनिक 21वीं सदी की सरकार चलाने की मांग भी कर रहे हैं। 1947 से जब से लोकतंत्र या जन सरकारों का एलान हुआ है, तो हमने एक राष्ट्र या देश के तौर पर बहुत कुछ नहीं सीखा है। आज के समय में सरकार या पूर्ण राज्य की मांग करना 1947 की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल है। शारदा यूनिवर्सिटी उस अंतर को पाट सकती है।
पाकिस्तानी सेना ने तोड़ दी थी तख्ती
तनवीर अहमद के मुताबिक पिछले साल उन्होंने शारदा यूनिवर्सिटी की नींव रखी थी। शारदा पीठ के किनारे मधुमती नदी के पास स्थित चिनार के दरख्त पर उन्होंने संगमरमर से बनी शारदा यूनिवर्सिटी के नाम की एक तख्ती भी लगाई थी। लेकिन बाद में पाकिस्तानी सेना और स्थानीय प्रशासन ने उसे तोड़ कर फैंक दिया था। इसे लेकर उनकी वहां मौजूद पाकिस्तानी सेना से तीखी बहस भी हुई थी। वह बताते हैं कि पहले वे कुछ दिनों के लिए वहां जा रहे हैं, लेकिन इस बार वे लंबे वक्त तक वहां रहेंगे। जहां उनके साथ शारदा पीठ के आसपास रहने वाले उनकी कम्यूनिटी के लोग भी उनके साथ जुड़ेंगे। वह कहते हैं कि अब उसका निर्माण शुरू करने का वक्त आ गया है। क्योंकि यह सभ्यताओं के पुनरोत्थान का वक्त है।
आदि शंकराचार्य भी आ चुके हैं शारदा विश्वविद्यालय
तनवीर अहमद के मुताबिक 6वीं से 12वीं शताब्दी के बीच दूर-दूर से विद्वान ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस स्थान पर आते थे। वहीं चौथी शताब्दी में चीनी तीर्थयात्री ह्वेन त्सांग ने इस स्थान का दौरा किया था और पाया था कि यह शिक्षा का एक समृद्ध केंद्र था। वह बताते हैं कि उन्हें यह भी पता चला है कि हिंदू संत आदि शंकराचार्य भी इस प्रसिद्ध विश्वविद्यालय का भ्रमण करने आए थे। उन्होंने आठवीं शताब्दी में हिंदू धर्म को पुनर्जीवित करने के लिए यह यात्रा की थी। उस वक्त केवल चुनिंदा छात्र ही दर्शन, विज्ञान और धर्म के बारे में जानने के लिए यहां आते थे। यह जगह मुजफ्फराबाद से लगभग 200 किलोमीटर (124 मील) दूर पहाड़ों में स्थित है, जिसे दुनिया के सबसे प्रमुख मंदिर विश्वविद्यालयों में से एक माना जाता था।
मुस्लिम राजा भी करते थे इस स्थल का सम्मान
मुजफ्फराबाद स्थित एजेके विश्वविद्यालय की ललित एवं कला विभाग की प्रमुख रुखसाना खान के मुताबिक, नीलम नदी के बाएं किनारे पर स्थित शारदा पीठ का दर्शन करने 11वीं शताब्दी तक लगभग 50,000 तीर्थयात्री इस स्थल पर आते थे। मंदिर के दक्षिणी किनारे पर प्रतिष्ठित मधुमती नदी बहती है, जिसे शारदा या खुटचल नदी के नाम से भी जाना जाता है। पुराने वक्त में, तीर्थयात्री मंदिर में प्रवेश करने से पहले मधुमती नदी के "पवित्र" जल में स्नान करते थे। वहीं, 13वीं और 14वीं सदी के कश्मीर के मुस्लिम राजा भी इस स्थल पर आते थे और इसके प्रति सम्मान प्रकट करते थे। 19वीं शताब्दी में अविभाजित जम्मू और कश्मीर के हिंदू डोगरा शासकों के शासनकाल के दौरान इस स्थल का कुछ जीर्णोद्धार कार्य हुआ था। लेकिन इसके बाद बाढ़ ने पत्थर से बनी इस संरचना की दक्षिणी दीवारें बहा दी थीं और तब से इसकी कभी मरम्मत नहीं की गई।
शारदा के पास हैं सरस्वती, नारदा और नरील झीलें
शारदा इवोल्यूशन ऑफ हिस्ट्री नामक पुस्तक में लिखा गया है कि यह स्थल मूल रूप से तीन धर्मों बौद्ध, हिंदू और मुस्लिम के अनुयायियों द्वारा पूजनीय पूजा स्थल था। मुख्य इमारत के निकट उत्खनन के दौरान उत्खननकर्ताओं को प्रागैतिहासिक युग और कांस्य युग की बहुमूल्य और परिष्कृत आभूषण, उपकरण और कलाकृतियां भी मिली हैं। मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल पत्थर की शिलाएं नारदा शिखर से लाई गई थीं। मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल किए गए नक्काशीदार पत्थर शारदा और उसके आसपास नहीं मिलते हैं, बल्कि ये पत्थर सरस्वती झील के पास पाए जाते हैं। बर्फ से ढके नारदा पहाड़ पर तीन ऊंची झीलें हैं, जिनके पानी को हिंदू पवित्र मानते हैं। उनमें से एक है सरस्वती झील। जबकि अन्य हैं नारदा झील- जिसे धन और भाग्य की देवी लक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है- और नरील झील। वहीं इसका शारदा नाम कश्मीरी भाषा की शारदा लिपि के नाम पर रखा गया है। किताब के मुताबिक शारदा सभ्यताओं का एक समूह रहा है, जिसमें हूण और आर्य सभ्यताएं निवास करती रही हैं।
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शारदा पीठ विश्वविद्यालय का हो पुनरोद्धार
सेव शारदा कमेटी कश्मीर से जुड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता तनवीर अहमद ने अमर उजाला से खास बातचीत में बताया कि कभी शारदा पीठ धार्मिक आस्था का केंद्र होने के अलावा अपनी शिक्षा के लिए भी प्रसिद्ध था। वहीं, जब भारत में इसके समकालीन नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का पुनरोद्धार हो रहा है, तो शारदा पीठ विश्वविद्यालय का भी पुनरोद्धार होना चाहिए। उन्होंने बताया कि उन्होंने शारदा पीठ विश्वविद्यालय के पुनरोद्धार की मांग को लेकर 400 किमी पैदल यात्रा करने का फैसला किया है। 27 जुलाई को उन्होंने इस यात्रा की शुरुआत अपने पैतृक गांव गुरुत्ता, तहसील सेहंसा, जिला कोटली, पाक अधिकृत कश्मीर के मीरपुर डिविजन से कर दी है।
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बता दें कि तनवीर अहमद वही शख्स हैं, जिन्होंने इसी साल 11 मई को ‘पाकिस्तान से लेकर रहेंगे आजादी' मार्च में सक्रिय भूमिका निभाई थी और मुजफ्फराबाद तक बड़ा मार्च निकाला था। इस मार्च में काफी हिंसा भी हुई थी। इससे पहले तनवीर को 2020 में दादयाल इलाके में पाकिस्तानी झंडा उतारने के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया था।
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400 किमी चलेंगे पैदल
तनवीर अहमद ने बताया कि वे पैदल सेहंसा से सेहरमंडी, बरालि और कोटली होते हुए नीलम घाटी स्थित शारदा पीठ तक जाएंगे, जिसकी दूरी तकरीबन 400 किमी है। अगले तीन दिन में वे जिले की राजधानी कोटली पहुंच जाएंगे, जहां बड़ी संख्या में लोग उनसे जुड़ने का इंतजार कर रहे हैं। उनकी यह यात्रा डेढ़ महीने में पूरी होगी औऱ वे हर रोज लोगों से मिलते हुए 5-10 किमी ही पैदल चलते हैं। उन्होंने बताया कि हम पीओके (उनकी भाषा में आजाद जम्मू-कश्मीर) की सड़क या खेत पर आम आदमी के बीच ज्ञान और जागरूकता के अंतर को पाटने का प्रयास कर रहे हैं। साथ ही, आधुनिक 21वीं सदी की सरकार चलाने की मांग भी कर रहे हैं। 1947 से जब से लोकतंत्र या जन सरकारों का एलान हुआ है, तो हमने एक राष्ट्र या देश के तौर पर बहुत कुछ नहीं सीखा है। आज के समय में सरकार या पूर्ण राज्य की मांग करना 1947 की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल है। शारदा यूनिवर्सिटी उस अंतर को पाट सकती है।
पाकिस्तानी सेना ने तोड़ दी थी तख्ती
तनवीर अहमद के मुताबिक पिछले साल उन्होंने शारदा यूनिवर्सिटी की नींव रखी थी। शारदा पीठ के किनारे मधुमती नदी के पास स्थित चिनार के दरख्त पर उन्होंने संगमरमर से बनी शारदा यूनिवर्सिटी के नाम की एक तख्ती भी लगाई थी। लेकिन बाद में पाकिस्तानी सेना और स्थानीय प्रशासन ने उसे तोड़ कर फैंक दिया था। इसे लेकर उनकी वहां मौजूद पाकिस्तानी सेना से तीखी बहस भी हुई थी। वह बताते हैं कि पहले वे कुछ दिनों के लिए वहां जा रहे हैं, लेकिन इस बार वे लंबे वक्त तक वहां रहेंगे। जहां उनके साथ शारदा पीठ के आसपास रहने वाले उनकी कम्यूनिटी के लोग भी उनके साथ जुड़ेंगे। वह कहते हैं कि अब उसका निर्माण शुरू करने का वक्त आ गया है। क्योंकि यह सभ्यताओं के पुनरोत्थान का वक्त है।
आदि शंकराचार्य भी आ चुके हैं शारदा विश्वविद्यालय
तनवीर अहमद के मुताबिक 6वीं से 12वीं शताब्दी के बीच दूर-दूर से विद्वान ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस स्थान पर आते थे। वहीं चौथी शताब्दी में चीनी तीर्थयात्री ह्वेन त्सांग ने इस स्थान का दौरा किया था और पाया था कि यह शिक्षा का एक समृद्ध केंद्र था। वह बताते हैं कि उन्हें यह भी पता चला है कि हिंदू संत आदि शंकराचार्य भी इस प्रसिद्ध विश्वविद्यालय का भ्रमण करने आए थे। उन्होंने आठवीं शताब्दी में हिंदू धर्म को पुनर्जीवित करने के लिए यह यात्रा की थी। उस वक्त केवल चुनिंदा छात्र ही दर्शन, विज्ञान और धर्म के बारे में जानने के लिए यहां आते थे। यह जगह मुजफ्फराबाद से लगभग 200 किलोमीटर (124 मील) दूर पहाड़ों में स्थित है, जिसे दुनिया के सबसे प्रमुख मंदिर विश्वविद्यालयों में से एक माना जाता था।
मुस्लिम राजा भी करते थे इस स्थल का सम्मान
मुजफ्फराबाद स्थित एजेके विश्वविद्यालय की ललित एवं कला विभाग की प्रमुख रुखसाना खान के मुताबिक, नीलम नदी के बाएं किनारे पर स्थित शारदा पीठ का दर्शन करने 11वीं शताब्दी तक लगभग 50,000 तीर्थयात्री इस स्थल पर आते थे। मंदिर के दक्षिणी किनारे पर प्रतिष्ठित मधुमती नदी बहती है, जिसे शारदा या खुटचल नदी के नाम से भी जाना जाता है। पुराने वक्त में, तीर्थयात्री मंदिर में प्रवेश करने से पहले मधुमती नदी के "पवित्र" जल में स्नान करते थे। वहीं, 13वीं और 14वीं सदी के कश्मीर के मुस्लिम राजा भी इस स्थल पर आते थे और इसके प्रति सम्मान प्रकट करते थे। 19वीं शताब्दी में अविभाजित जम्मू और कश्मीर के हिंदू डोगरा शासकों के शासनकाल के दौरान इस स्थल का कुछ जीर्णोद्धार कार्य हुआ था। लेकिन इसके बाद बाढ़ ने पत्थर से बनी इस संरचना की दक्षिणी दीवारें बहा दी थीं और तब से इसकी कभी मरम्मत नहीं की गई।
शारदा के पास हैं सरस्वती, नारदा और नरील झीलें
शारदा इवोल्यूशन ऑफ हिस्ट्री नामक पुस्तक में लिखा गया है कि यह स्थल मूल रूप से तीन धर्मों बौद्ध, हिंदू और मुस्लिम के अनुयायियों द्वारा पूजनीय पूजा स्थल था। मुख्य इमारत के निकट उत्खनन के दौरान उत्खननकर्ताओं को प्रागैतिहासिक युग और कांस्य युग की बहुमूल्य और परिष्कृत आभूषण, उपकरण और कलाकृतियां भी मिली हैं। मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल पत्थर की शिलाएं नारदा शिखर से लाई गई थीं। मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल किए गए नक्काशीदार पत्थर शारदा और उसके आसपास नहीं मिलते हैं, बल्कि ये पत्थर सरस्वती झील के पास पाए जाते हैं। बर्फ से ढके नारदा पहाड़ पर तीन ऊंची झीलें हैं, जिनके पानी को हिंदू पवित्र मानते हैं। उनमें से एक है सरस्वती झील। जबकि अन्य हैं नारदा झील- जिसे धन और भाग्य की देवी लक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है- और नरील झील। वहीं इसका शारदा नाम कश्मीरी भाषा की शारदा लिपि के नाम पर रखा गया है। किताब के मुताबिक शारदा सभ्यताओं का एक समूह रहा है, जिसमें हूण और आर्य सभ्यताएं निवास करती रही हैं।