SIR Bihar: चुनाव बहिष्कार की धमकी क्यों? संविधान बदलने की तरह हुआ असर तो बदल जाएगा पूरा गणित
तेजस्वी यादव ने विशेष मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) पर नाराजगी जताते हुए चुनाव बहिष्कार का संकेत दिया है। विपक्ष का दावा है कि लाखों वैध मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि सिर्फ मृतक और माइग्रेट मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। कांग्रेस और राजद इसे चुनावी रणनीति मानते हैं, जबकि भाजपा ने विरोध को ‘राजनीतिक स्टंट’ बताया है।
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राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि यदि विशेष मतदाता पुनरीक्षण कार्यक्रम यानी एसआईआर पर उनकी बातें नहीं सुनी गईं तो वे चुनाव का बहिष्कार करने पर विचार कर सकते हैं। यदि महागठबंधन सच में चुनाव बहिष्कार करता है तो यह स्थिति बेहद गंभीर होगी। इससे चुनाव आयोग की साख के साथ-साथ केंद्र सरकार की साख पर भी आंच आएगी। लेकिन सत्ता पक्ष सहित चुनाव विश्लेषक मान रहे हैं कि महागठबंधन एक रणनीति के तहत यह मुद्दा उठा रहा है। जिस तरह साल 2024 के लोकसभा चुनावों में 'संविधान बदलने का डर' मोदी सरकार पर 'भारी' पड़ा था, उसी तरह यदि बिहार के एक प्रतिशत लोगों के मन में भी अपना 'वोट खोने का डर' पैदा हुआ तो इससे पूरा चुनावी समीकरण बदल जाएगा। चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव और राहुल गांधी इसी 'रणनीति' पर काम करते हुए दिखाई दे रहे हैं।
हालांकि देश की राजनीति के लिए यह कोई पहली बार नहीं है जब किसी राजनीतिक दल ने चुनाव बहिष्कार की धमकी दी हो। इससे पहले भी जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में अनेक बार कुछ राजनीतिक दलों और अतिवादी संगठनों ने चुनाव के बहिष्कार की धमकी दी थी और इसे लागू कराने में आंशिक सफलता भी हासिल की थी। आपातकाल के बाद भी प्रमुख विपक्षी दलों ने चुनाव के बहिष्कार करने की बात की थी। हालांकि इसके बावजूद वहां चुनाव हुए और उन सभी लोगों ने चुनाव में हिस्सा भी लिया और जीत हासिल की।
जम्मू-कश्मीर के मुकाबले बिहार बड़ा राज्य है। और यहां चुनाव का बहिष्कार करने वाले नेता और पार्टी भी बड़ी है। साथ ही उनको दिल्ली के विपक्ष का पूरा समर्थन है। इसीलिए यहां की बात अलग है। वहीं, ऐसा कभी नहीं हुआ कि बड़े राज्यों में शामिल किसी प्रमुख विपक्षी दल ने चुनाव का बहिष्कार करने की बात की हो। चूंकि, विशेष मतदाता पुनरीक्षण (SIR) का विरोध बिहार से लेकर देश की संसद तक हो रहा है, और सबसे प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी पूरी ताकत के साथ इसका विरोध कर रही है, इससे स्थिति बिगड़ सकती है। एसआईआर के पहले चरण के अंतिम दिन शुक्रवार को भी संसद से लेकर बिहार तक एसआईआर का विरोध किया गया।
विपक्षी दलों के मतदाता सूची पर विरोध के बीच चुनाव आयोग ने 24 जुलाई को आंकड़े जारी कर कहा कि वह 99 फीसदी से अधिक मतदाताओं तक पहुंचने में सफल रहा है। चुनाव आयोग ने कहा कि मतदाता पुनरीक्षण में जुड़े बीएलए/बीएलओ ने 21.6 लाख मतदाताओं के मृत होने की जानकारी दी है। जाहिर है कि इन मृत मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाएंगे। लेकिन आशंका यही है कि विपक्षी दल ऐसे हटाए गए नामों को गलत बताकर चुनाव आयोग और चुनाव का विरोध कर सकता है।
चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों के विरोध पर प्रतिक्रिया देते हुए यहां तक कह दिया है कि क्या मृत या दो जगहों पर वोटिंग कार्ड बनवाने वाले मतदाताओं के नाम भी वोटर लिस्ट से न हटाए जाएं? चुनाव आयोग की इस टिप्पणी को काफी कठोर माना जा रहा है।
31.5 लाख मतदाता दूसरे शहरों में बसे, इसी पर होगा सबसे बड़ा विरोध
चुनाव आयोग ने बुधवार को जारी आंकड़ों में कहा है कि मतदाता पुनरीक्षण में जुड़े विभिन्न दलों के कार्यकर्ताओं ने बताया है कि 31.5 लाख मतदाता स्थाई तौर पर दूसरे स्थानों-शहरों में बस गए हैं। वे उन शहरों के मतदाता भी बन चुके हैं। ऐसे में इन मतदाताओं के नाम हटने भी तय हैं। इस तरह माइग्रेट करने वाले मतदाताओं और मृत मतदाताओं की संख्या जोड़ दें तो ऐसे मतदाताओं की संख्या 53 लाख से अधिक होती है।
चुनाव आयोग के अनुसार, लगभग सात लाख मतदाताओं के नाम दो स्थानों की मतदाता सूची में दर्ज हैं। ऐसे में इन मतदाताओं के पास दोनों स्थानों में से किसी एक स्थान पर अपना नाम मतदाता सूची में बनाए रखने का विकल्प होगा। यदि इनमें से कुछ मतदाता बिहार से अपना नाम कटवाने को प्राथमिकता देते हैं तो इससे भी बिहार विधानसभा के चुनाव परिणामों पर गंभीर असर पड़ सकता है। अनुमान है कि अब तक की जानकारी के आधार पर लगभग 61 लाख मतदाताओं के नाम बिहार की मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं।
बिहार कांग्रेस के नेता शाश्वत केदार पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि चुनावों में धांधली की जा रही है। मतगणना के बाद वोटिंग संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि ने यह साफ कर दिया है कि वोटिंग में गड़बड़ी की जा रही है। उन्होंने कहा कि ऐसे में यदि सत्ता पक्ष को अपनी मनमर्जी करते हुए चुनाव जीतना है तो इससे बेहतर है कि विपक्ष चुनाव में ही न उतरे।
शाश्वत केदार पांडेय ने कहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-राजद ने शानदार प्रदर्शन किया था। जिन सीटों पर उनके प्रत्याशियों की हार भी हुई थी, वह हार भी पांच दस हजार वोटों से ही थी। लंबे एंटी इनकंबेंसी फैक्टर के कारण इस बार इस अंतर को समाप्त करते हुए महागठबंधन बेहतर जीत हासिल करने की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष अपनी इस कमजोरी को भांप रहा है, इसलिए हर विधानसभा से 20-25 हजार वोट काटने की तैयारी की जा रही है। इससे पूरा चुनाव बदल सकता है। यही कारण है कि महागठबंधन चुनाव बहिष्कार को लेकर बहुत गंभीरता से विचार कर रहा है।
राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने अमर उजाला से कहा कि उनके नेता तेजस्वी यादव ने साफ कह दिया है कि यदि चुनाव आयोग अपनी कार्रवाई में अपेक्षित परिवर्तन नहीं लाता है तो चुनाव के बहिष्कार पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि चालू सत्र के बाद महागठबंधन के सभी दलों के साथ बैठक कर इस पर अंतिम रणनीति बनाई जाएगी।
'दबाव की रणनीति'
बिहार की राजनीति पर विशेष पकड़ रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र कुमार ने कहा कि तेजस्वी यादव का चुनावों का बहिष्कार करने पर विचार करने का ऐलान चुनाव आयोग और सत्ता पक्ष पर दबाव बनाने की रणनीति से अधिक कुछ भी नहीं है। यदि दो पार्टी सिस्टम से चुनाव होता तो विपक्ष के बहिष्कार का व्यापक और गहरा अर्थ होता। लेकिन भारत में, जहां बहुदलीय चुनावी व्यवस्था है, वहां किसी एक पार्टी के चुनाव में न उतरने का केवल प्रतीकात्मक असर ही हो सकता है।
धीरेंद्र कुमार के अनुसार, यदि राजद चुनाव का बहिष्कार करने की बात सोचती भी है तो यह महागठबंधन के सहयोगी दल ही उसका साथ छोड़ देंगे। वीआईपी जैसी पार्टियों के लिए यह बड़ा अवसर हो सकता है जो बिहार की ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने और अपना आधार बढ़ाने के लिए बेताब हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति बसपा जैसे दलों के लिए भी सुनहरा अवसर साबित होगी।
धीरेंद्र कुमार ने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने भाजपा के सत्ता में आने के बाद 'संविधान बदलने का खतरा' होने का मुद्दा उठाया था। इससे कांग्रेस को अच्छी सफलता मिली थी। उसी तरह विपक्ष लोगों के बीच वोट खोने का डर और चुनाव में गड़बड़ी का मुद्दा उठाकर बढ़त हासिल करना चाहता है। इससे वह सत्ता पक्ष पर दबाव बनाने के साथ-साथ जनता के बीच अपनी पकड़ भी मजबूत करना चाहता है। उन्होंने कहा कि, यदि जनता के एक प्रतिशत लोगों के मन में भी अपना 'वोट खोने का डर' पैदा हो जाता है तो इससे पूरा चुनावी गणित बदल सकता है। उनका मानना है कि कांग्रेस-राजद पूरी तैयारी के साथ इसी 'रणनीति' पर काम करते हुए दिखाई दे रहे हैं।
विपक्ष का विरोध आधारहीन
भाजपा और एनडीए नेताओं ने एसआईआर के विरोध को पूरी तरह गलत और निराधार बताया है। भाजपा प्रवक्ता अनिरुद्ध प्रताप सिंह ने अमर उजाला से कहा कि चुनाव आयोग ने केवल दूसरी जगह चले गए मतदाताओं, मृतकों और एक ही व्यक्ति के दो स्थानों पर मतदाता सूची में शामिल होने वाले मतदाताओं का नाम ही मतदाता सूची से हटाने की बात कही है, ऐसे में एसआईआर का विरोध पूरी तरह से अतार्किक है।
अनिरुद्ध प्रताप सिंह ने कहा कि विशेष मतदाता पुनरीक्षण कार्य में केवल एनडीए के दलों के कार्यकर्ता नहीं लगे हुए हैं। राजद, कांग्रेस और वाम दलों के कार्यकर्ता भी मतदाता सूची को अपडेट करने के काम में जुटे हैं। किसी तरह की अनियमितता होने पर विपक्षी दलों के कार्यकर्ता तुरंत अपना विरोध कर सकते हैं, लेकिन अब तक एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया है जहां विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं ने इसकी शिकायत की हो। केवल विपक्ष के नेता ही इस तरह की बात कर सनसनी पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे में मतदाता सूची पर विपक्ष का हंगामा केवल राजनीतिक स्टंट कर जनता का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि तेजस्वी यादव चुनावों में अपनी हार को देखकर अभी से बहाने की तलाश कर रहे हैं। यह विरोध प्रदर्शन उसी का परिणाम है।