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Siachen 40 Years: दुनिया के सबसे ऊंचे रण में कैसे इस जांबाज हेलीकॉप्टर पायलट ने की थी लैंडिंग? कांप गई थी रूह

Fri, 12 Apr 2024 08:09 PM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Fri, 12 Apr 2024 08:09 PM IST
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सार
Operation Meghdoot: दुनिया के सबसे ऊंचा जंग के मैदान सियाचिन ग्लेशियर में ऑपरेशन मेघदूत चलाया जा रहा है। यह ऑपरेशन पिछले 40 सालों से बदस्तूर जारी है। ऑपरेशन मेघदूत 13 अप्रैल 1984 को शुरू हुआ था। 
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Siachen 40 Years: How did this brave helicopter pilot land in the world's highest battlefield
सियाचिन ग्लेशियर में ऑपरेशन मेघदूत - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

दुनिया का सबसे ऊंचा जंग का मैदान, जिसकी ऊंचाई 20 हजार फीट है, जहां तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे चला जाता है। जिसके एक तरफ पाकिस्तान है, तो दूसरी तरफ है चीन। हम बात कर रहे हैं सियाचिन ग्लेशियर की, यहां चलाया जा रहा है ऑपरेशन मेघदूत, जो पिछले 40 सालों से बदस्तूर जारी है। 13 अप्रैल 1984 को शुरू हुआ यह दुनिया का इकलौता ऐसा सैन्य ऑपरेशन है, जो अभी भी चल रहा है। 76 किलोमीटर लंबे सियाचिन को दुनिया का दूसरा सबसे लंबा ग्लेशियर माना जाता है। सियाचिन जिसे स्थानीय बाल्टी भाषा में जंगली गुलाब भी कहा जाता है, यह इलाका सालभर बर्फ से ढका रहता है। हालांकि यहां ऑपरेशन तो 13 अप्रैल 1984 को ही शुरू हुआ, लेकिन उसकी तैयारियां भारत-पाकिस्तान के बीच 1972 में हुए 'शिमला समझौते' के कुछ समय बाद ही शुरू हो गई थीं। 


एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर अमर उजाला से खास बातचीत में बताते हैं कि शिमला समझौते के बाद पाकिस्तान ने सियाचिन ग्लेशियर को अपने नक्शे में दिखाना शुरू कर दिया, जिससे भारत सरकार चिंतित हो गई। भारतीय सेना ने पर्वतारोहण अभियानों की आड़ में ग्लेशियर की टोह लेना शुरू कर दिया था।

सियाचिन ग्लेशियर में ऑपरेशन मेघदूत
सियाचिन ग्लेशियर में ऑपरेशन मेघदूत - फोटो : amar ujala bureau
1978 में हुई पहली लैंडिंग
शुरुआत में सियाचिन ग्लेशियर पर हेलीकॉप्टर उतारने की जिम्मेदारी एवीएम मनमोहन बहादुर को दी गई। वह बताते हैं, यह 1978 का साल था, जब उन्होंने सियाचिन ग्लेशियर में रोंगटे खड़े कर देने वाली हेलीकॉप्टर की पहली लैंडिंग की थी। यह एक ऐसा साहसिक मिशन था, जिसे दो हेलीकॉप्टर पायलटों ने फ्रांस में बने Aloutte III (चेतक) हेलीकॉप्टर के जरिए अंजाम दिया था। सियाचिन ग्लेशियर में हुए इस मिशन को आज भी भारतीय वायु सेना के ऑपरेशन के इतिहास में एक मील के पत्थर के तौर पर गिना जाता है।

वह बताते हैं कि शिमला समझौते के तहत भारत यह मानता रहा कि पाकिस्तान की सीमा सियाचिन ग्लेशियर में सल्तोरो रिज तक ही सीमित है, जिसका अंतिम पाइंट एनजे9842 है। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान यह मान रहा था कि उसके पूर्वोत्तर सीमा की शुरुआत एनजे9842 से शुरू होकर काराकोरम दर्रे तक जाती है। इसकी वजह से दोनों देश सियाचिन पर अपना-अपना दावा करते रहे। वहीं पाकिस्तान सियाचिन की अहमियत जानता था, और अपना दावा पुख्ता करने के लिए उसने सियाचिन ग्लेशियर को अपने नक्शे में दिखाना शुरू दिया। वहीं इन मानचित्रों से चिंतित भारतीय सेना ने पर्वतारोहण अभियानों की आड़ में ग्लेशियर की टोह लेना शुरू कर दिया था। 06 अक्तूबर 1978 को मौजूदा ग्लेशियर में भारतीय सेना ने कुमार बेस केंप के पास तेरम कांगड़ी पीक पर एक्सपीडिशन की योजना बनाई। मौजूदा बेस कैंप पर उस समय भी बेस कैंप बनाया गया।  
वहां ताजा राशन पहुंचाने और डाक इकट्ठा करने का काम हेलीकॉप्टर पायलटों को दिया गया। यह बता दें कि सियाचिन ग्लेशियर पश्चिम में मौजूद साल्टोरो-रिज पूर्व में मौजूद काराकोरम रिज के बीच में मौजूद है। साल्टोरो रिज की शुरुआत चीन सीमा पर मौजूद काराकोरम रेंज के उत्तर में सिया कांगड़ी से होती है। इस रिज की ऊंचाई 17,880 से 25,330 फीट है। सियाचिन ग्लेशियर पर सबसे अधिक ऊंचाई वाला इलाका इंदिरा कोल है।

सियाचिन ग्लेशियर में ऑपरेशन मेघदूत
सियाचिन ग्लेशियर में ऑपरेशन मेघदूत - फोटो : amar ujala bureau
114 हेलीकॉप्टर यूनिट ने दिखाया दम 
मनमोहन बहादुर बताते हैं कि उस समय उनकी उम्र 23 वर्ष थी।  हेलीकॉप्टर ट्रेनिंग स्क्वाड्रन से स्नातक होने के तुरंत बाद, उन्हें जम्मू में भारतीय वायुसेना की 114 हेलीकॉप्टर यूनिट (जिसे बाद में सियाचिन पायनियर्स के नाम से पहचाना जाने लगा) में तैनात किया गया। जिसके बाद भारतीय वायुसेना ने 17 सितंबर 1978 को उन्हें टेंपरेरी ड्यूटी पर लेह भेज दिया। उनका काम ताजा राशन पहुंचाना और डाक एकत्र करना था। 114 हेलीकॉप्टर यूनिट की तरफ से 20 सितंबर 1978 को सियाचिन ग्लेशियर की पहली उड़ान की अनुमति मिली। इसके लिए चेतक हेलीकॉप्टर को चुना गया, जिसने ग्लेशियर के स्नॉउट (मुहाना) से उड़ान शुरू हुई। पूरा रास्ता बर्फ से ढका था, बीच-बीच में बड़े-बड़े क्रेवास दिखाई दे रहे थे। उनकी चिंता थी कि अगर लैंडिंग करनी पड़े तो कैसे मैनेज होगा, क्योंकि चेतक में स्की नहीं थे, जिससे लैंडिंग खतरनाक हो सकती थी। 

सियाचिन ग्लेशियर में ऑपरेशन मेघदूत
सियाचिन ग्लेशियर में ऑपरेशन मेघदूत - फोटो : amar ujala bureau
ग्लेशियर में घायल को किया रेस्कयू
एयर वाइस मार्शल बताते हैं कि हेलीकॉप्टर कैंप 1 और कैंप 2 तक पहुंच गया और हवा में मंडराते हुए ही हेलीकॉप्टर से सामान को नीचे गिरा दिया गया। ऊंचाई पर खासतौर पर हाई एल्टीट्यूड इलाकों में उड़ते हुए हेलीकॉप्टर में रखे वजन का खास ख्याल रखना पड़ता है, जरा सा भी अतिरिक्त वजन लादना हेलीकॉप्टर के लिए घातक साबित हो सकता है। इस प्रकार एक महीने से बी कम समय में 114 एचयू के फ्लाइट कमांडर एवीएम बहादुर और स्क्वाड्रन लीडर एसके मोंगा ने अपना नाम इतिहास की किताबों में दर्ज करा लिया। वह बताते हैं कि 06 अक्तूबर 1978 को वे चेतक हेलीकॉप्टर का इंजन बदलने के लिए वे फिर से लेह में थे। जैसे ही इंजन को उतारा जा रहा था, लेह सैन्य अड्डे को भारतीय सेना के सियाचिन अभियान के एक सदस्य के हताहत होने की सूचना मिली। एवीएम बहादुर कहते हैं, यह एक 'संयोग' था कि वह एकमात्र पायलट थे, जिन्होंने एक महीने में ही ग्लेशियर के लिए एक बार नहीं, बल्कि दो बार उड़ान भरी थी। स्क्वाड्रन लीडर मोंगा ने उन्हें सह-पायलट के तौर पर अपने साथ चलने के लिए कहा, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया और एक कप कॉफी पीने के बाद वे फटाफट ग्लेशियर के लिए उड़ान भरने के लिए तैयार हो गए।

एवीएम बहादुर बताते हैं कि फ्रांस में बने ये हेलीकॉप्टरों मात्र 10,500 फीट की ऊंचाई तक जा सकते थे, जितनी लेह की ऊंचाई है। ग्लेशियर तक पहुंचने के लिए हेलीकॉप्टरों को 18,379 फीट की ऊंचाई पर खारदुंग ला को पार करना पड़ा। लेकिन सियाचिन ग्लेशियर के ऊपर उड़ान भरना सभी सीमाओं से परे था। हमने बर्फ से बने एक अस्थायी हेलीपैड पर लैंडिंग की, एक पहिया बर्फ में छह इंच तक धंसा हुआ था। पायलट स्क्वाड्रन लीडर मोंगा ने हेलीकॉप्टर के सारे कंट्रोल मुझे दे दिए, और खुद नीचे उतर कर दो घायलों को ऊपर लादने में मदद करने लगे। वह याद करते हुए बताते हैं कि दोपहर के दो बजे थे और हेलीकॉप्टर के रोटर चल रहे थे। जल्द ही स्क्वाड्रन लीडर मोंगा की सांसें फूलने लगीं, उन्होंने तुरंत हेलीकॉप्टर में रखे ऑक्सीजन सिलंडर से ऑक्सीजन के कुछ कश लिए। 18,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरना वाकई रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है। हेलीकॉप्टर में ईंधन कम हो रहा था, इसलिए हमने नजदीक के एक अन्य एयर बेस थोइज पर उतरने का फैसला किया। हालांकि उड़ान के दौरान भोजन न मिलने और अधिक ऊंचाई की वजह से उनकी शुगर कम हो गई थी, जिससे तबियत भी खराब हो गई थी। 

दोबारा 1994 में मिली थी तैनाती
एवीएम बहादुर आगे कहते हैं कि 1994 में उन्हें यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर के रूप में फिर से 114 एचयू में तैनाती मिली। चेतक के बारे में वह कहते हैं कि यह इतना दमदार हेलीकॉप्टर नहीं था, और इसे हाई एल्टीट्यूड में उड़ान भरने के लिए डिजाइन नहीं किया गया था। कई बार वे पहाड़ियों को छूते हुए हेलीकॉप्टर उड़ाते थे और इंजन को पावर देने के लिए अपड्राफ्ट (पहाड़ की चट्टानों के साथ उठने वाली हवा) का उपयोग करते थे। चेतक पहाड़ियों से सिर्फ 20 फीट की दूरी तय करने के लिए केवल 35 नॉट की रफ्तार से उड़ान भरता है। क्रेवास या बड़ी-बड़ी दरारें कई बार लैंडिंग स्पॉट का भ्रम देती हैं। वहीं अगर 'व्हाइटआउट' हो जाए, तो पायलट मार्ग से भटक भी सकता है। वहीं जिस दिन तेज धूप होती है, उस दिन बर्फ की चमक स्नो ब्लाइंडनेस का कारण बन सकती है। वह कहते हैं कि अस्थायी हेलीपैड पर लैंडिंग करना खतरे से खाली नहीं होता है, ऐसे में फटाफट लोडिंग और अनलोडिंग करनी पड़ती है। कई बार पायलटों को ऐसे हैलीपेड्स पर भी लैंडिंग करनी पड़ती है, जहां लैंडिंग के बाद केवल एक इंच जगह बचती थी। कुछ हेलीपैड तो बर्फ से जम चुकीं चॉकलेटों को तिरपाल से ढक कर बनाए जाते हैं। 

ऐसे हुई ऑपरेशन मेघदूत की शुरुआत
पाकिस्तानी जनरलों ने 1983 में सियाचिन पर अपना दावा मजबूत करने के लिए सेना की टुकड़ी भेजने का फैसला किया। भारतीय सेना के पर्वतारोहण अभियानों की वजह से उसे इस बात का डर सताने लगा कि भारत सियाचिन पर अपना कब्जा कर सकता है। इसकी वजह से उन्होंने सबसे पहले अपनी सेना भेजने का फैसला कर लिया। इसके लिए पाकिस्तान लंदन के एक सप्लायर को ठंड से बचने वाले कपड़ों का ऑर्डर दे दिया। लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि वही सप्लायर भारत को भी ठंड से बचने वाले कपड़ों की आपूर्ति करता है।

भारत को जब इस बात की जानकारी हुई, तो उसने पाकिस्तान से पहले सियाचिन में सेना भेजने की प्लान तैयार कर लिया। भारत ने पाकिस्तान के पर्वतारोहण कार्यक्रमों पर रोक लगाने के लिए उत्तरी लद्दाख में सेना और ग्लेशियर के कई अन्य हिस्सों में पैरामिलिटरी फोर्स की तैनाती का फैसला किया। इसके लिए 1982 में अंटार्कटिक में हुए एक अभियान में हिस्सा ले चुके सैनिकों को चुनाव किया गया, जो ऐसी विषम परिस्थितयों में रहने के लिए अभ्यस्त थे। 

पाकिस्तान सेना को मात देने के लिए भारतीय सेना ने 13 अप्रैल 1984 को ग्लेशियर पर कब्जा करने का फैसला किया। जो पाकिस्तान के तय तारीख 17 अप्रैल से चार दिन पहले ही था। इसे ऑपरेशन का कोडनेम 'ऑपरेशन मेघदूत' रखा गया। इस ऑपरेशन की अगुवाई की जिम्मेदारी लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हून के कंधों पर दी गई। वे उस वक्त जम्मू कश्मीर में श्रीनगर 15 कॉर्प के जनरल कमांडिंग ऑफिसर थे। भारतीय सेना के कर्नल नरिंदर कुमार उर्फ बुल कुमार की अगुवाई में चढ़ाई की शुरुआत हो गई। 

पाकिस्तान के पहुंचने से पहले ही सियाचिन पर था भारत का कब्जा
वायु सेना के जहाजों के जरिए सेना के जवानों को ऊंचाई पर पहुंचाने के साथ ही ऑपरेशन मेघदूत की शुरुआत हो गई। इसके लिए वायु सेना ने आईएल-76, एनएन-12 और एन-32 विमानों को सामान ढ़ोने के लिए लगाया जो उच्चतम बिंदु पर स्थित एयरबेस पर सेना और सामानों को पहुंचाने लगे। इसके बाद वहां से एमआई-17, एमआई-8, चेतक और चीता हेलिकॉप्टरों के जरिए सेना को आगे पहुंचाया गया।

इस ऑपरेशन का पहला चरण मार्च 1984 में तब शुरू हुआ, जब ग्लेशियर के पूर्वी बेस पर सेना ने अपना पहला कदम रखा। कुमाऊं रेजीमेंट और लद्दाख स्काउट की पूरी बटालियन हथियारों से लैस होकर बर्फ से ढके जोजि-ला पास से आगे बढ़ने लगे। इस दल की अगुवाई कर रहे लेफ्टिनेंट कर्नल (बाद में ब्रिगेडियर) डीके खन्ना ने पाकिस्तानी रडार से बचने के लिए आगे का रास्ता पैदल ही तय करने का फैसला किया था। इसके लिए सेना को कई टुकड़ियों में बांट दिया गया। ग्लेशियर पर कब्जा करने के लिए मेजर आरएस संधु की अगुवाई में पहली टुकड़ी को आगे भेजा गया।

'बिलाफोंड ला' और 'साल्टोरो रिज' पर हुआ कब्जा
इसके बाद दूसरी टुकड़ी की जिम्मेदारी कैप्टन संजय कुलकर्णी को दी गई जिन्हें 'बिलाफोंड ला' पर कब्जा करना था। बची हुई टुकड़ी के साथ कैप्टन पीवी यादव को 'साल्टोरो रिज' पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई। 13 अप्रैल तक सेना के करीब 300 जवान उन जगहों पर पहुंच चुके थे, जिस पर कब्जा करने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई थी। इसके चार दिन बाद जब पाकिस्तानी सेना वहां पहुंची, तो उन्होंने पाया कि सभी महत्वपूर्ण तीन चोटियों पर भारतीय सेना का कब्जा है।

भारतीय सेना ने 1987 तक सियाचिन ग्लेशियर के सभी महत्वपूर्ण चोटियों पर अपना कब्जा कर लिया, जिसमें 'सिया ला' प्रमुख रही। इसके बाद पाकिस्तानी सेना के पास सोल्टोरो रिज के पश्चिमी ढलानों की रखवाली करने के अलावा कोई चारा दिखाई नहीं दिया। इसके पीछे मुख्य वजह यह रही कि पाकिस्तानी सेना इन चोटी पर कब्जा करने के लिए पूरी तरह से पैदल टुकड़ियों पर निर्भर थी, वहीं भारत ने इसके लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी और वायु सेना की मदद से उनसे चार दिन पहले ही इन चोटियों पर कब्जा कर लिया।
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