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मध्यस्थ वकील भी शाहीन बाग की महिलाओं से हो रहे हैरान, पूछ रही हैं ऐसे-ऐसे सवाल

अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 21 Feb 2020 02:26 PM IST

सार

  • महिलाओं ने पूछा- हमारे आंदोलन को राष्ट्रविरोधी क्यों कहा जा रहा है    
  • जब पहले ही दी जा रही नागरिकता तो इस कानून को क्यों लाया गया
  • जब पीएम ही कानून वापस न लेने की बात कर रहे तो दूसरा कोई कैसे देगा कानून वापसी की गारंटी
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Sanjay Hegde and Sadhna Ramchandran at Shaheen Bagh-1
Sanjay Hegde and Sadhna Ramchandran at Shaheen Bagh-1 - फोटो : Social Media
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विस्तार

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सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त वार्ताकार संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन शुक्रवार को शाहीन बाग के प्रदर्शन स्थल पर जाकर महिलाओं से बातचीत कर मसले का हल निकालने की कोशिश करेंगे। वार्ता पिछले दो दिनों से जारी है। वार्ताकारों के सामने प्रदर्शनकारी महिलाएं ऐसे-ऐसे तर्क दे रही हैं जिसे सुनकर देश की सर्वोच्च अदालत में बहस करने में माहिर दोनों वरिष्ठ वकील भी हैरान रह जाते हैं।

धरना स्थल बदलने पर हो विचार

वार्ताकारों संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन ने प्रदर्शनकारी महिलाओं से यही अपील की कि शाहीन बाग के धरना स्थल को बदलने पर विचार किया जाना चाहिए क्योंकि इस धरने के कारण उन्हीं के जैसे देश के सामान्य नागरिकों को परेशानी हो रही है।


इस पर महिलाओं ने तर्क दिया कि देश की आजादी के समय भी इसी तरह के धरने, प्रदर्शन हुए थे। उससे भी लोगों को परेशानी हुई थी। अगर उस परेशानी को न उठाया गया होता तो आज देश को आजादी ही नहीं मिली होती।

क्या यह प्रदर्शन राष्ट्रविरोधी है?

एक अन्य महिला ने तर्क दिया कि कुछ ही दिन पहले जाटों को आरक्षण देने की मांग पर रेल की पटरियां रोकी गईं थीं। धरने-प्रदर्शन किये गये थे। उसमें भारी हिंसा हुई थी और लोगों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था। जबकि इस शाहीन बाग के आंदोलन से किसी को शारीरिक या संपत्ति का नुकसान नहीं हो रहा है।

ऐसे में इस आंदोलन को गलत कैसे कहा जा सकता है? महिलाओं की घोर आपत्ति इस बात पर थी कि जब अन्य आंदोलनों को राष्ट्रविरोधी नहीं बताया गया तो शाहीन बाग के आंदोलन को राष्ट्रविरोधी क्यों करार दिया जा रहा है?
 
एक महिला हबीबा खातून ने वार्ताकारों से कहा कि अगर देश में लागू किया गया आपातकाल का कानून वापस लिया जा सकता है तो नागरिकता संशोधन कानून वापस क्यों नहीं लिया जा सकता? वार्ताकारों ने कहा कि नागरिकता कानून में  किसी की नागरिकता लेने का प्रावधान नहीं है।

इस पर महिला ने सवाल किया कि अगर सरकार किसी की नागरिकता छीनना नहीं चाहती, तो डिटेंशन कैंप क्यों और किसके लिए बनाये जा रहे हैं?

ये कानून क्यों

दोनों वरिष्ठ वकीलों ने प्रदर्शनकारियों को आश्वस्त करना चाहा कि यह मसला केवल प्रदर्शन स्थल को लेकर हो रही परेशानी को लेकर है। नागरिकता संशोधन के मुद्दे भी सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन हैं और उस समय प्रदर्शनकारियों का पूरा पक्ष सर्वोच्च अदालत के समक्ष रखा जाएगा।

महिलाओं ने कहा कि वे केवल इतना बताएं कि नागरिकता संशोधन में सिर्फ मुस्लिमों को अलग क्यों रखा गया। अनेक खबरें आई हैं जिसमें यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार इस समय भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान के अनेकों हिन्दुओं-मुस्लिमों को नागरिकता दे रही है। ऐसे में इस कानून को लाकर सरकार क्या साबित करना चाहती है।

विश्वास जीतने की कोशिश

सामान्य महिलाओं के ऐसे-ऐसे तर्क सुनकर वार्ताकार भी चुप हो जाते हैं। हालांकि उनकी कोशिश धैर्य के साथ उनकी बात सुनने और उन्हें यह विश्वास दिलाने की रहती है कि वे उनके प्रदर्शन के अधिकार को रोकने या कम करने को समर्थन नहीं देते हैं और वे उनके साथ पूरी तरह सहमत हैं।

लेकिन वे केवल इतना चाहते हैं कि प्रदर्शन के कारण दूसरे बेकसूर लोगों को परेशानी न हो। दोनों पक्षों में आज भी एक सीमित माहौल में बातचीत हो सकती है।

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