फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Sedition law: congress leader randeep surjewala questioned government intention of colonial era sedition law abolishment

Sedition Law: अंग्रेजों का डरावना देशद्रोह कानून अब नहीं घोटेगा आलोचकों का गला, कांग्रेस बोली- आवाज उठाने के राष्ट्रधर्म को किसने बताया राष्ट्रद्रोह

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 11 May 2022 03:33 PM IST
विज्ञापन
सार
कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, सत्ता के हुकमरानों के खिलाफ आवाज उठाने के काले कानून को खत्म करने का वादा किसने किया। आवाज उठाने के राष्ट्रधर्म को देशद्रोह कौन बता रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून के मामले में एतिहासिक निर्णय दिया है। देश की सर्वोच्च अदालत का संदेश साफ है...
loader
Sedition law: congress leader randeep surjewala questioned government intention of colonial era sedition law abolishment
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

ब्रिटिश हुकूमत के दौरान अस्तित्व में आया देशद्रोह कानून, क्या अब आलोचकों का गला नहीं घोटेगा। कांग्रेस पार्टी ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के बाद यह बात कही है। पार्टी नेता रणदीप सुरजेवाला ने सवाल किया, आवाज उठाने के राष्ट्रधर्म को किसने राष्ट्रद्रोह बताया है। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा, अंग्रेजों द्वारा 1890 में शुरू किए गए राजद्रोह कानून के अब कोई मायने नहीं रह गए हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अगुवाई में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अपने फैसले में कहा, देशद्रोह कानून पर तब तक रोक लगी रहे, जब तक इसकी समीक्षा नहीं हो जाती। इस दौरान देशद्रोह की धारा 124-A के अंतर्गत कोई नया केस दर्ज नहीं किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने 124-A के तहत दर्ज मौजूदा सभी मामलों पर रोक लगा दी है। जो लोग इस कानून के तहत जेल में बंद हैं, वे अपनी जमानत के लिए अदालत जा सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा है कि केंद्र सरकार, देशद्रोह कानून पर जल्द पुनर्विचार करेगी।

सत्ता को आईना दिखाना राष्ट्रधर्म है, देशद्रोह नहीं

कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, सत्ता के हुकमरानों के खिलाफ आवाज उठाने के काले कानून को खत्म करने का वादा किसने किया। आवाज उठाने के राष्ट्रधर्म को देशद्रोह कौन बता रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून के मामले में एतिहासिक निर्णय दिया है। देश की सर्वोच्च अदालत का संदेश साफ है। सुरजेवाला ने अपने ट्वीट में लिखा, सत्ता के सिंहासन पर बैठ कर आवाज कुचलने वाले निरंकुश शासक जान लें कि स्वयंभू राजा और बेलगाम सरकारों की जनविरोधी नीतियों की आलोचना का गला नहीं घोंट सकते। सत्ता को आईना दिखाना राष्ट्रधर्म है, देशद्रोह नहीं।



जब अंग्रेज ही चले गए तो उनके कानून का क्या फायदा

इससे पहले एनसीपी नेता शरद पवार ने इस कानून बाबत कहा, यह कानून विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों द्वारा लाया गया था। इस काले कानून के तहत, सरकार किसी के भी खिलाफ आरोप लगा सकती है। केस दर्ज होते ही लोगों को जेल भेजा जा सकता है। पवार ने कहा, जब अंग्रेज ही चले गए हैं, तो उनके कानून का क्या फायदा। हैरानी की बात है कि वह कानून आज भी बना हुआ है। आज देश के पास अपनी ताकत है। नागरिकों को अपने सवालों के लिए सरकार का विरोध करने का अधिकार है। इस कानून को अब बदला जाना चाहिए। देशद्रोह के कानून को लगातार बदलने की जरूरत है। केंद्र सरकार, पहले इस राजद्रोह कानून को निरस्त नहीं करना चाहती थी। सुप्रीम कोर्ट का रुख भांपने के बाद केंद्र सरकार ने कहा, वह इस कानून पर पुनर्विचार करेगी। यह बदलाव सकारात्मक है। इस कानून के सख्त प्रावधानों को बदलने की जरूरत है, इस पर संसद में भी चर्चा हो चुकी है।

अंग्रेजों का ये हथियार पूरी तरह से खत्म नहीं हो सकता

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील पवन दुग्गल ने मंगलवार को कहा था कि अंग्रेजों का ये हथियार पूरी तरह से खत्म नहीं हो सकता। देश के खिलाफ काम कर रही ताकतों के लिए ये कानून जरूरी है, लेकिन सरकार को इसके प्रावधानों बाबत दोबारा से विश्लेषण करना चाहिए। इसकी कुछ एप्लीकेशन को सीमित करना होगा। चेक एंड बैलेंस रखना बहुत जरुरी है। 'देशद्रोह' कानून के नए पैरामीटर तय करने होंगे। दुग्गल ने कहा था कि सरकार को यह प्रावधान करना चाहिए कि इस कानून का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी। इससे पुलिस एवं दूसरी जांच एजेंसियां, इसके दुरुपयोग करने से बचेंगी। इस कानून की धारा लगाने से पहले पुलिस कर्मी दस बार सोचेगा। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में जब देशद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी तो केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने कहा, हमने देशद्रोह कानून को लेकर एक प्रस्ताव तैयार किया है। हम एक संज्ञेय अपराध को नहीं रोक सकते, जो किया जाएगा। प्रस्ताव में यह भी शामिल है कि देशद्रोह कानून के तहत केस तभी दर्ज हो, जब एसपी स्तर के अधिकारी या उससे ऊपर के अधिकारी को लगता है कि देशद्रोह का आरोप लगाया जाना चाहिए।

कई बार जल्दबाजी में केस तो दर्ज हो जाता है, लेकिन

पिछले चार-पांच वर्षों के दौरान देशद्रोह या राजद्रोह के केसों की संख्या बढ़ती जा रही है। 2014 में देशद्रोह के 47 केस दर्ज हुए थे, वहीं 2018 में यह आंकड़ा 70 पर पहुंच गया, जबकि 2019 में ऐसे केसों की संख्या 93 रही है। वर्ष 2019 की बात करें तो ऐसे केसों में दोषसिद्धि दर महज 3.3 फीसदी रही थी। 2020 में देशद्रोह के 73 नए केस दर्ज किए गए। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता पवन दुग्गल बताते हैं, ऐसे मामलों में इलेक्ट्रॉनिक सबूत जुटाने होते हैं। कई बार जल्दबाजी में केस तो दर्ज हो जाता है, मगर बाद में उसे अंजाम तक पहुंचाना मुश्किल होता है। पुलिस या जांच एजेंसी, कोर्ट के समक्ष आरोप साबित नहीं कर पाती। नतीजा, बाद में केस खत्म हो जाता है। टूलकिट केस की जांच में ऐसा हो चुका है। देशद्रोह कानून का इस्तेमाल एक टूल के तौर पर न किया जाए। कई बार ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं कि राजनीतिक विरोधियों व आलोचकों पर इसका प्रयोग किया जा रहा है, वह बिल्कुल गलत है। इस कानून के जरिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केंद्र सरकार ने इस कानून की समीक्षा की बात कही है। उम्मीद है कि सरकार इसे वह रूप प्रदान करने में सक्षम होगी कि जिससे केवल वही व्यक्ति डरे, जिसने वैसा अपराध किया है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed