देशद्रोह कानून : सत्ता विरोधियों के दमन और आजादी के आंदोलन को कुचलने का था ब्रिटिश हथियार
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विस्तार
152 साल पूरे कर चुके देशद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाते हुए इसके बारे में गहरी दिलचस्पी पैदा की है। विधि आयोग ने 2018 में इस पर परामर्श पत्र जारी किया और कानूनविदों, सरकार, अकादमिक जगत, विद्यार्थियों और आम नागरिकों में गहन चर्चा की जरूरत भी बताई। ब्रिटेन में सत्ता विरोधियों को सागर पार भेजने से लेकर भारत में ब्रिटिश राज द्वारा आजादी के आंदोलन कुचलने तक में इसका उपयोग हुआ।
कानून में क्या
आईपीसी 124ए के अनुसार, कोई व्यक्ति अगर कानून द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ शब्दों को बोलकर, लिखकर, इशारे से, दिखने योग्य संकेत या किसी अन्य तरह से असंतोष भड़काता है या ऐसी कोशिश करता है या सरकार के खिलाफ लोगों में घृणा, अवज्ञा या उत्तेजना पैदा करता या ऐसा करने की कोशिश करता है, तो इसे देशद्रोह मान कर हुए उसे तीन वर्ष कारावास से लेकर उम्रकैद तक और जुर्माने की सजा दी जा सकती है।
कानून के कई शब्दों का आईपीसी में भी स्पष्टीकरण
- असंतोष में दुश्मनी व निष्ठाहीनता की भावनाएं शामिल हैं।
- वे आक्षेपपूर्ण टिप्पणियां देशद्रोह नहीं होंगी, जिनमें घृणा, अवज्ञा या असंतोष भड़काने या ऐसी कोशिश किए बिना सरकार के कामों को कानूनी रास्ते से बदलने की बात हो।
- वे टिप्पणियां भी देशद्रोह नहीं होंगी, जिनमें सरकार के शासकीय व अन्य कामों के खिलाफ नापसंदगी दर्शाई जाए लेकिन घृणा, अवज्ञा या असंतोष भड़काने या ऐसी कोशिश न हो।
जन व्यवस्था बिगाड़ने वाले वक्तव्य देशद्रोह माने
- 1951 में पंजाब हाईकोर्ट और 1959 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धारा 124ए को असांविधानिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जड़ें काटने वाला माना।
- 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा कि सरकार या राजनीतिक दलों के खिलाफ दिए वक्तव्य गैर-कानूनी नहीं होते। लेकिन जन व्यवस्था बिगाड़ने वाले वक्तव्य देशद्रोह की श्रेणी में आएंगे।
आंकड़ों में देशद्रोह
6 साल में 356 केस, 548 आरोपी 2020 तक जारी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड की रिपोर्ट के अनुसार 2015 से 2020 तक धारा 124ए में 356 केस दर्ज हुए। इनमें 548 आरोपी गिरफ्तार हुए।
| वर्ष | केस | गिरफ्तार | सजा |
| 2020 | 73 | 44 | 33.3% |
| 2019 | 93 | 99 | 3.3% |
| 2018 | 70 | 56 | 15.4% |
| 2017 | 51 | 228 | 16.7% |
| 20216 | 35 | 48 | 33.3% |
| 2015 | 30 | 73 | 0 |
- 6 साल में गिरफ्तार आरोपियों में से 290 केवल 18 से 30 साल के थे। 2018 से 2020 के दौरान सबसे ज्यादा 33 मामले असम से आए।
भूलवश दस साल नहीं बन सका था कानून
- देशद्रोह कानून का इतिहास रोचक है। विधि आयोग की 2018 की रिपोर्ट बताती है कि 1837 में आईपीसी का ड्राफ्ट बनाने वाले अंग्रेज अधिकारी थॉमस मैकॉले ने देशद्रोह कानून को धारा 113 में रखा। लेकिन किसी भूलवश इसे 1860 में लागू आईपीसी में शामिल नहीं किया जा सका। 1870 में विशेष अधिनियम 17 के जरिये सेक्शन 124ए आईपीसी में जोड़ा गया।
- यह ब्रिटेन के ‘देशद्रोह महाअपराध अधिनियम 1848’ की नकल था, जिसमें दोषियों को सजा में तीन साल की कैद से लेकर हमेशा के लिए सागर पार भेजना शामिल था।
सच की आवाज अब नहीं दबा पाएगी सरकार : राहुल
देशद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा, अब सच की आवाज सरकार दबा नहीं पाएगी। कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है, सरकार का विरोध करने वालों को भी सुना जाना चाहिए। राहुल ने ट्वीट किया, सच बोलना देशभक्ति है, देशद्रोह नहीं और सच को सुनना राजधर्म, जबकि सच को कुचलना राजहठ है। लोगों को अब डरने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, सत्ता को लेकर सच बोलना देशद्रोह नहीं है।
कांग्रेस ने देश तोड़ने का कोई अवसर नहीं छोड़ा : रिजिजू
अगर कोई पार्टी आजादी, लोकतंत्र और संस्थानों के सम्मान के खिलाफ है तो वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस है। वह हमेशा देश को तोड़ने वाली ताकतों के साथ खड़ी हुई, भारत को तोड़ने का कोई अवसर नहीं छोड़ा।’ केंद्रीय विधि मंत्री किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी को सोशल मीडिया पर दिए गए जवाब में कांग्रेस पर बड़ा हमला किया। रिजिजू ने जवाब दिया, ‘यह राहुल के खोखले शब्द हैं।’ उन्हें इतिहास याद दिलाते हुए लिखा, ‘पहला संशोधन कौन लाया? कोई और नहीं पं. जवाहरलाल नेहरू।
यह एसपी मुखर्जी और जनसंघ थे जो स्वतंत्र अभिव्यक्ति को खत्म कर रही सरकार के खिलाफ खड़े हुए। नेहरू ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार केरल में भंग करवा दी। जब स्वतंत्र अभिव्यक्ति को कुचलने की बात आती है तो इंदिरा गांधी स्वर्ण पदक विजेता बनती हैं। उन्हाेंने 50 बार अनुच्छेद 356 लगाया? लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ को कमजोर करने के लिए वे ‘समर्पित न्यायपालिका’ चाहती थीं।
ऐतिहासिक आदेश : अश्वनी
पूर्व कानून मंत्री अश्वनी कुमार ने इसे ऐतिहासिक बताते हुए कहा, अंतरिम आदेश न केवल सही है बल्कि राष्ट्र की संवेदनशीलता के अनुरूप भी है। औपनिवेशिक काल के कानून के खुलेआम व बेशर्म दुरुपयोग के विरोध में यह बिलकुल सही आदेश है।
सरकार का सुझाव : तेजी से हो लंबित मामलों की सुनवाई
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कानून के अनुपालन पर रोक लगाने का विरोध किया था। केंद्र ने लंबित मामलों को शीघ्र पूरा करने के लिए सुनवाई में तेजी लाए जाने का भी सुझाव दिया। केंद्र का तर्क था, हर मामले की गंभीरता से वह अवगत नहीं है। इनमें से कई आतंकी या मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े हो सकते हैं। मेहता ने कहा, आखिरकार लंबित मामले न्यायिक मंच के समक्ष हैं और हमें अदालतों पर भरोसा करना चाहिए।
आप इस बात पर विचार कर सकते हैं कि जमानत आवेदनों पर शीघ्रता से निर्णय लिया जाए। मौजूदा मामले में भी कोई आरोपी नहीं है। एक जनहित याचिका के जरिये तीसरे पक्ष के कहने पर कानून पर पर रोक नहीं लगाई जा सकती। पीठ ने मंगलवार को देशद्रोह के तहत जिन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज है उनके हितों की रक्षा के लिए लंबित कार्यवाही रोकने पर केंद्र से 24 घंटे के भीतर अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा था।
विरोध : सिब्बल बोले-पूरी तरह से लगे रोक
- देशद्रोह कानून की वैधता को चुनौती देने वाले एस जी वोम्बटकेरे समेत अन्य याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल ने मेहता का विरोध किया। उन्होंने कहा, यह हमारे लिए पूरी तरह से अस्वीकार है। सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-66ए की वैधता पर भी यही कहा था। तब सुप्रीम कोर्ट ने आईटी अधिनियम की धारा-66ए को असांविधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया, जबकि उसमें भी शक्ति एसपी स्तर के अधिकारी के पास थी।
- सिब्बल ने कहा, धारा 124 ए असांविधानिक हो गई है। जब केदारनाथ सिंह (1962) को शीर्ष अदालत ने इसकी वैधता को बरकरार रखते हुए फैसला किया था तब यह गैर-संज्ञेय अपराध था और 1973 में ही संज्ञेय बना दिया गया था। सिब्बल ने कहा, धारा-124ए पर पूरी तरह से रोक लगनी चाहिए।
भाजपा ने दिखाया साहस
भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा, 75 साल में कोई दल देशद्रोह कानून में बदलाव का साहस नहीं दिखा सका। यह हिम्मत भाजपा ने दिखाई और कांग्रेस सरकार की ऐतिहासिक गलती को सुधारने की पहल की। कांग्रेस ने अपने हर राज्य में कानून का दुरुपयोग किया।