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सुरक्षा बलों को नहीं मिले बुलेटप्रूफ हेलमेट, अपनी जान देकर चुका रहे हैं इस लापरवाही की कीमत!

Wed, 06 May 2020 01:25 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 06 May 2020 01:25 PM IST
सार

  • करीब 9 साल से जारी बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट खरीद प्रक्रिया आज तक पूरी नहीं
  • स्वीकृत संख्या के मुकाबले केवल दस पंद्रह फीसदी बुलेटप्रूफ हेलमेट
  • सभी पुराने मॉडल के हैं, जो एसएलआर व एके-47 जैसी राइफल की गोली नहीं झेल सकते

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Security forces did not get bulletproof helmets, only ten to fifteen percent of the sanctioned number
crpf - फोटो : file

विस्तार

आतंकियों और नक्सलियों से आए दिन लोहा लेने वाले केंद्रीय सुरक्षा बलों के पास खुद की हिफाजत के लिए जरूरी संसाधनों का भारी अभाव है। ऑपरेशन के दौरान बल के अधिकारियों और जवानों के पास बुलेटप्रूफ हेलमेट तक नहीं होता। कश्मीर में दो दिन पहले सीआरपीएफ के जिन तीन जवानों की आतंकी हमले में मौत हुई है, उनमें से एक जवान के चेहरे पर गोली लगी थी।

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केंद्रीय सुरक्षा बलों के पास तय एवं स्वीकृत संख्या के मुकाबले केवल दस पंद्रह फीसदी बुलेटप्रूफ हेलमेट हैं। ये सभी पुराने मॉडल के हैं, जो एसएलआर व एके-47 जैसी राइफल की गोली नहीं झेल सकते।

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करीब 9 साल से जारी बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट खरीद प्रक्रिया आज तक पूरी नहीं हो सकी है। नतीजा, सुरक्षा बलों के जवान इस लापरवाही की कीमत अपनी जान देकर चुका रहे हैं।

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बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट खरीद के मामले में हो रही है देरी

कश्मीर में कई वर्षों तक सीआरपीएफ की कमान संभालने वाले पूर्व आईजी एसएस संधू बताते हैं कि सुरक्षा बलों के सीने पर कोई सुरक्षा कवच नहीं है। ये किसी से छिपा नहीं है कि सभी जवानों को बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट नहीं मिल पाते।


बुलेटप्रूफ जैकेट का वजन इतना ज्यादा है कि बड़े ऑपरेशनों में उसका इस्तेमाल सहजता से नहीं हो पाता। ऐसी रिपोर्ट आती रही हैं कि आतंकी एवं नक्सली ऑपरेशनों में 30 फीसदी से अधिक जवान गर्दन या उसके ऊपर के हिस्से में गोली लगने से शहीद होते हैं।

इतने लंबे समय तक खरीद प्रक्रिया को लटका कर रखा जाता है। इसका खामियाजा हमारे सुरक्षा बलों को भुगतना पड़ रहा है। कश्मीर में सीआरपीएफ ने अपनी रणनीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है।

एक नाके पर कम से कम दस जवान तैनात होने चाहिए। सभी के पास व्यक्तिगत सुरक्षा के पूर्ण संसाधन हों। कभी ट्रायल में फेल होने के नाम पर तो कभी खरीद प्रक्रिया के सवालों के घेरे में आने के कारण सुरक्षा बलों के लिए बुलेटप्रूफ हेलमेट नहीं खरीदे जा सके है।

बुलेटप्रूफ जैकेट का ये है मापदंड

एक बटालियन में अगर 7 कंपनी हैं, तो प्रति बटालियन 630 बुलेटप्रूफ जैकेट मिलेंगी। छह कंपनी वाली बटालियन है तो 540 बुलेटप्रूफ जैकेट दी जाएंगी। विशेष अभियान के लिए 90 फीसदी जवान इस जैकेट को पहनेंगे।

बीएसएफ में जीरो लाइन पर गश्त के दौरान प्रति कंपनी 15 जैकेट देने का नियम हैं। बटालियन को 150 जैकेट मिलती हैं। फ्रंटियर या रेंज हेडक्वार्टर पर 40 जैकेट रखी जाती हैं।

असम राइफल प्रशिक्षण केंद्र के लिए 100 बुलेटप्रूफ जैकेट अलॉट की गई हैं। त्रिपुरा, कछार और मिजोरम में प्रति बटालियन 480 जैकेट स्वीकृत की गई हैं। 5 अप्रैल 2017 को तत्कालीन गृह राज्यमंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने राज्यसभा में बताया था कि मौजूदा समय में किस बल के पास कितनी बुलेटप्रूफ जैकेट हैं।

  • बीएसएफ-33509 
  • सीआईएसएफ-2283 
  • सीआरपीएफ-95073
  • आईटीबीपी-11816
  • एनएसजी-3461
  • एसएसबी-6972 

आतंकवादी हमलों में 2016 के दौरान सीएपीएफ के 65 कर्मी शहीद हुए थे, जबकि 206 घायल हो गए थे। 2017 में 64 शहीद व 117 घायल और 2018 में 47 शहीद व 151 घायल हुए थे।

जरूरत एक लाख से अधिक बुलेटप्रूफ हेलमेट की

केंद्रीय सुरक्षा बलों को उनकी संख्या के हिसाब से सवा लाख बुलेटप्रूफ हेलमेट की जरूरत है। अभी उनके पास करीब पांच हजार हेलमेट हैं। सालभर आतंकी और नक्सली क्षेत्र में ऑपरेशन को अंजाम देने वाले सीआरपीएफ के पास मुट्ठीभर बुलेटप्रूफ हेलमेट भी नहीं हैं।

चूंकि स्वचालित राइफल की गोली से ये हेलमेट जवान को बचा नहीं पाते, इसलिए ऑपरेशनों में इनका इस्तेमाल नहीं किया जाता। नक्सलियों के कई बड़े हमलों में ज्यादातर जवानों का सीना और सिर कवच रहित देखा गया है।

सीआरपीएफ जवानों का माथा दुश्मन की गोली से बचा रहे, इसके लिए एक दशक पहले एक हजार पटके खरीदे गए थे। यहां भी बल को 50 हजार पटकों की जरूरत थी। कई साल पहले जब सीआरपीएफ ने अपने स्तर पर पटके खरीदने चाहे तो गृह मंत्रालय ने ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एवं डेवलपमेंट (बीपीआरडी) को यह जिम्मेदारी सौंप दी थी।

उसके बाद ये फाइलों में ही घूमते रहे। गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के एक्सपर्ट आतंकवादी और नक्सली ज्यादातर वारदात घात लगाकर करते हैं। पहाड़ी से भी हमलों को अंजाम देते हैं। ऐसी स्थिति में जवानों के सिर में गोली लगने की संभावना बनी रहती है। 

पीएमओ तक पहुंच चुका है बुलेटप्रूफ हेलमेट खरीद का मामला

जम्मू-कश्मीर में तैनात केंद्रीय सुरक्षा बल के एक अधिकारी ने प्रधानमंत्री कार्यालय से शिकायत की थी कि बल जो हेलमेट खरीद रहा है, वे एके-47 से निकली गोली का सामना नहीं कर सकते हैं। ये हेलमेट केवल 9 मिमी की गोली रोक सकते हैं।

शिकायतकर्ता ने पीएमओ से अनुरोध किया था कि वह एक निजी कंपनी से खरीदे जा रहे 9 एमएम-बुलेट-प्रतिरोधी हेलमेट की खरीद बंद करा दें। इनकी क्वालिटी मापदंडों के मुताबिक नहीं है।



इस कंपनी ने मुंबई पुलिस और राजस्थान पुलिस को भी बुलेट-प्रूफ जैकेटों की आपूर्ति की थी, जो सुरक्षा परीक्षणों में विफल रही। सीआरपीएफ हेडक्वॉर्टर के डीआईजी एम दिनाकरण के अनुसार, हम इस मामले में आगे बढ़ रहे हैं। बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट के ट्रायल चल रहे हैं। जवानों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं होगा।

 

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