अपराध के दायरे से बाहर हो सकती है धारा 377
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सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा-377 की वैधता तय करते वक्त संवैधानिक मूल्यों का पालन किया जाएगा न कि यह देखा जाएगा कि इस पर ज्यादातर लोगों का नजरिया क्या है। पीठ ने कहा कि अगर समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया जाता है तो एलजीबीटी समुदाय पर लगा सामाजिक कलंक और असमानता आदि भी खत्म हो जाएगी।
यह पथभ्रष्टता नहीं, बल्कि भिन्नता है। वर्षों से हम सभी में समलैंगिकों के प्रति भेदभाव की भावना घर कर गई है। धारा-377 में बदलाव से दो सहमति वाले व्यक्ति अंतरंग हो सकते हैं, नौकरी ले सकते हैं क्योंकि इस पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि अगर केंद्र सरकार ने 1860 के इस कानून में संशोधन नहीं किया है तो इसका यह कतई मतलब नहीं है कि कुछ लोग इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए इस प्रावधान को चुनौती नहीं दे सकते।
वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा समलैंगिकता को अपराध के दायरे से मुक्त करने के फैसले को पलट दिया था लेकिन शीर्ष अदालत ने यह संसद के विवेक पर छोड़ दिया था कि अगर जरूरी हो तो वह इसमें संशोधन कर सकती है।
एलजीबीटी समुदाय को अधिकारों से महरूम रखा जा रहा
निर्णय लेते वक्त धार्मिक पहलुओं को न छुएं : केंद्र
सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से आग्रह किया कि धारा-377 पर निर्णय लेते वक्त धार्मिक पहलुओं पर विचार न किया जाए। इस मामले को दो वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए संबंध तक ही सीमित रखा जाए।
उन्होंने कहा कि पीठ को धारा-377 को संवैधानिकता और वैधता पर अपनी चर्चा को तब तक सीमित रखना चाहिए जब तक यह दो समलैंगिक वयस्कों के बीच निजी तौर पर बने संबंधों को अपराध मानता है। जिसके लिए आजीवन कारावास की सजा तक हो सकती है।
उन्होंने पीठ के सामने एक किताब भी रखी, जिसमें कुछ धार्मिक कहानियां हैं। दरअसल याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकील अशोक देसाई ने कुछ देव गाथाओं में यौन विविधता का हवाला देते हुए कहा कि समान सेक्स के बीच प्रेम निस्वार्थ होता है।
इस पर मेहता ने कोर्ट से कहा कि धार्मिक मान्यताओं और चरित्रों को इस बहस से बाहर रखा जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने दोहराया कि धारा-377 पर सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला होगा, वह सरकार को मान्य होगा। मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।
एलजीबीटी समुदाय को अधिकारों से महरूम रखा जा रहा : याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ताओं के वकील कृष्णन वेणुगोपाल ने कहा कि धारा-377 बोलने व अभिव्यक्ति के अधिकार और अंतरात्मा के अधिकार के विपरीत है। हमें अपने विचार खुलेआम व्यक्त करने का अधिकार है लेकिन दंडात्मक प्रावधान की वजह से एलजीबीटी समुदाय ऐसा नहीं कर पा रहा है। उन्हें अधिकारों से महरूम रखा जा रहा है।
उन्होंने कहा कि एलजीबीटी समुदाय के साथ हो रहे भेदभाव को खत्म करने के लिए सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। वहीं दो ईसाई संघों के वकील मनोज जॉर्ज ने धारा-377 को खत्म करने का विरोध करते हुए मामले में केंद्र सरकार पर यूटर्न लेने का आरोप लगाया। हालांकि एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने इन आरोपों का खंडन किया।