SC: 'स्थानीय नियमों पर बनी इमारत में संचालित हों नर्सरी और प्राथमिक विद्यालय', CBSE को सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि देश में नर्सरी और प्राथमिक विद्यालयों का संचालन स्थानीय भवन निर्माण नियमों के अनुसार बने भवनों में किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति बीआर गवई और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की याचिका पर सुनवाई के दौरान आदेश पारित किया। आइए पढ़ते हैं सुप्रीम कोर्ट की अहम खबरें...।
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि देश में नर्सरी और प्राथमिक विद्यालयों का संचालन स्थानीय भवन निर्माण नियमों के अनुसार बने भवनों में किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति बीआर गवई और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की याचिका पर सुनवाई के दौरान आदेश पारित किया।
याचिका में सीबीएसई ने शीर्ष अदालत के 13 अप्रैल 2009 के फैसले में दिए गए निर्देशों को लेकर जानकारी मांगी है। कोर्ट ने कहा कि नर्सरी और प्राथमिक विद्यालयों को ऐसे भवनों में स्थापित किया जाना चाहिए, जिनका निर्माण स्थानीय भवन निर्माण नियमों के अनुरूप किया गया हो।
अपने 2009 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्देश दिया था। इसके मुताबिक नर्सरी और प्राथमिक विद्यालयों को एक मंजिला इमारत वाले भवन में संचालित किया जाए। साथ ही भवन में भूतल समेत तीन से ज्यादा मंजिल नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा कोर्ट ने स्कूल की सीढ़ियों लेकर भी निर्देश जारी किए थे।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीबीएसई की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कोर्ट ने 2009 में आग के खतरों के मद्देनजर यह निर्देश जारी किए थे। अब देश में कई राज्य ऐसे हैं जिनके भवन निर्माण नियमों में आग से बचाव के इंतजामों के साथ चार मंजिला और पांच मंजिला इमारतें तक बनाने की अनुमति है। उन्होंने कहा कि सीबीएसई के मानदंड सुप्रीम कोर्ट के 2009 के फैसले के अनुरूप हैं।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 2009 के फैसले के बाद राष्ट्रीय भवन संहिता 2016 आई। इसके चलते कई राज्यों के अपने नियमों में बदलाव कर लिया। अब दिक्कत तब आती है जब सीबीएसई के पास मान्यता के लिए आवेदन आता है तो हम सुप्रीम कोर्ट के 2009 के निर्देशों के अनुसार काम करते हैं।
वकील ने कहा कि राज्यों के भवन निर्माण संबंधी नियम भी आग के सुरक्षा इंतजामों के साथ बहुमंजिला इमारतों के निर्माण पर जोर देते हैं। इसलिए सीबीएसई की मांग है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के निर्देशों में ढील दी जाए। ताकि राज्यों के भवन निर्माण नियमों के मुताबिक मान्यता पर अनुमति दी जा सके। इस पर पीठ ने कहा कि 2009 के दो खंडों में बदलाव की जरूरत है।
आपराधिक आरोप झेल रहे व्यक्ति के स्वतंत्रता अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत तीन युवकों के खिलाफ दर्ज मामले को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जीवन और स्वतंत्रा के अधिकार को सिर्फ इस वजह से अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि संबंधित व्यक्ति आपराधिक मामलों का सामना कर रहा है। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा, इन लोगों के खिलाफ यूपी गैंग्गस्टर एंड एंटी सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट के तहत दर्ज किया गया मामला औसत या मध्यम नहीं बल्कि बेहद गंभीर प्रकृति का है। पीठ ने कहा, हमारा मानना है कि संबंधित मामले के लिए जरूरी गंभीरता को न्यायिक रूप से सीमित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि हर मामले की अपनी विशिष्टताओं पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। हालांकि, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिली जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी को केवल इस कारण से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं।
पीठ ने कहा, जब किसी कानून को लागू करने की बात आती है तो संबंधित अधिकारियों को कोई भी निरंकुश विवेक देना स्पष्ट रूप से नासमझी होगी। प्रावधान जितना अधिक कठोर या दंडात्मक होगा, उसे लागू करने की आवश्यकता का परीक्षण भी उतना ही सख्त होगा। यह कहते हुए पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 17 जनवरी, 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने तीन व्यक्तियों - जय किशन, कुलदीप कटारा और कृष्णा कटारा के खिलाफ एफआईआर को रद्द करने से इन्कार कर दिया था। इन्होंने इस आधार पर शीर्ष अदालत का रुख किया कि उनके खिलाफ दर्ज शुरुआती तीन प्राथमिकियां दो परिवारों के बीच संपत्ति के विवाद से संबंधित थीं और आरोपों की प्रकृति दीवानी किस्म की थी। ऐसे में गैंग्गस्टर एक्ट के तहत हो रही कार्यवाही रद्द की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट 2023 के कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के खिलाफ याचिकाओं पर 19 फरवरी को सुनवाई करेगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर इस बीच कुछ भी होता है, तो इसके परिणाम सामने आएंगे। जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ को एनजीओ ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ के वकील प्रशांत भूषण ने बताया कि पहले याचिकाओं पर बुधवार को सुनवाई होनी थी, लेकिन अब उन्हें 19 फरवरी को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। भूषण ने कहा कि मामले में तात्कालिकता यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार 18 फरवरी को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। सरकार 2023 के कानून के तहत नए सीईसी की नियुक्ति कर सकती है, जिसे चुनौती दी गई है। पीठ ने कहा, हम मामले की सुनवाई 19 फरवरी को तय कर रहे हैं। अगर इस बीच कुछ भी होता है, तो उसके परिणाम सामने आएंगे।
शीर्ष अदालत ने 3 फरवरी को मामले की सुनवाई बुधवार के लिए तय करते हुए कहा था कि वह इस मुद्दे पर गुण-दोष के आधार पर अंतिम फैसला करेगी। भूषण ने पहले कहा था कि 2023 के फैसले में कहा गया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की सदस्यता वाली एक स्वतंत्र समिति से की जानी है।