Supreme Court: बाटला हाउस में निर्माण गिराने के लिए जारी नोटिस के खिलाफ याचिका दाखिल, शीर्ष कोर्ट करेगा सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को झारखंड की एक महिला जज को बच्चे की देखरेख के लिए अवकाश (चाइल्ड केयर लीव) न दिए जाने पर राज्य सरकार और रांची हाईकोर्ट को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। महिला जज ने अवकाश की मांग करते हुए कहा कि वह न सिर्फ एकल अभिभावक (सिंगल मदर) हैं बल्कि समाज के सबसे निचले तबके से आती हैं।
चीफ जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता से पूछा कि उन्होंने अवकाश के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया। जवाब में अधिवक्ता ने पीठ से कहा कि हाईकोर्ट ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान इस मामले में तत्कालिकता को नहीं मानते। अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता का कॅरियर शानदार है और उन्होंने महज ढाई साल में 4,660 मामलों का निपटारा किया है। महिला जज एकल अभिभावक होने के साथ-साथ समाज के वंचित समुदाय अनुसूचित श्रेणी से हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश गवई ने जानना चाहा कि क्या वह विधवा हैं। इस पर अधिवक्ता ने कहा नहीं, वह सिर्फ एकल अभिभावक हैं। इसके बाद पीठ ने इस मामले में झारखंड सरकार और रांची हाईकोर्ट को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश गवई ने प्रतिवादियों को इलेक्ट्रॉनिक संचार सहित सभी माध्यम से नोटिस जारी करने कहा और निर्देश दिया और कहा कि हम अगले सप्ताह इस पर सुनवाई करेंगे। पीठ ने प्रतिवादियों से कहा कि हम यह साफ कर देते हैं कि मामले को लंबित रखने के बजाए जल्द निपटारा करेंगे।
बच्चे की देखरेख के लिए 730 दिनों का अवकाश मिलता है
महिला जज ने छह माह के लिए चाइल्ड केयर अवकाश की मांग की है। कानून मुताबिक कोई भी महिला कर्मचारी बच्चे की देखरेख के लिए 730 दिन का अवकाश ले सकती हैं। झारखंड की जिला अदालत में अतिरिक्त सेशन जज कशिका एम प्रसाद ने बच्चे की देखभाल के लिए अवकाश नहीं दिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। तबादला किसी अन्य स्थान पर किए जाने के बाद उन्होंने 10 जून से दिसंबर तक बच्चे की देखभाल के लिए अवकाश की मांग की थी, लेकिन प्रशासन ने अवकाश देने से इन्कार कर दिया।
तेलंगाना फोन टैपिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपी टी प्रभाकर राव को दी अंतरिम राहत
तेलंगाना फोन टैपिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपी और तेलंगाना के विशेष खुफिया ब्यूरो (एसआईबी) के पूर्व प्रमुख टी प्रभाकर राव को दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम राहत दे दी है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने टी प्रभाकर राव को जांच अधिकारी के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया और कहा कि उनका पासपोर्ट उन्हें उपलब्ध कराया जाए। शीर्ष अदालत ने राव को यह भी निर्देश दिया कि वह पासपोर्ट प्राप्त होने के तीन दिन के भीतर भारत लौट आएंगे।
तेलंगाना फोन टैपिंग मामले में मुख्य आरोपी राव ने अपनी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करने के तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामला सामने आने के बाद से राव फरार चल रहे हैं। उनके अमेरिका में होने का संदेह है। पुलिस अधिकारी ने बताया कि उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया है और उसका पासपोर्ट रद्द कर दिया गया है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने राव की अग्रिम जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। मामले की सुनवाई 5 अगस्त को निर्धारित की गई है।
गौरतलब है कि 22 मई को हैदराबाद की एक अदालत ने फोन टैपिंग मामले में राव के खिलाफ आदेश जारी किया है। आदेश के मुताबिक अगर राव 20 जून तक अदालत में पेश नहीं होते हैं तो उन्हें भगोड़ा घोषित किया जा सकता है। एसआईबी के निलंबित डीएसपी समेत चार पुलिस अधिकारियों को हैदराबाद पुलिस ने मार्च 2024 में गिरफ्तार किया था। इन पर विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से खुफिया जानकारी मिटाने और पिछली बीआरएस सरकार के दौरान कथित तौर पर फोन टैपिंग का आरोप है। बाद में उन्हें जमानत मिल गई।
बाटला हाउस में निर्माण गिराने के लिए जारी नोटिस के खिलाफ याचिका पर शीर्ष कोर्ट करेगा सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के जामिया नगर स्थित बाटला हाउस में कुछ निर्माणों के खिलाफ जारी किए गए ध्वस्तीकरण नोटिस के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। शीर्ष कोर्ट अगले सप्ताह इस याचिका पर सुनवाई करेगा। यह याचिका 40 व्यक्तियों द्वारा दायर की गई थी। इन लोगों का कहना है कि वे बाटला हाउस के खसरा नंबर 271 और 279 के वास्तविक निवासी और संपत्ति के मालिक हैं।
गुरुवार को यह याचिका एक वकील ने तत्काल सुनवाई के लिए सीजेआई बीआर गवई के समक्ष पेश की। इस पर पहले तो सीजेआई गवई ने वकील से उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को कहा। हालांकि, जब वकील ने कहा कि निर्माण को गिराने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों का उल्लंघन करते हुए नोटिस जारी किए गए हैं। जिसके बाद सीजेआई ने बताया कि उस आदेश में, उच्च न्यायालयों का दरवाजा खटखटाने का अधिकार सुरक्षित रखा गया है।
बायजू की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार, बीसीसीआई व अन्य को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट शिक्षा और प्रौद्योगिकी कंपनी बायजू के प्रवर्तकों की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है। इस याचिका में दिवाला कार्यवाही में कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया के निपटान को बरकरार रखने की मांग की गई है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने इस मामले में बीसीसीआई सहित प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर याचिका पर उनकी प्रतिक्रियाएं मांगी हैं। जारी नोटिस में कहा गया है कि अंतरिम राहत के लिए आवेदन पर 21 जुलाई को विचार किया जाएगा। कंपनी के प्रमोटरों के वकीलों ने इस मामले में राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) की चेन्नई पीठ के फैसले को चुनौती दी है। उस फैसले में लेनदारों की समिति के गठन से पहले बकाया राशि का पूर्ण और अंतिम निपटारा होने के बावजूद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड द्वारा शुरू की गई दिवाला कार्यवाही को वापस लेने से इन्कार कर दिया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल ने कहा कि बायजू और बीसीसीआई के बीच 158 करोड़ रुपये के समझौते पर पूरी तरह सहमति बन गई थी। भुगतान भी हो गया था और समिति के गठन से काफी पहले ही अंतरिम समाधान पेशेवर (आईआरपी) को औपचारिक रूप से इसकी जानकारी दे दी गई थी।
बाघ अभयारण्यों के मुख्य क्षेत्रों में पर्यटकों के रात्रि विश्राम पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने देश के बाघ अभयारण्यों के मुख्य क्षेत्रों में पर्यटकों के रात्रि विश्राम पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ इस दलील से सहमत नहीं हुई कि बाघ अभयारण्यों के मुख्य क्षेत्रों में पर्यटकों के रात भर ठहरने से पारिस्थितिकी संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा क्योंकि इसके परिणामस्वरूप वाहनों की आवाजाही बढ़ जाती है। बाघ अभयारण्यों के मुख्य क्षेत्रों में पर्यटकों के रात्रि विश्राम पर रोक लगाने से इन्कार करते हुए सीजेआई ने कहा कि इससे स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। शुक्रवार को शीर्ष अदालत राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को देश में बाघों के संरक्षण से संबंधित मामलों पर सरकारी प्राधिकारियों को दिशानिर्देश जारी करने के बजाय निर्देश जारी करने की अनुमति देने संबंधी प्रस्ताव पर विचार करेगी। इससे पहले, पीठ ने कहा था कि वह बाघ अभयारण्यों के प्रबंधन के लिए पूरे देश में एक समान नीति चाहती है। कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि नीति में बाघ अभयारण्यों के अंदर वाहनों की आवाजाही के पहलू को भी शामिल किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट की ओर से उस घटना पर स्वतः संज्ञान लिए जाने का उल्लेख किया, जिसमें पर्यटकों को ले जा रहे सफारी वाहनों ने नए साल की पूर्व संध्या पर महाराष्ट्र के उमरेड-पौनी-करहांडला अभयारण्य में एक बाघिन और उसके शावकों की आवाजाही में बाधा डाली थी।
खनन माफिया, दोषी अफसरों पर नहीं की कार्रवाई, हरियाणा सरकार को सुप्रीम फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को खनन माफिया और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के लिए बृहस्पतिवार को कड़ी फटकार लगाई। इन अधिकारियों पर वन कानूनों का उल्लंघन करने और नूंह में अरावली से निकाले गए पत्थरों को अवैध रूप से राजस्थान ले जाए जाने में मदद करने का आरोप है।
देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले में हरियाणा के मुख्य सचिव की तरफ से दायर हलफनामे की कड़ी आलोचना की। पीठ अरावली से निकाले गए पत्थरों को राजस्थान में अवैध रूप से पहुंचाने में मदद करने के लिए खनन माफिया और राज्य के अधिकारियों की मिलीभगत से संबंधित याचिका पर विचार कर रही थी।