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Supreme Court News: जम्मू-कश्मीर के कैदियों को उत्तराखंड की जेल में भेजने के खिलाफ याचिका, केंद्र को नोटिस

Fri, 04 Nov 2022 09:58 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Fri, 04 Nov 2022 09:58 PM IST
सार

वरिष्ठ वकील ने कहा कि स्थानीय कानून के तहत हिरासत में लिए गए लोगों को केंद्र शासित प्रदेश से बाहर नहीं ले जाया जा सकता क्योंकि कानून केवल केंद्र शासित प्रदेश पर लागू होता है।

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SC seeks replies of Centre, J-K on plea against shifting of detenues out of UT jails
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक याचिका पर केंद्र, जम्मू-कश्मीर सरकार और अन्य से जवाब मांगा, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सार्वजनिक सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिए गए 20 से अधिक लोगों को केंद्र शासित प्रदेश की जेलों से उत्तर प्रदेश और हरियाणा की जेलों में स्थानांतरित कर दिया गया है। मुख्य न्यायाधीश उदय उमेश ललित और बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने चार बंदियों के रिश्तेदारों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस की दलीलों को सुनते हुए कहा कि उन्हें जम्मू-कश्मीर की जेलों से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया है और  उनके रिश्तेदारों को उनसे मिलने से वंचित कर दिया गया है।  
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वरिष्ठ वकील ने कहा कि स्थानीय कानून के तहत हिरासत में लिए गए लोगों को केंद्र शासित प्रदेश से बाहर नहीं ले जाया जा सकता क्योंकि कानून केवल केंद्र शासित प्रदेश पर लागू होता है। बंदी जम्मू और कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, 1978 के प्रावधानों के तहत हिरासत में हैं। यह याचिका राजा बेगम नाम की एक महिला और तीन अन्य ने वकील सत्य मित्रा के माध्यम से दायर की थी। श्रीनगर के परिमपोरा की रहने वाली बेगम के बेटे आरिफ अहमद शेख को उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित सेंट्रल जेल में शिफ्ट कर दिया गया है। उसे 7 अप्रैल को पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया था।
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महाराष्ट्र में दुकानों पर मराठी साइनबोर्ड का मामला 
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फेडरेशन ऑफ रिटेल ट्रेडर्स वेलफेयर एसोसिएशन के सदस्यों को महाराष्ट्र सरकार के नियम के खिलाफ राज्य में दुकानों और प्रतिष्ठानों के नाम मराठी में प्रदर्शित करने के लिए दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की। न्यायमूर्ति के एम जोसेफ और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की पीठ ने बंबई उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ एसोसिएशन द्वारा दायर एक याचिका पर अंतरिम निर्देश पारित किया। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं से एसोसिएशन के सदस्यों के नामों के साथ एक सूची जमा करने को कहा और 18 नवंबर को मामले की सुनवाई तय की। 
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उच्च न्यायालय ने 23 फरवरी को दुकानों और प्रतिष्ठानों को मराठी (देवनागरी लिपि) में अपना नाम प्रदर्शित करने के लिए राज्य सरकार के नियम को रद्द करने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने फेडरेशन ऑफ रिटेल ट्रेडर्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा दायर एक याचिका को खारिज कर दिया था और उस पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। इसने कहा था कि डिस्प्ले बोर्ड पर किसी अन्य भाषा का उपयोग करने पर कोई रोक नहीं है और नियम केवल यह अनिवार्य करता है कि दुकानों के नाम मराठी में प्रदर्शित होंगे।

मलविंदर मोहन सिंह की बीमार पत्नी की जांच एम्स डॉक्चर करेंगे
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एम्स दिल्ली के निदेशक को फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड के जेल में बंद पूर्व प्रमोटर मलविंदर मोहन सिंह की बीमार पत्नी की मेडिकल रिपोर्ट का विश्लेषण करने के लिए डॉक्टरों की एक टीम गठित करने का निर्देश दिया, जिन्होंने बीमारी के आधार पर अंतरिम जमानत मांगी है। मुख्य न्यायाधीश उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने सुनवाई की अगली तारीख 7 नवंबर के लिए तय कर दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया।

हालांकि, अदालत ने मालविंदर सिंह की पत्नी को फोर्टिस अस्पताल से एम्स में स्थानांतरित करने से इनकार कर दिया, जहां वह वर्तमान में अस्पताल में भर्ती है। न ही एम्स के डॉक्टरों को उनकी स्वास्थ्य स्थिति की जांच के लिए निजी अस्पताल जाने की अनुमति दी। पीठ ने कहा कि एम्स के निदेशक द्वारा नियुक्त किए जाने वाले विशेषज्ञ मेडिकल रिकॉर्ड का विश्लेषण करेंगे और इस अदालत को एक रिपोर्ट देंगे जो सिंह की अंतरिम रिहाई की याचिका पर विचार करेगी, जो अपनी पत्नी की देखभाल करना चाहते हैं।


 

विधवा के दुष्कर्म और हत्यारोपी की सजा घटाई

सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में एक विधवा के दुष्कर्म और हत्या के लिए एक व्यक्ति को दी गई मौत की सजा को शुक्रवार को कम कर दिया। अदालत ने नोट किया कि आरोपी लगभग 10 साल तक जेल में एकांत कारावास में था। शीर्ष अदालत ने कहा कि दोषी को एकांत कारावास में रखना उसकी भलाई पर बुरा प्रभाव डालता है। शीर्ष अदालत बी ए उमेश द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो 1998 में बेंगलुरु में एक विधवा के दुष्कर्म और हत्या में शामिल था।

प्रधान न्यायाधीश यू यू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मौजूदा मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा 2006 में अपीलकर्ता को मौत की सजा सुनाई गई थी और दया याचिका को अंततः 12 मई, 2013 को राष्ट्रपति द्वारा निपटाया गया था, जिसका अर्थ है कि एकांत कारावास और अलगाव में अपीलकर्ता की कैद 2006 से 2013 तक कानून की मंजूरी के बिना था और इस अदालत द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के पूरी तरह से खिलाफ था। 

भारतीय मूल के केन्याई नागरिक को एक साल की जेल 
अपने आदेशों की जानबूझकर अवज्ञा पर कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय मूल के एक केन्याई नागरिक को एक साल की जेल की सजा के अलावा उस पर अलग हुई पत्नी से अपने बेटे की कस्टडी हासिल करने में धोखाधड़ी से दीवानी और आपराधिक अवमानना करने के लिए 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। । मुख्य न्यायाधीश उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने ये फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने 11 जुलाई को पेरी कंसाग्रा को अपनी अलग पत्नी से अपने बेटे की कस्टडी हासिल करने और वचन देने के बावजूद शीर्ष अदालत में वापस नहीं आने के लिए धोखाधड़ी करने के लिए अवमानना का दोषी ठहराया था।  
 
 
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