राजनीति के अपराधीकरण पर रोक के लिए चुनाव आयोग हफ्ते भर में बनाए रूपरेखा: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राजनीति में अपराधीकरण पर चिंता जताते हुए राष्ट्रहित को देखते हुए चुनाव आयोग को एक हफ्ते में राजनीति से अपराधियों को दूर करने की रूपरेखा तैयार करने के लिए कहा है।
जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन और जस्टिस एस रवींद्र भट्ट की पीठ ने कहा कि इस संबंध में कुछ करने की जरूरत है। पीठ ने चुनाव आयोग और याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय को साथ बैठकर सुझाव पेश करने के लिए कहा है कि राजनीति में अपराधीकरण से कैसे निपटा जा सकता है।
दरअसल, राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण के नहीं थमने पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चुनावी प्रत्याशियों को इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के बारे में घोषणा करने के 2018 के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगाने में मदद नहीं मिल पा रही है।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि उम्मीदवारों से उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि की मीडिया में घोषणा करने के बारे में कहने के बजाए राजनीतिक दलों से कहा जाना चाहिए कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट ही न दें।
यह दी थी याचिका
गत वर्ष 29 मार्च को याचिकाकर्ता उपाध्याय ने अवमानना याचिका दायर कर कहा था अदालती निर्देश के बावजूद उम्मीदवारों के लिए लंबित आपराधिक मुकदमों की जानकारी अखबार व टीवी में प्रकाशित या प्रसारित करने को अनिवार्य करने संबंधी अधिसूचना जारी नहीं की है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को अवमानना नोटिस जारी किया था।
सितंबर, 2018 में पांच सदस्यीय पीठ ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने सितंबर 2018 में सर्वसम्मति से ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि सभी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से पहले चुनाव आयोग के समक्ष अपने आपराधिक रिकॉर्ड को बड़े अक्षरों में प्रकाशित कराना होगा। यह प्रकाशन मतदान के दो दिन पहले तक जारी रखना होगा। वहीं, इलेकट्रॉनिक मीडिया के जरिए तीन दिन खुद अपने ऊपर लगे आरोपों को बताना होगा।
2019 के लोकसभा चुनाव में थे 1500 दागी उम्मीदवार
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 के लोकसभा चुनाव में 19 फीसदी 1500 दागी उम्मीदवार मैदान में थे। 2014 के आम चुनाव में 17 फीसदी यानी 1404 प्रत्याशियों ने अपने ऊपर आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी दी थी। 2009 में ऐसे 1,158 प्रत्याशी थे।
एडीआर ने 2019 में लोकसभा चुनाव लड़ रहे 8,049 में से 7,928 उम्मीदवारों के हलफनामों का विश्लेषण करते हुए बताया था कि 1070 उम्मीदवारों पर दुष्कर्म, हत्या, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर केस दर्ज हैं। 2014 में 8,205 उम्मीदवारों में 908 यानी 11 फीसदी पर ऐसे केस थे। 2009 में 7810 उम्मीदवारों में 608 यानी 8 फीसदी पर गंभीर केस थे।
दिल्ली चुनाव: 2014 में 673 उम्मीदवारों के खिलाफ
2015 चुनाव में 673 उम्मीदवारों में से 114 (17 फीसदी) के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज था। 2013 चुनाव में 796 उम्मीदवारों में से 129 (16 फीसदी) के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज था। 2008 चुनाव में 790 उम्मीदवारों में से 111 (14 फीसदी) के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज था।
कितना कारगर है जनप्रतिनिधित्व कानून?
जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा आठ दोषी राजनेताओं को चुनाव लड़ने से रोकती है। हालांकि, ऐसे नेता जिन पर केवल मुकदमा चल रहा है, वे चुनाव लड़ने के लिये स्वतंत्र हैं। भले ही उनके ऊपर लगा आरोप कितना भी गंभीर है।
राजस्थान पंचायत चुनाव: सरकार के नोटिफिकेशन के मुताबिक ही चुनाव
राजस्थान पंचायत चुनाव में शेष बची सभी पंचायतों में चुनाव करवाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राज्य की अशोक गहलोत सरकार को बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार अब सरकार के नोटीफिकेशन के मुताबिक ही चुनाव होंगे। राज्य चुनाव आयोग को अप्रैल के दूसरे हफ्ते में ही बाकी बचे हुए चुनाव करवाने होंगे।
एएजी मनीष सिंघवी ने सरकार की ओर से अर्जी दाखिल करते हुए शेष बची सभी पंचायतों में सरकार के नोटिफिकेशन के अनुसार चुनाव कराने की मांग की। वहीं, राज्य चुनाव आयोग ने अपने काम करने के लिए 3 महीने का समय मांगा था।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 1 दिसंबर को हुए संशोधित पुनर्गठन को सही मानते हुए जोधपुर हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी। आयोग ने प्रदेश की 11,139 ग्राम पंचायतों के लिए चार चरणों में चुनाव कार्यक्रम घोषित किया था।
पहले, दूसरे और तीसरे चरण में प्रदेश की 9,171 ग्राम पंचातयों के चुनाव होने थे, जबकि चौथे चरण में 1,954 ग्राम पंचायतों के लिए चुनाव तय किए गए। आयोग ने कानूनी अड़चनों के कारण शेष बची ग्राम पंचायतों के लिए चुनावी कार्यक्रम घोषित नहीं किया था।