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एमबीबीएस और बीडीएस के लिए कॉमन मेडिकल एंट्रेस को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी

Tue, 12 Apr 2016 09:42 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 12 Apr 2016 09:42 AM IST
सार

  • संविधान पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश को वापस लिया

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sc recalled its controversial judgement scrapping single common entrance test for admission to MBBS
- फोटो : Getty Images

विस्तार

एमबीबीएस, बीडीएस और परास्नातक कोर्स केलिए समान प्रवेश परीक्षा आयोजित करने का रास्ता एक बार फिर खुल गया है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने वर्ष 2013 के उस फैसले को वापस ले लिया है जिसमें मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया(एमसीआई) और डेंटल कौंसिल ऑफ इंडिया(डीसीआई) द्वारा एमबीबीएस, बीडीएस और परास्नातक कोर्स केलिए समान प्रवेश परीक्षा आयोजित करने को संविधान के विरूद्ध बताया गया था। मालूम हो कि एमसीआई और डीसीआई ने अधिसूचना जारी कर नेशनल इलिजिबिलिटी इंटरेंस टेस्ट(एनईईटी) आयोजित करने का निर्णय लिया था।
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न्यायमूर्ति अनिल आर दवे की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि हमारा मानना है कि क्रिशिचन मेडिकल कॉलेज मामले में वर्ष 2013 में दिए गए फैसले में बदलाव की दरकार है। संविधान पीठ ने कहा कि हम फिलहाल इसकेकारणों पर नहीं जाना चाहते क्योंकि इससे मामले की सुनवाई प्रभावित हो सकती है। संविधान पीठ ने कहा कि हमने पाया कि उस फैसले को सुनाने से पहले पीठ केसदस्यों के बीच विचार-विमर्श नहीं किया गया था।
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लिहाजा हम 18 जुलाई 2013 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं को स्वीकार करते हैं। संविधान पीठ ने कहा कि इस मसले पर नए सिरे से सुनवाई की दरकार है। इसकेसाथ ही संविधान पीठ ने पुनर्विचार याचिकाओं का निपटारा कर दिया है। 
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मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया ने दी थी चुनौती

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एनईईटी को असंवैधानिक करार दिए जाने केफैसले को केंद्र सरकार और मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया(एमसीआई) ने चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति अलतमस कबीर द्वारा बहुमत पर आधारित पर सुनाए गए फैसले में एनईईटी संबंधित एमसीआई और डीसीआई द्वारा जारी अधिसूचना को असंवैधानिक करार दिया गया था। संविधान पीठ ने गत 15 जनवरी को देश की विभिन्न अदालतों में चल रहे इससे संबंधित मामलों को ट्रांसफर कर एक साथ सुनवाई करने का निर्णय लिया था।

मालूम हो कि न्यायमूर्ति अलतमस कबीर ने न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन केसाथ बहुमत के आधार पर दिए गए फैसले में कहा गया था कि ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन(संशोधित), 2010 (पार्ट-दो) और पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन संशोधित), 2010 (पार्ट-दो) को असंवैधानिक करार दिया था। फैसले में एमसीआई और डीसीआई द्वारा एनईईअी आयोजित करने संबंधित अधिसूचना को संविधान की अनुच्छेद-19(1)(जी), 25, 26(ए), 29(1) और 30(1) केविपरीत बताया गया था।

फैसले में यह भी कहा गया था कि एमसीआई को 1956 केअधिनियम के तहत एनईईटी आयोजित करने का अधिकार नहीं है। हालांकि न्यायमूर्ति अनिल आर दवे ने अलग फैसले लिखते हुए कहा था कि एमसीआई और डीसीआई को परीक्षा आयोजित करने की प्रक्रिया तय करने का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा था देश में एकल परीक्षा आयोजित होने से भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगा। 
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