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जमीन अधिग्रहण में धोखाधड़ी: 30 साल पुरानी प्रक्रिया रद्द; सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा हाईकोर्ट का फैसला?

Mon, 26 Oct 2026 08:13 PM IST
निर्मल कांत पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Mon, 26 Oct 2026 08:13 PM IST
सार

बंगलूरू में आवास योजना के नाम पर जमीन अधिग्रहण की तीन दशक से ज्यादा पुरानी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। कोर्ट को इसमें धोखाधड़ी, गंभीर अनियमितताएं और मंजूर आवास योजना की कमी मिली। आखिर इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलटा गया? पढ़िए इस रिपोर्ट में। 

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SC quashes land acquisition over fraud, lack of approved housing scheme
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बंगलूरू के नेलाकादिरानहल्ली गांव में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया रद्द कर दी। यह प्रक्रिया तीन दशक से भी पहले शुरू हुई थी। कोर्ट ने इसमें धोखाधड़ी और प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं पाईं। साथ ही, सहकारी समिति के लिए विधिवत मंजूर आवास योजना भी नहीं थी।
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न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने अपीलों को मंजूर कर लिया। पीठ ने हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला रद्द कर दिया। साथ ही, एकल न्यायाधीश के आदेश को बहाल कर दिया।
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कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति विनोद चंद्रन ने पेंसिल्वेनिया के सुप्रीम कोर्ट की एक मामले में की गई टिप्पणी का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी सरकारी प्राधिकरण असीमित शक्तियों का इस्तेमाल नहीं करता। उसके फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहते हैं।
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फैसले में कहा गया, युद्ध के लिए लोगों को अनिवार्य रूप से भर्ती करने की शक्ति के बाद, निजी जमीन लेने की शक्ति देश के कानून के तहत सरकार को दी गई सबसे व्यापक शक्तियों में से एक है। कोर्ट ने आगे कहा, 'पेंसिल्वेनिया के सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारत में भी समान रूप से लागू होती है। निजी जमीन को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए केवल कानून के अधिकार के तहत ही लिया जा सकता है। इसके लिए उचित मुआवजा दिया जाना भी जरूरी है'।

अदालत ने कहा, 'कानून के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल केवल सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। उचित मुआवजा पाने का अधिकार इससे जुड़ा हुआ अधिकार है। लेकिन केवल मुआवजा देना अपने आप में जमीन अधिग्रहण को सही नहीं ठहराता'।

फैसले में कहा गया, मुआवजा कितना भी उचित क्यों न हो, अगर जमीन अधिग्रहण के लिए कानून के तहत अधिकार नहीं है या सार्वजनिक उद्देश्य नहीं है, तो जमीन अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। इस मामले में अपीलकर्ताओं का कहना है कि अधिग्रहण के लिए कानूनी अधिकार नहीं था, कोई सार्वजनिक उद्देश्य नहीं था और धोखाधड़ी के कारण अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया दूषित हो गई थी।

याचिका में क्या कहा गया था?
यह फैसला एन अरसप्पा की अपील पर आया। उनकी याचिका में जमीन अधिग्रहण को चुनौती दी गई थी। इसके लिए कानूनी अधिकार की कमी, सार्वजनिक उद्देश्य का अभाव और धोखाधड़ी सहित कई आधार दिए गए थे।

याचिका में कहा गया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत सहकारी समितियों की ओर से चलाई जाने वाली आवास योजनाओं को सार्वजनिक उद्देश्य माना गया था। यह प्रावधान भूमि अधिग्रहण (संशोधन) अधिनियम, 1984 के बाद लागू हुआ था। यह संशोधन 24 सितंबर, 1984 से प्रभावी हुआ था।

हालांकि, याचिका में कहा गया कि वैध अधिग्रहण के लिए आवास योजना का सही तरीके से तैयार होना जरूरी था। इसमें जमीन के उपयोग की रूपरेखा यानी लेआउट प्लान या ब्लूप्रिंट शामिल होना चाहिए था। इसे सक्षम सरकारी प्राधिकरण से मंजूरी मिलना भी जरूरी था।

कोर्ट ने इस मामले में क्या पाया?
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि संबंधित संशोधन लागू होने से पहले ही एक तीसरे पक्ष के साथ समझौता कर लिया गया था। कोर्ट के अनुसार, इससे इस व्यवस्था में धोखाधड़ी की प्रकृति सामने आई। इस समझौते में आवास योजना लागू करने के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत जमीन हासिल करने में मदद देने की बात थी।

फैसले में कहा गया कि अधिग्रहण करने वाले अधिकारियों ने विधिवत तैयार और मंजूर आवास योजना के बिना ही प्रक्रिया आगे बढ़ा दी थी। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि अंतिम रूप से तैयार लेआउट प्लान और ब्लूप्रिंट मौजूद नहीं थे। संबंधित समितियों और सरकारी अधिकारियों ने भी मामले पर पर्याप्त विचार नहीं किया। इन कमियों के कारण अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हुई। फैसले में मुआवजे से जुड़े प्रबंधन में भी गंभीर खामियां पाई गईं।


हाईकोर्ट के फैसले को क्यों गलत बताया?
कोर्ट ने कहा कि सरकारी दस्तावेजों में दर्ज टिप्पणियों से पता चला कि समिति ने जमीन मालिकों को मुआवजा देने के आदेशों को पूरा करने के लिए जरूरी राशि जमा नहीं की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के विस्तृत निष्कर्षों को पलटकर गलती की। खंडपीठ ने इसके लिए पहले से तय न्यायिक फैसले के कारण दोबारा सुनवाई पर रोक और अदालत आने में देरी जैसे आधारों पर भरोसा किया। लेकिन उसने धोखाधड़ी के गंभीर आरोपों की पर्याप्त जांच नहीं की।

अदालत ने कहा, धोखाधड़ी और अनुचित प्रभाव से जुड़े दोष सामने आने के बाद, केवल प्रक्रियागत आपत्तियों के आधार पर जमीन अधिग्रहण को सही नहीं ठहराया जा सकता। इसने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी इसी तरह की सहकारी समितियों और मिलते-जुलते आरोपों वाले मामलों में फैसले दे चुका है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ का फैसला रद्द कर दिया और एकल न्यायाधीश के आदेश को बहाल कर दिया। हालांकि, काफी समय बीत जाने को देखते हुए कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश हटा दिया।
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