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किसी भी करवट बैठ सकता है उत्तराखंड का सियासी ऊंट

Sat, 23 Apr 2016 08:34 AM IST
हिमांशु मिश्र/ अमर उजाला, दिल्ली
हिमांशु मिश्र/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 23 Apr 2016 08:34 AM IST
सार

  • सारा कुछ बागी विधायकों के भविष्य पर निर्भर
  • सुनवाई लंबी खिंची तो मोदी सरकार को करना होगा संसद का सामना

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SC order on Uttrakhand gives tension to Cong-BJP
हरीश रावत को 27 अप्रैल का इंतजार - फोटो : ANI

विस्तार

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन हटाए जाने के नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले पर 27 अप्रैल तक सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई रोक ने भाजपा और कांग्रेस की बेचैनी बढ़ा दी है। दोनों ही दलों का सारा दारोमदार 9 बागी विधायकों के भविष्य पर टिका है।

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अगर इन विधायकों की सदस्यता बहाल हुई तो सियासी बाजी भाजपा जीतेगी। इसके उलट फैसला आने पर रावत सरकार की वापसी तय हो जाएगी। हालांकि भाजपा के सामने एक अन्य परेशानी भी है।
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अगर सुप्रीम कोर्ट ने नैनीताल हाईकोर्ट की तर्ज पर तत्काल फैसला करने के बदले सुनवाई के लिए लंबा वक्त लिया तो इससे मोदी सरकार और भाजपा की परेशानी बढ़ जाएगी। ऐसी स्थिति में मोदी सरकार को सोमवार से शुरू हो रहे संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में राष्ट्रपति शासन पर मंजूरी हासिल करना होगा। चूंकि राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है। ऐसे में राज्य में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को मोदी सरकार को वापस लेना पड़ेगा।
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उत्तराखंड में जारी सियासी संकट का ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है। यही कारण है कि भाजपा खेमे में जहां 27 अप्रैल तक राष्ट्रपति शासन जारी रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद भाजपा कैंप में बेचैनी जारी है। इस फैसले से नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले के बाद जश्न मना रही कांग्रेस खेमे में भी समान रूप से बेचैनी है। दोनों ही दल सांस रोक कर बागी विधायकों के संदर्भ मे आने वाले फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट की राहत को अभी फौरी ही माना जाएगा। क्योंकि राष्ट्रपति शासन 27 तक जारी रखने के अलावा इसमें पार्टी के लिए राहत की फिलहाल कोई बात नहीं है। मुख्य सवाल बागी सदस्यों की सदस्यता का है, जिस पर अभी फैसला आना है।


भाजपा का कहना है कि विनियोग बिल पेश किए जाने के दौरान ही रावत सरकार गिर गई थी। ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष विधायकों के भविष्य पर कैसे फैसला कर सकते हैं। कांग्रेस का कहना है कि यह स्पीकर का विशेषाधिकार है। सभी 9 बागी विधायक भाजपा के साथ सार्वजनिक तौर पर खड़े हुए। ऐसे में इनके खिलाफ दल विरोधी कानून का मामला बनता है।

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