SC: शीर्ष अदालत ने लंपी रोग को रोकने के लिए उठाए गए कदमों पर जताया संतोष; चुनाव आयोग की शक्ति पर कही ये बात
Supreme Court: सर्वोच्च न्यायालय ने लंपी त्वचा रोग की रोकथाम के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर संतोष जताया और इससे जुड़े मुद्दों को उठाने वाली दो याचिकाओं पर कार्यवाही बंद कर दी।
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उच्चतम न्यायालय ने मवेशियों में गांठदार (लंपी) त्वचा रोग से जुड़े मुद्दों को उठाने वाली दो अलग-अलग याचिकाओं पर सोमवार को कार्यवाही बंद कर दी। शीर्ष अदालत ने गायों और अन्य जानवरों के टीकाकरण और बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए राज्य सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न मुद्दों का भी जिक्र किया।
लंपी त्वचा रोग एक वायरल संक्रमण है जो मवेशियों को प्रभावित करता है। इसके शुरुआती लक्षणं में पशुओं को बुखार हो जाना, त्वचा पर गांठ पड़ जाना शामिल है। इस रोग से मवेशियों की जान भी जा सकती है। यह रोग मच्छरों, मक्खियों, जूं और ततैयों के मवेशियों के साथ सीधे संपर्क में आने और दूषित भोजन-पानी के जरिए फैलता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदमों पर संतोष जताया और कहा कि इन कार्यवाहियों को फिलहाल बंद किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि संबंधित मुद्दों के समाधान के लिए जरूरत पड़ने पर याचिकाकर्ताओं के पास केंद्र या राज्य सरकारों से संपर्क करने का विकल्प खुला है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने कहा कि राज्यों द्वारा उठाए गए कदम मोटे तौर पर संक्रमित गायों के समय पर उपचार, त्वचा रोग वायरस के प्रसार को रोकने, गायों और अन्य जानवरों के टीकाकरण और मूत्रालय क्षेत्रों के कीटाणुशोधन के संबंध में हैं।
पीठ ने पशुओं के न्यूनतम परिवहन और अन्य राज्यों से आने वाले पशुओं की स्वास्थ्य जांच, जांच प्रयोगशालाओं की स्थापना और नैदानिक नमूनों को सुरक्षित करने में पर्याप्त वृद्धि, केंद्र द्वारा जारी दिशा-निर्देशों,नीति परिपत्रों को प्रभावी बनाने के लिए पशु कल्याण बोर्डों या समितियों के गठन जैसे कदमों का भी जिक्र किया।
बीस नवंबर के आदेश में अदालत ने कहा, 'हम उठाए गए कदमों से संतुष्ट हैं। इन कार्यवाहियों को अभी बंद किया जा सकता है। जबकि, याचिकाकर्ताओं के लिए यह विकल्प खुला छोड़ा जाता है कि वे किसी भी संबंधित मुद्दे को हल करने के लिए जब भी जरूरी हो, केंद्र व राज्य सरकारों से संपर्क करें।'
शर्तों के उल्लंघन के लिए चुनाव आयोग के पास राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द करने की होनी चाहिए शक्ति
सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को बताया कि आयोग के पास पंजीकरण की अनिवार्य शर्तों के उल्लंघन और कानूनों के उल्लंघन के मामले में किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने की शक्ति होनी चाहिए। याचिकाकर्ता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने मंगलवार को अपनी याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई से पहले चुनाव आयोग को और अधिक दंडात्मक शक्तियां देने की मांग करते हुए ताजा लिखित दलीलें दायर की हैं।
सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ उपाध्याय की याचिका समेत याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इसमें आरोप लगाया कि राजनीतिक दलों की ओर से चुनाव पूर्व मुफ्त उपहार देने का वादा एक भ्रष्ट आचरण है। प्रतिनिधित्व के तहत ‘रिश्वत’ के बराबर है। याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग को इस प्रथा से प्रभावी ढंग से निपटने का अधिकार दिया जाना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया और अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर लिखित दलीलों में कहा गया है, भारत का चुनाव आयोग उपरोक्त अनिवार्य शर्तों और/या ऐसी अन्य शर्तों को पूरा करने में विफल रहने पर एक राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने का हकदार होगा। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का अनुपालन करने के बाद निर्धारित कर सकता है। चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों के पंजीकरण को जारी रखने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया जा सकता है। शीर्ष अदालत मंगलवार को इस मामले में सुनवाई करेगी।