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SC: दलबदल कानून में अयोग्य सांसदों को उपचुनाव लड़ने से रोकने की मांग, EC ने हलफनामे में केंद्र पर कही यह बात

Sat, 01 Apr 2023 08:58 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sat, 01 Apr 2023 08:58 PM IST
सार

आयोग ने कहा है कि इस मामले में शामिल मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 191(1)(E) की व्याख्या से संबंधित है। यह उन मामलों से संबंधित है जिनका अनुच्छेद 32 के तहत आयोग के कार्यक्षेत्र के संदर्भ में चुनाव के संचालन से कोई संबंध नहीं है। केंद्र सरकार इस मामले में की गई प्रार्थनाओं पर फैसला लेने के लिए उपयुक्त है।

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SC: ECI filed affidavit on petition seeking ban on by-elections of MPs disqualified under anti-defection law
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा कि दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य सांसदों को एक ही कार्यकाल में उपचुनाव लड़ने से रोकने के निर्देश की मांग वाली याचिका में उसकी कोई भूमिका नहीं है। इस मामले पर केंद्र सरकार ही निर्णय ले सकती है।

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चुनाव आयोग ने कहा कि कांग्रेस नेता जया ठाकुर की ओर से दायर याचिका में की गई अपील पर फैसले के लिए केंद्र उपयुक्त पार्टी है। आयोग ने कहा कि याचिका में शामिल मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 191(1)(ई) से संबंधित है। यह उन मामलों से संबंधित है, जिनका अनुच्छेद 32 के तहत आयोग के कार्यक्षेत्र के संदर्भ में चुनाव के संचालन से कोई संबंध नहीं है और केंद्र सरकार इस मामले में की गई प्रार्थनाओं पर फैसला लेने के लिए उपयुक्त है।
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कांग्रेस नेता ने दिया था यह तर्क
गौरतलब है कि कांग्रेस नेता ठाकुर ने अपनी याचिका में कहा था कि राजनीतिक दलों की ओर से राजनीतिक दोष के आधार पर अयोग्यता पर संविधान की 10वीं अनुसूची के प्रावधान को निरर्थक और बेमानी बनाने के लिए अखिल भारतीय प्रयास किया गया है। याचिका में कहा गया कि 10वीं अनुसूची के तहत सदन का सदस्य एक बार अयोग्य हो जाता है तो उसे उस अवधि के दौरान फिर से चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती है जिसके लिए वह निर्वाचित हुआ था। क्योंकि अनुच्छेद 172 उसमें उल्लिखित परिस्थितियों को छोड़कर सदन के पांच वर्षों को एक सदन की सदस्यता की अवधि के साथ समाप्त करता है। ठाकुर ने अपनी दलील में कहा कि यह लोकतंत्र में दलगत राजनीति के महत्व और संविधान के तहत अनिवार्य सुशासन की सुविधा के लिए सरकार के भीतर स्थिरता की आवश्यकता से संबंधित है।
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इसे भी पढ़ें- Supreme Court: लंबित मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, कहा- समय पर सुनवाई पूरी नहीं होना लोगों के साथ अन्याय

अदालतें सुनिश्चित करें मुकदमों का तेजी से हो सके निपटारा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जेलों में अत्यधिक भीड़भाड़ और कैदियों के रहने की भयावह स्थिति को ध्यान में रखते हुए अदालतें सुनिश्चित करें कि मुकदमे तेजी से निपटाए जाएं। खासतौर से वे मामले जहां विशेष कानून के कड़े प्रावधान लागू होते हों। शीर्ष अदालत ने कहा, समय पर मुकदमे समाप्त नहीं होने की सूरत में व्यक्ति पर अथाह अन्याय होता है।

जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट के तहत आरोपी व्यक्ति को जमानत पर रिहा करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा, जिन मामलों में अभियुक्त कमजोर आर्थिक तबके से होता है वहां कारावास का और भी हानिकारक प्रभाव होता है। आजीविका का तत्काल नुकसान, कई मामलों में परिवारों का बिखराव और समाज से अलगाव आदि इसके प्रमुख प्रभाव हैं। ऐसे में अदालतों को इन पहलुओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए व मुकदमे तेजी से निपटाए जाने चाहिए।


कानूनी अधिकार दिए बगैर किसी को कैद में नहीं रखा जाना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, भले ही सरकार का काम अपराध रोकना और सुरक्षा सुनिश्चित करना है लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता को हाशिये पर नहीं रख सकते। कानूनी अधिकार दिए बगैर किसी को कैद में नहीं रखा जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी रिमांड की अवधि को डिफॉल्ट जमानत के दावे में जोड़ने संबंधी याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

जस्टिस केएम जोसफ की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा, सीआरपीसी की धारा 167 के तहत निर्धारित 60/90-दिन की रिमांड अवधि की गणना उस तारीख से की जानी चाहिए जब मजिस्ट्रेट रिमांड को अधिकृत करता है। यह अदालत सचेत है कि कानूनी अधिकार के बिना किसी को भी कारावास नहीं भुगतना चाहिए। पीठ ने कहा, अगर सरकार निर्धारित 60/90 दिन की अवधि में आरोपपत्र या रिमांड के लिए पूरक अनुरोध दाखिल नहीं कर पाती है तो उसे व्यक्ति के अधिकारों और उन अधिकारों पर प्रतिबंध के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है।

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