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Supreme Court: कृष्ण जन्मभूमि के पास अवैध निर्माण हटाने से जुड़ी याचिका का निपटारा, कोर्ट ने दी 'सुप्रीम' सलाह

Mon, 28 Aug 2023 05:07 PM IST
देव कश्यप पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Mon, 28 Aug 2023 05:07 PM IST
सार

न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, इस याचिका में राहत के लिए जो दावा किया गया है, हमारी राय है कि एक मुकदमे के तहत इसकी बेहतर जांच की जा सकती है। चूंकि कार्यवाही सिविल अदालत में लंबित है इसलिए हम इस रिट याचिका का निपटान करते हैं और याचिकाकर्ता को सिविल अदालत के समक्ष राहत के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता दी जाती है।

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SC disposes of plea on demolition drive to clear alleged illegal constructions near Krishna Janmabhoomi
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में कृष्ण जन्मभूमि के पास कथित रूप से बने अवैध निर्माण को हटाने के लिए इसे ध्वस्त करने के अभियान से संबंधित एक याचिका का निपटारा कर दिया और याचिकाकर्ता को सिविल कोर्ट के समक्ष राहत मांगने की स्वतंत्रता दी। यह देखते हुए कि भूमि के कब्जेदारों या निवासियों द्वारा दायर मुकदमे क्षेत्राधिकार वाली सिविल अदालत में लंबित हैं, शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता से वहां राहत के लिए आवेदन करने को कहा।

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न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, इस याचिका में राहत के लिए जो दावा किया गया है, हमारी राय है कि एक मुकदमे के तहत इसकी बेहतर जांच की जा सकती है। चूंकि कार्यवाही सिविल अदालत में लंबित है इसलिए हम इस रिट याचिका का निपटान करते हैं और याचिकाकर्ता को सिविल अदालत के समक्ष राहत के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता दी जाती है।
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पीठ ने यथास्थिति बढ़ाने से भी इनकार कर दिया, जो उसने 16 अगस्त को दी थी। पिछली बार शीर्ष अदालत ने कथित अवैध निर्माणों की भूमि को खाली करने के लिए रेलवे द्वारा किए जा रहे विध्वंस अभियान को 10 दिनों के लिए रोक दिया था। पीठ में न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी भी शामिल थे। पीठ मथुरा निवासी याकूब शाह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
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पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि जब सिविल कोर्ट में मुकदमे लंबित हैं तो संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत दायर याचिका में क्या राहत दी जा सकती है। संविधान का अनुच्छेद-32 भारतीय नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए सीधे शीर्ष अदालत से संपर्क करने का अधिकार देता है।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि अधिकारियों ने विध्वंस की कार्रवाई उस दिन की जब उत्तर प्रदेश में अदालतें बंद थीं और 100 घर पहले ही ध्वस्त किए जा चुके हैं। पीठ ने कहा, सिविल अदालत के समक्ष आपके पास पूरा समाधान है। साथ ही यह भी कहा कि वह समानांतर कार्यवाही नहीं चला सकती।

जब याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से यथास्थिति बढ़ाने का अनुरोध किया, तो पीठ ने कहा, हमने आपको 10 दिनों की सुरक्षा दी थी, आपने (सिविल) अदालत का रुख क्यों नहीं किया? आदेश में कहा गया, हम यथास्थिति को आगे नहीं बढ़ा रहे हैं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने मामले की योग्यता पर कोई टिप्पणी नहीं की है और सभी बिंदुओं को सिविल अदालत द्वारा निर्धारित करने के लिए खुला छोड़ दिया गया है।

16 अगस्त को मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था, आज से 10 दिनों की अवधि के लिए विषय परिसर के संबंध में यथास्थिति का आदेश दिया जाए। एक सप्ताह के बाद इसे सूचीबद्ध करें।

25 अगस्त को मामला फिर से शीर्ष अदालत के सामने सुनवाई के लिए आया, जिसने अंतरिम आदेश को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया।

पीठ ने कहा था, मामले को 28 अगस्त के लिए सूचीबद्ध करें। इस बीच, याचिकाकर्ता द्वारा प्रत्युत्तर, यदि कोई हो, दाखिल किया जाए। अंतरिम आदेश का कोई और विस्तार नहीं होगा। 16 अगस्त को याचिकाकर्ता के वकील ने शीर्ष अदालत को बताया था कि 100 घरों पर बुलडोजर चलाया गया है। उन्होंने तर्क दिया था कि 70-80 घर बचे हैं। पूरी चीज निरर्थक हो जाएगी। रेलवे ने यह अभियान उस दिन चलाया जब उत्तर प्रदेश की अदालतें बंद थीं।

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