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जेल में काटे बेगुनाही के छह साल: हत्या मामले में यूपी पुलिस की जांच पर शीर्ष कोर्ट नाराज; मुआवजे का निर्देश
Mon, 26 Oct 2026 06:44 PM IST
निर्मल कांत
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Mon, 26 Oct 2026 06:44 PM IST
सार
हत्या के मामले में एक व्यक्ति को बिना ठोस सबूत के छह साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहना पड़ा। बाद में वह बरी हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच पर नाराजगी जताते हुए राज्य सरकार को एक महीने के भीतर छह लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। शीर्ष कोर्ट ने क्या कहा? पढ़िए रिपोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हत्या के एक मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने इसे 'लापरवाही से की गई जांच' बताया। साथ ही, राज्य सरकार को एक व्यक्ति को छह लाख रुपये देने का निर्देश दिया। वह व्यक्ति विचाराधीन कैदी के रूप में छह साल तक जेल में रहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने उसे 'व्यवस्था का पीड़ित' बताया। अदालत ने कहा कि महज अटकलों और अनुमानों के आधार पर मनगढ़ंत कहानी बनाई गई। इसके कारण उस व्यक्ति के जीवन के छह साल बर्बाद हो गए।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, राज्य अपने नागरिकों की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। खासकर तब, जब किसी आपराधिक मामले में आरोपी बनाए गए व्यक्ति को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है।
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जांच और अभियोजन एजेंसियों की जिम्मेदारी क्या है?
पीठ ने कहा कि जांच और अभियोजन एजेंसियों का काम किसी भी तरह दोषसिद्धि हासिल करना भर नहीं है। पीठ ने कहा, उन्हें खुद को न्याय देने की व्यवस्था का अहम हिस्सा मानना चाहिए। उन्हें केवल पीड़ित, वास्तव में शिकायत करने वाले व्यक्ति और घायल को ही नहीं, बल्कि आरोपी को भी न्याय दिलाना सुनिश्चित करना चाहिए।
कोर्ट ने कहा, हम कई मामलों में न्याय की ऐसी विफलता देखते हैं। लेकिन कुछ मामलों में यह इतनी स्पष्ट और चौंकाने वाली होती है, जैसा कि इस मामले में है। ऐसे मामले में आरोपी को मुआवजा दिया जाना जरूरी है। वह व्यवस्था का पीड़ित है।
किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश?
शीर्ष कोर्ट का यह फैसला एक आरोपी की याचिका पर आया। उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जनवरी में दिए गए आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने उसे जमानत देने से इनकार कर दिया था। यह मामला 2019 में आगरा में दर्ज किया गया था।
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि 23 मार्च को उसने निचली अदालत को इस मामले की सुनवाई तीन महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा कि उसके निर्देश के बाद मुकदमे की सुनवाई पूरी हुई और याचिकाकर्ता बरी हो गया।
पीठ ने कहा, यह इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण है कि जांच किस तरह नहीं की जानी चाहिए। इसके परिणामस्वरूप अभियोजन ने एक व्यक्ति के जीवन और उसकी स्वतंत्रता को खतरे में डाल दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता 14 नवंबर 2019 से जेल में बंद था।
छह साल जेल में क्यों रहा व्यक्ति?
पीठ ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ सबूत नहीं होने के बावजूद उसे विचाराधीन कैदी के रूप में छह साल तक जेल में रखा गया। पीठ ने कहा, लापरवाही से की गई जांच के आधार पर अव्यवस्थित तरीके से मुकदमा चलाया गया। सौभाग्य से, आरोपी बरी हो गया। हम जांच करने और अभियोजन चलाने के तरीके की निंदा किए बिना नहीं रह सकते।
पीठ ने बताया कि निचली अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया था। शीर्ष कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने जिन चार परिस्थितियों को साबित करने का दावा किया था, उनमें से कोई भी साबित नहीं हुई। इनमें इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी शामिल थे।
ये भी पढ़ें: टीएमसी नाम और चुनाव निशान विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाई जवाब दाखिल करने की समयसीमा; अब आगे क्या होगा?
पीठ ने कहा, हमने फैसले को पढ़ने में अपना कीमती समय लगाया, ताकि राज्य को यह चेतावनी दे सकें कि जांच किस तरह की जा रही है। उत्तर प्रदेश पुलिस को अपने अधिकारियों को जांच की प्रक्रिया के बारे में प्रशिक्षित करना चाहिए।
यूपी सरकार को कब देना होगा मुआवजा?
पीठ ने निर्देश दिया कि फैसले की एक प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को भेजी जाए। कोर्ट ने कहा, इसलिए, हम राज्य सरकार को निर्देश देते हैं कि वह याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर छह लाख रुपये का भुगतान करे। हालांकि, हिरासत में बिताए गए वर्षों की तुलना में यह राशि बहुत कम है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट ने उसे 'व्यवस्था का पीड़ित' बताया। अदालत ने कहा कि महज अटकलों और अनुमानों के आधार पर मनगढ़ंत कहानी बनाई गई। इसके कारण उस व्यक्ति के जीवन के छह साल बर्बाद हो गए।
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न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा, राज्य अपने नागरिकों की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। खासकर तब, जब किसी आपराधिक मामले में आरोपी बनाए गए व्यक्ति को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है।
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जांच और अभियोजन एजेंसियों की जिम्मेदारी क्या है?
पीठ ने कहा कि जांच और अभियोजन एजेंसियों का काम किसी भी तरह दोषसिद्धि हासिल करना भर नहीं है। पीठ ने कहा, उन्हें खुद को न्याय देने की व्यवस्था का अहम हिस्सा मानना चाहिए। उन्हें केवल पीड़ित, वास्तव में शिकायत करने वाले व्यक्ति और घायल को ही नहीं, बल्कि आरोपी को भी न्याय दिलाना सुनिश्चित करना चाहिए।
कोर्ट ने कहा, हम कई मामलों में न्याय की ऐसी विफलता देखते हैं। लेकिन कुछ मामलों में यह इतनी स्पष्ट और चौंकाने वाली होती है, जैसा कि इस मामले में है। ऐसे मामले में आरोपी को मुआवजा दिया जाना जरूरी है। वह व्यवस्था का पीड़ित है।
किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश?
शीर्ष कोर्ट का यह फैसला एक आरोपी की याचिका पर आया। उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जनवरी में दिए गए आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने उसे जमानत देने से इनकार कर दिया था। यह मामला 2019 में आगरा में दर्ज किया गया था।
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि 23 मार्च को उसने निचली अदालत को इस मामले की सुनवाई तीन महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा कि उसके निर्देश के बाद मुकदमे की सुनवाई पूरी हुई और याचिकाकर्ता बरी हो गया।
पीठ ने कहा, यह इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण है कि जांच किस तरह नहीं की जानी चाहिए। इसके परिणामस्वरूप अभियोजन ने एक व्यक्ति के जीवन और उसकी स्वतंत्रता को खतरे में डाल दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता 14 नवंबर 2019 से जेल में बंद था।
छह साल जेल में क्यों रहा व्यक्ति?
पीठ ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ सबूत नहीं होने के बावजूद उसे विचाराधीन कैदी के रूप में छह साल तक जेल में रखा गया। पीठ ने कहा, लापरवाही से की गई जांच के आधार पर अव्यवस्थित तरीके से मुकदमा चलाया गया। सौभाग्य से, आरोपी बरी हो गया। हम जांच करने और अभियोजन चलाने के तरीके की निंदा किए बिना नहीं रह सकते।
पीठ ने बताया कि निचली अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया था। शीर्ष कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने जिन चार परिस्थितियों को साबित करने का दावा किया था, उनमें से कोई भी साबित नहीं हुई। इनमें इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी शामिल थे।
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पीठ ने कहा, हमने फैसले को पढ़ने में अपना कीमती समय लगाया, ताकि राज्य को यह चेतावनी दे सकें कि जांच किस तरह की जा रही है। उत्तर प्रदेश पुलिस को अपने अधिकारियों को जांच की प्रक्रिया के बारे में प्रशिक्षित करना चाहिए।
यूपी सरकार को कब देना होगा मुआवजा?
पीठ ने निर्देश दिया कि फैसले की एक प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को भेजी जाए। कोर्ट ने कहा, इसलिए, हम राज्य सरकार को निर्देश देते हैं कि वह याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर छह लाख रुपये का भुगतान करे। हालांकि, हिरासत में बिताए गए वर्षों की तुलना में यह राशि बहुत कम है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।