SC: बिहार SIR के तहत दावे-आपत्तियों की समय सीमा बढ़ाने की मांग; राम सेतु और एल्गार परिषद केस में भी आया अपडेट
सुप्रीम कोर्ट सोमवार को राष्ट्रीय जनता दल की उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है, जिसमें बिहार में मतदाता सूची के दावों और आपत्तियों के लिए 1 सितंबर की समय सीमा बढ़ाने की मांग की गई है। इसके अलावा एआईएमआईएम ने भी बिहार में मतदाता सूची के एसआईआर में दावे और आपत्तियां दर्ज करने की 30 सितंबर की समय सीमा बढ़ाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को बिहार में चुनावी सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समय सीमा बढ़ाने की मांग करने वाली राजद और एआईएमआईएम की याचिकाओं पर 1 सितंबर को सुनवाई के लिए सहमत हो गया। दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समय सीमा भी 1 सितंबर है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि वह सोमवार को राजनीतिक दलों के आवेदनों पर सुनवाई करेगी। इससे पहले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण और वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने कहा कि कई राजनीतिक दलों ने समय सीमा बढ़ाने के लिए आवेदन दायर किए हैं। एआईएमआईएम की ओर से पेश हुए अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि बड़े पैमाने पर दावे और आपत्तियां दाखिल होने के कारण समय सीमा बढ़ाने की आवश्यकता है। पाशा ने दलील दी कि 22 अगस्त के आदेश से पहले 80,000 दावे दायर किए गए थे, जबकि आदेश के बाद 95,000 दावे दायर किए गए हैं। पीठ ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि उन्होंने राहत के लिए चुनाव आयोग से संपर्क क्यों नहीं किया। भूषण ने कहा कि उन्होंने किया था, लेकिन उनके अनुरोध पर विचार नहीं किया जा रहा है।
इससे पहले 22 अगस्त को शीर्ष अदालत ने भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) को निर्देश दिया कि वह चुनावी राज्य बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभ्यास में भौतिक रूप से दावा प्रस्तुत करने के अलावा बाहर किए गए मतदाताओं को ऑनलाइन माध्यम से भी दावे प्रस्तुत करने की अनुमति दे। 14 अगस्त को शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह चुनावी राज्य बिहार में मसौदा मतदाता सूची से बाहर किए गए 65 लाख मतदाताओं का विवरण 19 अगस्त तक प्रकाशित करे, ताकि मतदाता सूची के एसआईआर में पारदर्शिता बढ़ाई जा सके और पहचान प्रमाण के लिए आधार को एक स्वीकार्य दस्तावेज के रूप में अनुमति दी जा सके।
'राम सेतु' को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पूर्व राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की उस याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा, जिसमें उन्होंने 'राम सेतु' को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने के उनके अनुरोध पर जल्द फैसला करने का निर्देश देने की मांग की है। 'राम सेतु' को एडम्स ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है। यह तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित पंबन द्वीप और श्रीलंका के उत्तर-पश्चिमी तट पर स्थित मन्नार द्वीप के बीच चूना पत्थर की एक श्रृंखला है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्वामी की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की और केंद्र को नोटिस जारी किया। मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।
स्वामी ने अपनी याचिका में इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की ओर से 19 जनवरी, 2023 को पारित आदेश का हवाला दिया है। 19 जनवरी, 2023 को केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया था कि वह 'राम सेतु' को राष्ट्रीय धरोहर स्मारक घोषित करने से संबंधित मुद्दे पर विचार कर रहा है। उस समय शीर्ष अदालत इस मुद्दे पर स्वामी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
जनवरी 2023 के अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने कहा था, 'सॉलिसिटर जनरल ने कहा है कि यह प्रक्रिया वर्तमान में संस्कृति मंत्रालय में चल रही है, लेकिन यदि याचिकाकर्ता चाहें तो दो सप्ताह के भीतर अपनी इच्छानुसार कोई भी अतिरिक्त सामग्री या संचार प्रस्तुत कर सकते हैं।' अदालत ने केंद्र से इस मुद्दे पर निर्णय लेने को कहा था और स्वामी को असंतुष्ट होने पर फिर से न्यायालय में जाने की आजादी दी थी और इस मुद्दे पर उनकी अंतरिम याचिका का निपटारा कर दिया था।
स्वामी द्वारा दायर नई याचिका में कहा गया कि आज तक न तो उन्हें और न ही शीर्ष अदालत को कोई प्रतिक्रिया या लिया गया निर्णय बताया गया है। इसमें कहा गया है कि केंद्र 'राम सेतु' को किसी भी प्रकार के दुरुपयोग, प्रदूषण या अपवित्रता से बचाने के लिए बाध्य है। याचिका में कहा गया है कि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह पुरातात्विक स्थल राम सेतु को तीर्थस्थल मानने वाले लोगों की आस्था और श्रद्धा का विषय है और ये सभी पुरातात्विक अध्ययन और वैज्ञानिक निष्कर्ष, मानव निर्मित स्मारक के श्रद्धालुओं के लिए तीर्थस्थल के रूप में अस्तित्व के समर्थन में आधारभूत साक्ष्य हैं।
सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका पर 3 सितंबर को सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में आरोपी वकील सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुनवाई 3 सितंबर को सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ को बताया गया कि 26 अगस्त को न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश ने जमानत याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जमानत याचिका पर बुधवार को सुनवाई होगी।
इससे पहले न्यायमूर्ति सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ इस याचिका पर सुनवाई करने वाली थी। 8 अगस्त को वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने अपने मुवक्किल गाडलिंग की छह साल से ज्यादा की कैद का हवाला देते हुए मुख्य न्यायाधीश गवई के समक्ष इस मामले की जल्द सुनवाई का अनुरोध किया था।
27 मार्च को शीर्ष अदालत ने इस मामले में गाडलिंग और कार्यकर्ता ज्योति जगताप की ज़मानत पर सुनवाई टाल दी थी। कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की ओर से कार्यकर्ता महेश राउत को दी गई जमानत को चुनौती देने वाली याचिका को भी स्थगित कर दिया था। राउत को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने जमानत दे दी थी, लेकिन एनआईए की ओर से इस आदेश पर रोक लगाने की मांग के बाद इस आदेश पर रोक लगा दी गई।
गाडलिंग पर माओवादियों को सहायता प्रदान करने और मामले में फरार आरोपियों सहित कई सह-आरोपियों के साथ कथित तौर पर साजिश रचने का आरोप लगाया गया था। गाडलिंग 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एल्गर परिषद सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से संबंधित एल्गर परिषद-माओवादी संबंध मामले में भी शामिल हैं। 2017 का एल्गर परिषद सम्मेलन शनिवारवाड़ा में आयोजित किया गया था, जो पुणे शहर के मध्य में स्थित 18वीं शताब्दी का एक महल-किला है।