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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता शर्तों के मसौदे पर जताई चिंता, कहा- प्रक्रिया का हो रहा दुरुपयोग
Thu, 15 May 2025 04:22 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 15 May 2025 04:22 PM IST
सार
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने व्यापारिक समझौतों में मध्यस्थता शर्तों के खराब मसौदे पर चिंता जताई और इसे न्यायिक समय की बर्बादी बताया। कोर्ट ने कहा, वकील जानबूझकर भ्रम फैलाने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जाएगी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को व्यापारिक समझौतों में मध्यस्थता शर्तों के मसौदे पर चिंता जताई और कहा कि विवाद निपटाने की इस प्रक्रिया का गलत तरीके से दुरुपयोग हो रहा है, जिससे मामले और ज्यादा जटिल और लंबे हो रहे हैं। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि इन समझौतों में जानबूझकर गुमराह करने वाली भाषा का उपयोग किया जाता है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया का समय बर्बाद होता है। अदालतों को ऐसे खराब तरीके से तैयार की गई शर्तों को शुरू में ही खारिज कर देना चाहिए।
ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दिया निर्देश, बाल यौन अपराधों से निपटने के लिए बनाएं पॉक्सो अदालतें
बेंच ने कहा, भारत में व्यापारिक समझौतों में मध्यस्थता शर्त का मसौदा बहुत खराब है। मध्यस्थता को तेज और प्रभावी विवाद समाधान का तरीका माना गया था, लेकिन कुछ मामलों में इसका विपरीत असर हो रहा है। प्रक्रिया और लंबी और पेचीदा बन गई है।' कोर्ट ने यह भी कहा कि ये खामियां प्रशासनिक लापरवाही या खराब कानूनी सलाह का नतीजा हो सकती हैं, जिसे अलग से देखा जाना चाहिए।
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कोर्ट ने जानबूझकर और लापरवाही से न्यायिक समय की बर्बादी को अत्यंत निंदनीय बताया और कहा, अब वक्त आ गया है कि मध्यस्थता शर्त को स्पष्ट, सटीक और गुमराह करने वाले शब्दों के बिना लिखा जाए। बेंच ने कहा, यह जिम्मेदारी हर वकील, सलाहकार और कानूनी पेशेवर की है कि वे इस काम को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करें।
इसने कहा कि यह केवल सलाह नहीं बल्कि चेतावनी है कि जो वकील और (कानूनी) फर्में इस तरह की चालाकी भरी भाषा का उपयोग करेगी, उन पर सख्त कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे शब्दों की बाजीगरी से वकीलों को कोई पेशेवर सम्मान नहीं मिलेगा।
ये भी पढ़ें: बिहार के पूर्व मंत्री की हत्या मामले में पूर्व विधायक को झटका, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की पुनर्विचार याचिका
शीर्ष कोर्ट की ये टिप्पणियां दिल्ली हाई कोर्ट के उन फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आईं, जो दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) और कुछ निजी ठेकेदारों के बीच समझौतों से जुड़ी थीं। ये समझौते पार्किंग और वाणिज्यिक (कॉमर्शियल) कॉम्पलैक्स के निर्माण के लिए किए गए थे।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी मामले में पहले से ही दुर्भावना दिखाई दे रही हो, तो ऐसे मामलों को अदालत में आने ही नहीं देना चाहिए। अदालतों को चाहिए कि वे खुद ही ऐसे मामलों में कार्रवाई करें, जहां कानूनी फर्में या वकील जानबूझकर भ्रामक मध्यस्थता शर्त बनाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भविष्य में ऐसे गैर-जिम्मेदार कृत्यों के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाएगी और कड़ी सजा दी जाएगी।
संबंधित वीडियो-
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बेंच ने कहा, भारत में व्यापारिक समझौतों में मध्यस्थता शर्त का मसौदा बहुत खराब है। मध्यस्थता को तेज और प्रभावी विवाद समाधान का तरीका माना गया था, लेकिन कुछ मामलों में इसका विपरीत असर हो रहा है। प्रक्रिया और लंबी और पेचीदा बन गई है।' कोर्ट ने यह भी कहा कि ये खामियां प्रशासनिक लापरवाही या खराब कानूनी सलाह का नतीजा हो सकती हैं, जिसे अलग से देखा जाना चाहिए।
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कोर्ट ने जानबूझकर और लापरवाही से न्यायिक समय की बर्बादी को अत्यंत निंदनीय बताया और कहा, अब वक्त आ गया है कि मध्यस्थता शर्त को स्पष्ट, सटीक और गुमराह करने वाले शब्दों के बिना लिखा जाए। बेंच ने कहा, यह जिम्मेदारी हर वकील, सलाहकार और कानूनी पेशेवर की है कि वे इस काम को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करें।
इसने कहा कि यह केवल सलाह नहीं बल्कि चेतावनी है कि जो वकील और (कानूनी) फर्में इस तरह की चालाकी भरी भाषा का उपयोग करेगी, उन पर सख्त कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे शब्दों की बाजीगरी से वकीलों को कोई पेशेवर सम्मान नहीं मिलेगा।
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कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी मामले में पहले से ही दुर्भावना दिखाई दे रही हो, तो ऐसे मामलों को अदालत में आने ही नहीं देना चाहिए। अदालतों को चाहिए कि वे खुद ही ऐसे मामलों में कार्रवाई करें, जहां कानूनी फर्में या वकील जानबूझकर भ्रामक मध्यस्थता शर्त बनाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भविष्य में ऐसे गैर-जिम्मेदार कृत्यों के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाएगी और कड़ी सजा दी जाएगी।
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