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बदलाव: घर चलाने वाली महिलाओं को रोजगार में 4.4% अधिक मौके, परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा है श्रम बाजार
Mon, 11 May 2026 07:17 AM IST
राकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Mon, 11 May 2026 07:17 AM IST
सार
एसबीआई रिसर्च के ताजा विश्लेषण के अनुसार, भारत का महिला श्रम बाजार एक ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। रिपोर्ट बताती है कि जो महिलाएं अपने परिवार की मुखिया हैं, उनके नियमित वेतन वाले रोजगार पाने की संभावना अन्य महिलाओं की तुलना में 4.4% अधिक है। उच्च शिक्षा इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभा रही है। हायर सेकेंडरी से ऊपर की शिक्षा प्राप्त महिलाओं में नियमित रोजगार की संभावना बढ़कर 0.44% हो जाती है। यह बदलाव शहरी क्षेत्रों में अधिक स्पष्ट है, जहां महिला मुखिया होने का संबंध नियमित नौकरियों में 10% की वृद्धि से है।
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विधायक और ग्रामीण महिलाएँ
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
भारत का महिला श्रम बाजार एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। शिक्षा, घर चलाने के मामलों में बढ़ती भूमिका और सामाजिक गतिशीलता की वजह से नियमित वेतन वाले रोजगार में महिलाओं की भूमिका बढ़ रही है। एसबीआई रिसर्च की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि जो महिलाएं अपने परिवार की मुखिया होती हैं, उनके नियमित वेतन वाले रोजगार में होने की संभावना अन्य महिलाओं के मुकाबले 4.4 फीसदी अधिक होती हैं, जबकि अनौपचारिक मजदूरी में 4.2% कम।
महिलाओं की रोजगार स्थिति पर एसबीआई रिसर्च का यह विश्लेषण पहली बार भारत के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे के यूनिट-लेवल डाटा के आधार पर किया गया है। इसके मुताबिक, परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभालने वाली महिलाएं अधिक स्थिर और सुरक्षित रोजगार की ओर बढ़ रही हैं। हालांकि, स्वरोजगार के मोर्च पर यह बदलाव कम है। यह पैटर्न शहरी इलाकों में ज्यादा स्पष्ट तौर पर दिखता है, जहां महिलाओं के घर की मुखिया होने का संबंध नियमित वेतन वाले रोजगार में 10 फीसदी की बढ़ोतरी और स्वरोजगार में 8% की गिरावट से है।
शिक्षा से ही बदलेगी असली तस्वीर
शिक्षा सबसे पहले महिलाओं को अनौपचारिक श्रम से बाहर निकालती है और एक निश्चित स्तर के बाद उन्हें नियमित रोजगार में शामिल करती है। जो महिलाएं पढ़ी-लिखी नहीं हैं, उनके अनौपचारिक मजदूरी में शामिल होने की संभावना 0.21% है। जिन महिलाओं ने मिडिल से सेकेंडरी स्तर तक की शिक्षा हासिल की है, उनमें यह घटकर 0.12% रह जाती है। निर्णायक बदलाव हायर सेकेंडरी और उससे ऊपर के स्तर पर आता है, जहां नियमित वेतन वाले रोजगार में महिलाओं के शामिल होने की संभावना बढ़कर 0.44% हो जाती है और अनौपचारिक मजदूरी में जाने की स्थिति घटकर 0.03% रह जाती है। स्वरोजगार का चलन कम हो जाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि महिलाओं के लिए स्थायी व वेतन वाले रोजगार पैदा करने के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच का विस्तार करना बेहद जरूरी है।
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यह भी पढ़ें: MP Crime News:नरसिंहपुर कांड पर पुलिस का खुलासा पूर्व प्रेमी संग मिलकर कर दी नए प्रेमी की हत्या
मजदूरी में होने की संभावनाएं 5% कम
ग्रामीण इलाकों में अगर महिलाएं घर की जिम्मेदारी संभालती हैं, तो उनके अनौपचारिक मजदूरी में होने की संभावनाएं पांच फीसदी कम होती है, जबकि नियमित वेतन वाले रोजगार और स्वरोजगार दोनों में थोड़ा सुधार होता है। इन नतीजों से पता चलता है कि घरों के भीतर ज्यादा अधिकार और मोलभाव की ताकत होने से रोजगार के ज्यादा स्थिर नतीजे मिल रहे हैं। हालांकि, इसका स्वरूप स्थानीय मजदूर बाजारों के हिसाब से अलग-अलग होता है। परिवहन क्षेत्र में काम पाने में महिलाएं पुरुषों से आगे : परिवहन क्षेत्र में नियमित वेतन वाला काम हासिल करने में महिलाएं पुरुषों से आगे हैं। हालांकि, खनन और उद्योग जैसे क्षेत्रों में नियमित वेतन वाले रोजगार में महिलाओं की हिस्सेदारी पुरुषों के मुकाबले कम रहती है।
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महिलाओं की रोजगार स्थिति पर एसबीआई रिसर्च का यह विश्लेषण पहली बार भारत के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे के यूनिट-लेवल डाटा के आधार पर किया गया है। इसके मुताबिक, परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभालने वाली महिलाएं अधिक स्थिर और सुरक्षित रोजगार की ओर बढ़ रही हैं। हालांकि, स्वरोजगार के मोर्च पर यह बदलाव कम है। यह पैटर्न शहरी इलाकों में ज्यादा स्पष्ट तौर पर दिखता है, जहां महिलाओं के घर की मुखिया होने का संबंध नियमित वेतन वाले रोजगार में 10 फीसदी की बढ़ोतरी और स्वरोजगार में 8% की गिरावट से है।
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शिक्षा से ही बदलेगी असली तस्वीर
शिक्षा सबसे पहले महिलाओं को अनौपचारिक श्रम से बाहर निकालती है और एक निश्चित स्तर के बाद उन्हें नियमित रोजगार में शामिल करती है। जो महिलाएं पढ़ी-लिखी नहीं हैं, उनके अनौपचारिक मजदूरी में शामिल होने की संभावना 0.21% है। जिन महिलाओं ने मिडिल से सेकेंडरी स्तर तक की शिक्षा हासिल की है, उनमें यह घटकर 0.12% रह जाती है। निर्णायक बदलाव हायर सेकेंडरी और उससे ऊपर के स्तर पर आता है, जहां नियमित वेतन वाले रोजगार में महिलाओं के शामिल होने की संभावना बढ़कर 0.44% हो जाती है और अनौपचारिक मजदूरी में जाने की स्थिति घटकर 0.03% रह जाती है। स्वरोजगार का चलन कम हो जाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि महिलाओं के लिए स्थायी व वेतन वाले रोजगार पैदा करने के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच का विस्तार करना बेहद जरूरी है।
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मजदूरी में होने की संभावनाएं 5% कम
ग्रामीण इलाकों में अगर महिलाएं घर की जिम्मेदारी संभालती हैं, तो उनके अनौपचारिक मजदूरी में होने की संभावनाएं पांच फीसदी कम होती है, जबकि नियमित वेतन वाले रोजगार और स्वरोजगार दोनों में थोड़ा सुधार होता है। इन नतीजों से पता चलता है कि घरों के भीतर ज्यादा अधिकार और मोलभाव की ताकत होने से रोजगार के ज्यादा स्थिर नतीजे मिल रहे हैं। हालांकि, इसका स्वरूप स्थानीय मजदूर बाजारों के हिसाब से अलग-अलग होता है। परिवहन क्षेत्र में काम पाने में महिलाएं पुरुषों से आगे : परिवहन क्षेत्र में नियमित वेतन वाला काम हासिल करने में महिलाएं पुरुषों से आगे हैं। हालांकि, खनन और उद्योग जैसे क्षेत्रों में नियमित वेतन वाले रोजगार में महिलाओं की हिस्सेदारी पुरुषों के मुकाबले कम रहती है।
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