मलिक की खोज है पाकिस्तान के खिलाफ भारत का वरुणास्त्र
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भारत सरकार नदियों के पानी के जिस वरुणास्त्र का इस्तेमाल करके पाकिस्तान को दबाव में ले रही, उसे मूर्त रूप देने और उसकी रणनीति बनाने में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक की अहम भूमिका है। उनके सक्रिय प्रयासों से जम्मू कश्मीर के शाहपुर कंडी और उझ में दशकों से लटकी पड़ी जल परियोजनाओं की अड़चने दूर हो गईं और अब जल्दी ही इनका निर्माण शुरु हो जाएगा।
इन जल परियोजनाओं में ही रावी और व्यास नदियों के अतिरिक्त पानी को पाकिस्तान जाने से रोककर उनका उपयोग जम्मू कश्मीर, पंजाब और राजस्थान के किसानों को दिया जाएगा। इसके लिए पंजाब और जम्मू-कश्मीर के बीच जल समझौते के लिए मलिक ने अपने व्यक्तिगत रिश्तों का इस्तेमाल करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को राजी करके शाहपुर कंडी जल परियोजना समझौते को अंजाम दिया। इसके बाद ही भारत ने दृढ़तापूर्वक पाकिस्तान के खिलाफ इस वरुणास्त्र के कारगर प्रयोग की घोषणा की।
गौरतलब है कि केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने यह एलान किया कि राज्य से निकलने वाली नदियों रावी, व्यास, सतलज और झेलम के अतिरिक्त पानी को पाकिस्तान नहीं जाने दिया जाएगा। पठानकोट और उड़ी में आतंकवादी हमलों के बाद भी केंद्र सरकार ने इस तरह की घोषणा की थी। लेकिन इन नदियों के अतिरिक्त जल को भारत में कैसे रोका जाए और कैसे उसे अन्य राज्यों में बांटा जाए, इसका कोई मुकम्मल इंतजाम भारत के पास नहीं था। क्योंकि जम्मू कश्मीर के शाहपुर कंडी और उझ में दशकों से प्रस्तावित जल परियोजनाओं के निर्माण का मसला इसलिए लटका हुआ था, क्योंकि नदियों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर जम्मू कश्मीर, पंजाब और राजस्थान में कोई सहमति नहीं बन पा रही थी।
लेकिन चालीस साल से रुकी इन जल परियोजनाओं पर सहमति बनने और मंजूरी मिलने के बाद अब न सिर्फ भारत, पाकिस्तान को सबक सिखा सकेगा, बल्कि जम्मू कश्मीर, पंजाब और राजस्थान के किसानों को भी सिंचाई के लिए पानी की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। शाहपुर कंडी का नाम ही इसलिए पड़ा कि स्थानीय भाषा में कंडी का मतलब ऊसर बंजर होता है और पानी के अभाव में इस इलाके की हजारों एकड़ जमीन ऊसर बंजर है।लेकिन अब शाहपुर कंडी का यह अभिशाप जल्दी ही खत्म हो जाएगा।
जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक राज्य में विधानसभा भंग होने के बाद से ही लगातार फ्रंट फुट पर जाकर खेल रहे हैं। उनकी सक्रियता यह साबित कर रही है कि इस संवेदनशील राज्य में पिछले कई दशकों से जितनी भी सरकारें आईं या जो भी नौकरशाह राज्यपाल रहे, उन्होंने तमाम बुनियादी समस्याओं को हल करने की दिशा में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। जिसकी वजह से अलगाववाद और आतंकवाद को जमकर हवा मिली।
निर्वाचित सरकारों की दिलचस्पी अलगाववाद की आड़ में अपनी सियासी रोटियां सेंकने और केंद्र से ज्यादा से ज्यादा धन लेने में रही तो नौकरशाह राज्यपालों ने राज्य को सिर्फ एक सुरक्षा खतरे के रूप में देखकर इसे पूरी तरह सुरक्षा बलों और फौज के आसरे छोड़ दिया। लेकिन एक राजनीतिक सोच वाले राज्यपाल के रूप में मलिक ने न सिर्फ राजभवन के दरवाजे हर आम खास के लिए खोल दिए, बल्कि कश्मीर में पहले मल्टीप्लेक्स की शुरुआत, खेल अकादमियों को प्रोत्साहन, राज्य के बाहर पढ़ने वाले कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा और समस्याओं के समाधान के लिए देश के 11 विश्वविद्यालयों में संपर्क अधिकारियों की नियुक्ति जैसे कई काम भी किए।