पुण्यतिथि: राष्ट्रीय एकता व अखंडता के अग्रदूत थे सरदार, कश्मीर समस्या को लगभग कर दिया था हल
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भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की आज यानी 15 दिसंबर को 69वीं पुण्यतिथि है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी। पीएम मोदी ने ट्वीट कर कहा कि देश की सेवा में सरदार पटेल का अहम योगदान दिया है। प्रधानमंत्री ने कहा, राष्ट्र के लिए जो सेवा उन्होंने की है, हम उससे निरंतर प्रेरण लेते रहेंगे।
देश के गृह मंत्री अमित शाह ने भी सरदार पटेल को ट्वीट कर श्रद्धांजलि दी। उन्होंने ट्वीट कर लिखा कि अपने दृढ़ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से एक संगठित व अटूट भारत की कल्पना को चरितार्थ करने वाले सरदार पटेल हम सभी के लिए प्रेरणा के अद्वितीय स्त्रोत हैं। वह सच्चे अर्थों में भारत रत्न थे, जिन्होंने न सिर्फ आजादी में अहम भूमिका निभाई बल्कि उसके बाद देश को एक करने का भी बीड़ा उठाया।
बता दें, देश की आजादी के बाद सरदार पटेल पहले उप प्रधानमंत्री, गृहमंत्री रहे। सरदार पटेल को लौह पुरुष के नाम से जाना जाता है। आइए जानते हैं, सरदार के जीवन और उनके कुछ दिलचस्प किस्से।
गुजरात के नडियाद में हुआ सरदार पटेल का जन्म
सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म गुजरात के नडियाद (ननिहाल) में 31 अक्तूबर 1875 को हुआ। उनका पैतृक निवास स्थान गुजरात के खेड़ा के आनंद तालुका में करमसद गांव था। वे अपने पिता झवेरभाई पटेल तथा माता लाडबा देवी की चौथी संतान थे। उनका विवाह 16 साल की उम्र में झावेरबा पटेल से हुआ। पटेल ने नडियाद, बड़ौदा व अहमदाबाद से प्रारंभिक शिक्षा लेने के उपरांत इंग्लैंड मिडल टैंपल से लॉ की पढ़ाई पूरी की व 22 साल की उम्र में जिला अधिवक्ता की परीक्षा उत्तीर्ण कर बैरिस्टर बनें।
ऐसे मिली 'सरदार' की उपाधि
सरदार पटेल ने अपना महत्वपूर्ण योगदान 1917 में खेड़ा किसान सत्याग्रह, 1923 में नागपुर झंडा सत्याग्रह, 1924 में बोरसद सत्याग्रह के उपरांत 1928 में बारदोली सत्याग्रह में देकर अपनी राष्ट्रीय पहचान कायम की।
इसी बारदोली सत्याग्रह में उनके सफल नेतृत्व से प्रभावित होकर महात्मा गांधी और वहां के किसानों ने वल्लभभाई पटेल को 'सरदार' की उपाधि दी। वहीं 1922, 1924 तथा 1927 में सरदार पटेल अहमदाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गये। 1930 के गांधी के नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आन्दोलन की तैयारी के प्रमुख शिल्पकार सरदार पटेल ही थे। 1931 के कांग्रेस के कराची अधिवेशन में सरदार पटेल को अध्यक्ष चुना गया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन में सरदार पटेल को जब 1932 में गिरफ्तार किया गया तो उन्हें गांधी के साथ 16 माह जेल में रहने का सौभाग्य हासिल हुआ। 1939 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में जब देशी रियासतों को भारत का अभिन्न अंग मानने का प्रस्ताव पारित कर दिया गया तभी से सरदार पटेल ने भारत के एकीकरण की दिशा में कार्य करना प्रारंभ कर दिया तथा अनेक देशी रियासतों में प्रजा मण्डल और अखिल भारतीय प्रजा मण्डल की स्थापना करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस तरह लौह पुरुष सरदार पटेल ने अत्यंत बुद्धिमानी और दृढ़ संकल्प का परिचय देते हुए वी.पी. मेनन और लार्ड माउंट बेटन की सलाह व सहयोग से अंग्रेजों की सारी कुटिल चालों पर पानी फेरकर नवंबर 1947 तक 565 देशी रियासतों में से 562 देशी रियासतों का भारत में शांतिपूर्ण विलय करवा लिया।
हैदराबाद को शामिल कर प्रधानमंत्री पद पर ठोका दावा
भारत की आजादी के बाद भी 18 सितंबर 1948 तक हैदराबाद अलग ही था लेकिन लौह पुरुष सरदार पटेल ने हैदराबाद के निजाम को पाठ पढ़ा दिया और भारतीय सेना ने हैदराबाद को भारत के साथ रहने का रास्ता खोल दिया।
आजादी के पहले कांग्रेस कार्य समिति ने प्रधानमंत्री चुनने के लिए प्रक्रिया बनाई थी, जिसके तहत आंतरिक चुनावों में जिसे सबसे अधिक मत मिलेंगे वही कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष होगा और वही प्रथम प्रधानमंत्री भी होगा। कांग्रेस के 15 प्रदेशस्तर के अध्यक्षों में से 13 वोट पटेल को मिले थे और केवल एक वोट जवाहरलाल नेहरू को मिला था। लेकिन गांधी का पुरजोर पक्ष जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष व प्रधानमंत्री बनाने को लेकर था।
चूंकि गांधी को आधुनिक विचार बहुत पसंद थे, इन विचारों की झलक उन्हें पटेल की जगह विदेश में पढ़े-लिखे नेहरू में अधिक दिखती थी। वहीं गांधी विदेश नीति को लेकर पटेल से असहमत थे। इस कारण उन्होंने पटेल को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने से इंकार कर दिया व अपने वीटो पॉवर का इस्तेमाल नेहरू के पक्ष में किया।
इसको लेकर भारतीय राजनीति में राजेंद्र प्रसाद का यह कथन प्रासंगिक है 'एक बार फिर गांधी ने अपने चहेते चमकदार चेहरे के लिए अपने विश्वासपात्र सैनिक की कुर्बानी दे दी।' लेकिन सवाल पटेल को लेकर भी उठते हैं कि उन्होंने इसका विरोध क्यों नहीं किया। आखिर उनके लिए गांधी महत्वपूर्ण था या देश?
निश्चित ही भारत के 2/5 भाग क्षेत्रफल में बसी देशी रियासतों जहां तत्कालीन भारत के 42 करोड़ भारतीयों में से 10 करोड़ 80 लाख की आबादी निवास करती थी, उसे भारत का अभिन्न अंग बना देना कोई मामूली बात नहीं थी। इतिहासकार सरदार पटेल की तुलना बिस्मार्क से भी कई आगे करते है क्योंकि बिस्मार्क ने जर्मनी का एकीकरण ताकत के बल पर किया और सरदार पटेल ने ये विलक्षण कारनामा दृढ़ इच्छाशक्ति व साहस के बल पर कर दिखाया। उनके इस अद्वितीय योगदान के कारण 1991 में मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न के सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत किया गया।
हैदराबाद के बाद कश्मीर को भी भारत में विलय कराना चाहते थे पटेल
हैदराबाद के बाद कश्मीर को भी भारत में विलय कराने के लिए पटेल ने पुरजोर प्रयास किए थे लेकिन उनकी अपनी सीमाएं थीं और यही सीमाएं कश्मीर की समस्या को विकट बना गई। हैदराबाद के नकचढ़े नवाब का दंभ चूर कर इस मुस्लिम रियासत को आसानी से भारत में मिलाने वाले पटेल कश्मीर को भी भारत में मिलाने के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थे।
लेकिन कश्मीर पर बने अंतरराष्ट्रीय दबाव और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की निजी दिलचस्पी के कारण पटेल ने कुछ समय के लिए इस मुद्दे से किनारा कर लिया। जिसका फायदा पाकिस्तान और उसके परस्त कबाइलियों ने उठाया।
हालांकि वक्त ने फिर करवट ली और पाक परस्त कबाइलियों के आक्रमण के बाद जब महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी तो पटेल ने एक बार फिर महाराजा को विलय का प्रस्ताव भेजा, इस बार बात बन गई और कश्मीर के भारत में सर्शत विलय पर मुहर लग गई। इसके बाद भारतीय सेना ने कठिन और विपरीत परिस्थितियों में श्रीनगर पहुंचकर कबाइलियों को खदेड़ने का अभियान शुरू किया।
जिस तरह भारतीय सेना पाक परस्त कबाइलियों को ध्वस्त कर रही थी उससे लग रहा था कि जल्द ही उनके कब्जे वाले कश्मीर को पूरी तरह मुक्त करा लिया जाएगा। लेकिन इसी बीच युद्धविराम की घोषणा हो गई और भारतीय सेना को अपना अभियान रोकना पड़ा। इसका नतीजा ये हुआ कि गिलगित और कुछ हिस्से पर पाकिस्तानी सेना और कबाइलियों का नियंत्रण रह गया जो आज तक भारत के लिए नासूर बना हुआ है।
जब तमाम असहमतियों के बाद भी लिया कश्मीर में सेना भेजने का फैसला
शेख अब्दुल्ला के प्रमुख सहायक रहे बख्शी गुलाम मोहम्मद इस संबंध में एक बहुत रोचक किस्से का जिक्र करते हैं। दिल्ली में होनेवाली उस बैठक में जिसमें कश्मीर में सेना भेजने पर निर्णय होना था बख्शी गुलाम मोहम्मद भी उपस्थित थे। इस पर उन्होंने विस्तार से लिखा है-
'लॉर्ड माउंटबेटन ने बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में सम्मिलित होने वालों में थे-पंडितजी (जवाहलाल नेहरू), सरदार वल्लभभाई पटेल, रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह, जनरल बुकर, कमांडर-इन-चीफ जनरल रसेल, आर्मी कमांडर तथा मैं। हमारे राज्य में सैन्य स्थिति तथा सहायता को तुरंत पहुंचाने की संभावना पर ही विचार होना था।'
'जनरल बुकर ने जोर देकर कहा कि उनके पास संसाधन इतने कम हैं कि राज्य को सैनिक सहायता देना संभव नहीं। लॉर्ड माउंटबेटन ने निरुत्साहपूर्ण झिझक दरशाई। पंडितजी ने तीव्र उत्सुकता एवं शंका प्रकट की। सरदार पटेल सबकुछ सुन रहे थे, किंतु बोले कुछ नहीं। वह शांत व गंभीर प्रकृति के थे, उनकी चुप्पी पराजय एवं असहाय स्थिति, जो बैठक में परिलक्षित हो रही थी, के बिलकुल विपरीत थी।'
अचानक सरदार अपनी सीट से खड़े हुए और तुरंत कठोर एवं दृढ़ स्वर से सबको अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने अपना विचार व्यक्त किया-'जनरल हर कीमत पर कश्मीर की रक्षा करनी होगी। आगे जो होगा, देखा जाएगा। संसाधन हैं या नहीं, आपको यह तुरंत करना चाहिए। सरकार आपकी हर प्रकार की सहायता करेगी। यह अवश्य होना और होना ही चाहिए। कैसे और किसी भी प्रकार करो, किंतु इसे करो।'
जनरल के चेहरे पर उत्तेजना के भाव दिखाई दिए। मुझमें आशा की कुछ किरण जगी। जनरल की इच्छा आशंका जताने की रही होगी, किंतु सरदार चुपचाप उठे और बोले, 'हवाई जहाज से सामान पहुंचाने की तैयारी सुबह तक कर ली जाएगी।' इस प्रकार कश्मीर की रक्षा सरदार पटेल के त्वरित निर्णय, दृढ़ इच्छाशक्ति और विषम-से-विषम परिस्थिति में भी निर्णय के कार्यान्वयन की दृढ़ इच्छा का ही परिणाम थी।