साइकिल पर घमासान: पुराने आदेशों को नजीर बना सकता है EC
चुनाव चिन्ह साइकिल पर मुलायम और अखिलेश के दावे की स्थिति में चुनाव आयोग के पुराने आदेश और इंतजाम से बीच की राह निकल सकती है। चुनाव आयोग के पूर्व विशेष चुनाव अधिकारी केजे राव ने बताया कि आयोग ने कुछ साल पहले हुए चुनाव चिह्न विवाद में ये व्यवस्था दी थी कि अलग-अलग राज्यों या सीटों पर दो पार्टियां या एक पार्टी के दो गुट चुनाव लड़े तो एक ही निशान पर लड़ सकते हैं।
लेकिन समाजवादी पार्टी के दोनों गुट समान सीटों पर चुनाव लडने पर आमादा हैं। लिहाजा साइकिल जब्त होने के आसार ज्यादा हैं। 27 दिसंबर 2011 को चुनाव आयोग ने ने उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के विवाद में यूकेडी के चुनाव निशान और नाम फ्रीज कर दिया था और मामले की सुनवाई आने तक दोनों गुटों को स्थाई तौर पर नाम और चुनाव निशान जारी किया था।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ एस. वाई. कुरैशी के मुताबिक आयोग के सामने पहली बार ऐसी स्थिति आई हो ऐसा नहीं है, 1969 में कांग्रेस जब दो फाड़ हुई थी।
कांग्रेस का पुराना चुनाव निशान जब्त हुआ था
तब कांग्रेस का पुराना चुनाव निशान बैलों की जो चुनाव निशान जब्त कर लिया गया था। क्योंकि कांग्रेस आर और कांग्रेस एस दोनों को ही ये निशान चाहिए था तब आयोग ने जोड़ी बैल फ्रीज कर इंदिरा गांधी की कांग्रेस को हाथ का निशान दिया गया था।
इसी तरह 1991 में जनता दल दो फाड़ होकर जदयू और जदएस बना तो चक्र का चुनाव निशान जब्त हो गया और जदयू को तीर और जदएस को सर पर फसल रखे महिला का चुनाव चिह्न मिला।
यहां बता दे कि देश के कई राज्यों में क्षेत्रीय और राज्य स्तरीय पार्टियों के चुनाव निशान के रूप में साइकिल ही चल रही है। समाजवादी पार्टी के अलावा आंध्र और तेलंगाना में तेलुगु देशम पार्टी , केरल में केरल कांग्रेस, मणिपुर में मणिपुर पीपुल्स पार्टी और जम्मू कश्मीर नेशनल पीपुल्स पार्टी साईकिल पर सवार हैं।