समाजवादी और बसपा में एक राय इसलिए फिलहाल गठबंधन नामंजूर
समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की एकता की वजह से दोनों पार्टियों ने सोमवार को यहां संयुक्त विपक्ष के महागठबंधन से दूरी बनाए रखी। बसपा और सपा की महागठबंधन से दूरी यूं ही नहीं है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस और बसपा के गठबंधन को लेकर हां और न के खेल ने मायावती की खासी किरकिरी कराई है। यही वजह है कि मायावती ने इस बैठक में भाग लेने में दिलचस्पी नहीं दिखाई।
महागठबंधन समय की जरूरत
बसपा के वरिष्ठ नेता ने कहा महागठबंधन समय की जरूरत है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन विपक्षी एकता के नाम पर कांग्रेस की मनमानी भी किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगी। इसलिए बहनजी ने इस बैठक से दूरी बनाए रखी। जहां तक सवाल राज्य सभा में रणनीति का है, तो इसके लिए बहनजी के दिशानिर्देश स्पष्ट हैं। जातिवादी और फिरकापरस्त ताकतों को परास्त करने की हर कोशिश के साथ बसपा होगी। समाजवादी पार्टी के सांसद और पार्टी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि हम फिलहाल बहनजी के साथ हैं। इसलिए हमने इस विपक्षी गठबंधन से दूरी बनाकर रखी है। उन्होंने कहा कि वैसे भी महागठबंधन में सपा की भूमिका का फैसला पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद ही होगा। क्योंकि वर्तमान स्थितियों में पूर्व गठबंधन की दिशा और दशा तय करना कठिन है। इसलिए सपा ने इस बैठक में भाग नहीं लिया है।
सबको एकजुट करने की कवायद में लगे नायडू
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कवायद में जुटे हैं। इसी क्रम में उन्होंने नेशनल कांफ्रेंस के मुखिया फारूख अब्दुल्ला और कांग्रेस नेता अहमद पटेल से मुलाकात की है। यह बात काबिले गौर है कि पिछले कुछ महीनों से नायडू ने एनसीपी प्रमुख शरद पवार, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव, रालोद के प्रमुख अजित सिंह, सीपीआईएम के महासचिव सीताराम येचुरी, द्रमुक नेता एमके स्टालिन और जनता दल सेक्युलर के प्रमुख एचडी देवगौड़ा से मुलाकात करके विपक्ष को एकजुट करने में ंलगे हैं। सोमवार को विपक्ष की मेगा बैठक के बाद समझा जा रहा है कि संयुक्त विपक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में 16 दिसंबर को चेन्नई में विपक्षी एकता के प्रणेता रहे पूर्व द्रमुक नेता एम करुणानिधि की मूर्ति के अनावरण के लिए भी एकत्र हो सकता है।