आरएसएस ने निक्कर से पीछा छुड़ाया, जानिए कब कब बदला चोला?
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जोशी के अनुसार काफी पहले से इसको लेकर चर्चा चल रही थी लेकिन राजस्थान के नागौर में हुई संघ की कार्यकारिणी की बैठक में इस पर अंतिम मुहर लगी। संघ की इस पोशाक में हुआ यह बड़ा बदलाव यूं ही नहीं है लंबे समय से इसकी जरूरत महसूस की जा रही थी।
असल में बदलते दौर के साथ संघ भी खुद को इस बदलाव में शामिल करना चाहता है। खासकर युवाओं में पैंठ बनाने के लिए यह जरूरी था कि कुछ उनके अनुसार चला जाए। यह युवाओं से खुद को जोड़े रखने की ही मजबूरी थी कि 1925 में अपनी स्थापना के समय से संघ के गणवेश की सबसे बड़ी पहचान रहे खाकी निक्कर को ही त्यागने का मन बना लिया, न सिर्फ उसके रंग में बदलाव किया गया बल्कि उसकी जगह पैंट ने ले ली।
संघ तेजी से अपना विस्तार करने के साथ ही युवाओं में पैंठ बनाने की तैयारी कर रहा है। फिलहाल भी संघ के स्वयंसेवकों में 80 फीसदी से ज्यादा 40 से कम उम्र के हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि संघ ने अपनी वेशभूषा में पहली बार बदलाव किया है इससे पहले भी समय समय पर कई बार बदलाव होते रहे हैं।
निक्कर और टोपी छोड़कर सबकुछ बदला
1925 में अपनी स्थापना के समय से ही संघ की वेशभूषा में समय समय पर कई बदलाव हुए हैं। हालांकि जो नहीं बदला वो सिर्फ इसका खाकी निक्कर और काली टोपी। संघ की स्थापना के दौरान ही गोलवलकर ने इसकी वेशभूषा का पूरा ख्याल रखा था।
भावना ये थी कि यह माडर्न भी हो और आरामदायक भी। उस समय चर्चा धोती कुर्ते और कुछ पारंपरिक परिधानों की भी थी लेकिन गोलवलकर ने सबसे हटकर खाकी निक्कर, खाकी कमीज और फौजी जूतों को संघ की ड्रेस बनाया। उस दौरान बेल्ट भी चमड़े की हुआ करती थी। लेकिन वक्त के साथ सब चीजों में बदलाव होता रहा।
सबसे पहला बदलाव हुआ कमीज में, जो 1939 तक खाकी ही हुआ करती थी। लेकिन पुलिस और डाकियों से मिलती जुलती वेशभूषा होने के कारण इसमें बदलाव करने का निर्णय लिया गया। कई दिन चले चिंतन के बाद कमीज का रंग बदलकर सफेद कर दिया गया। इस बदलाव को काफी पसंद किया गया।
शर्ट के बाद बदले जूते और बेल्ट
खाकी निक्कर और सफेद शर्ट के साथ फौजी जूतों और चमड़े की बेल्ट का समायोजन लंबे समय तक चलता रहा। शर्ट में बदलाव के बाद अगला नंबर आया फौजी जूतों का। काफी भारी और महंगे होने के कारण जूतों में बदलाव का भी निर्णय हुआ।
फौजी जूतों की उपलब्धता भी थोड़ा मुश्किल काम था जिसके कारण 1973 में जूतों में बदलाव करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद फौजी जूतों की जगह सामान्य जूतों ने ले ली। ये आसानी से उपलब्ध भी थे और इसे अपनाने के लिए कोई अतिरिक्त खर्चा करने की जरूरत भी नहीं थी।
कुछ साल पहले ही संघ ने अपनी बेल्ट में भी बदलाव किया, चमड़े की बेल्ट की जगह कैनवास की बेल्ट ने ले ली। बताया जाता है कि कुछ हिंदूवादी संगठनों और जैन मुनियों की आपत्ति के बाद इसमें बदलाव का निर्णय लिया गया। हालांकि तमाम बदलावों के बीच संघ की टोपी नहीं बदली।
वहीं पैंट को लेकर किया गया बदलाव भी इतना आसान नहीं रहा। इसको लेकर पिछले छह सालों से माथापच्ची चल रही है। निक्कर में बदलाव की चर्चा पहली बार साल 2010 में हुई थी लेकिन तब इस पर एक राय नहीं बन सकी और वरिष्ठ सदस्यों ने भी इस पर आपत्ति जता दी। नतीजतन निक्कर में बदलाव नहीं हो सका।