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River Delta: मानवजनित गतिविधियों से धंस रहे नदी डेल्टा, 23 करोड़ से अधिक लोगों पर मंडराता संकट
Sun, 18 Jan 2026 05:31 AM IST
निर्मल कांत
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sun, 18 Jan 2026 05:31 AM IST
सार
River Delta: दुनिया के कई बड़े नदी डेल्टा अब समुद्र स्तर बढ़ने की तुलना में तेजी से धंस रहे हैं, जिससे करोड़ों लोगों की आजीविका और बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। भूजल का अत्यधिक दोहन, नदियों में मिट्टी की कमी और अनियोजित शहरीकरण इसके मुख्य कारण हैं। यह समस्या भविष्य की नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट है, जो कृषि, आवास और रोजगार को सीधे प्रभावित कर सकती है। पढ़िए रिपोर्ट-
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नदी
- फोटो : एडॉब स्टॉक
विस्तार
दुनिया के कई बड़े नदी डेल्टा समुद्र स्तर बढ़ने की रफ्तार से भी कहीं तेज धंस रहे हैं, जो आने वाले समय में बाढ़, विस्थापन और आजीविका के लिए खतरा बन सकते हैं। इसका सीधा असर यहां रहने वाली करीब 23.60 करोड़ आबादी पर पड़ेगा, जो पहले से ही जलवायु परिवर्तन के चलते अत्यंत संवेदनशील है।
नदी डेल्टा वे भू-आकृतिक क्षेत्र होते हैं, जहां नदियां समुद्र में मिलने से पहले अपने साथ लाई मिट्टी और गाद को जमा करती हैं। यही प्रक्रिया डेल्टा की भूमि को अत्यंत उपजाऊ बनाती है, जिसके कारण यहां घनी आबादी, कृषि, व्यापार और बड़े शहर विकसित हुए। भारत का गंगा–ब्रह्मपुत्र डेल्टा, मिस्र का नील डेल्टा और दक्षिण-पूर्व एशिया का मेकांग डेल्टा इसका प्रमुख उदाहरण हैं। लेकिन वही उपजाऊ भूमि अब तेजी से नीचे धंस रही है, जिससे इन क्षेत्रों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। वर्जीनिया टेक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का यह अध्ययन नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में दुनिया के 40 बड़े नदी डेल्टा का विश्लेषण किया गया, जिनमें 18 ऐसे पाए गए जिनका धंसना समुद्र स्तर में हो रही वृद्धि से अधिक तेज है।
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भूजल का सर्वाधिक दोहन प्रमुख कारण
वैज्ञानिकों ने डेल्टा के धंसने के पीछे तीन प्रमुख मानवजनित कारणों की पहचान की है। पहला और सबसे बड़ा कारण भूजल का अत्यधिक दोहन है। जब भूमिगत जल को तेजी से निकाला जाता है तो जमीन के भीतर खाली जगह बनती है और सतह धीरे-धीरे बैठने लगती है। दूसरा कारण नदियों में मिट्टी और गाद की कमी है। बड़े बांधों, नहरों और जल-नियंत्रण संरचनाओं के कारण वह प्राकृतिक गाद डेल्टा तक नहीं पहुंच पा रही, जो जमीन को मजबूत बनाए रखती थी। तीसरा कारण तेज और अनियोजित शहरीकरण है। भारी इमारतें, सड़कें और औद्योगिक ढांचे जमीन पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं, जिससे धंसने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
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भविष्य का नहीं, वर्तमान का संकट....
शोधकर्ताओं के अनुसार यह समस्या किसी दूर के भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट है। डेल्टा क्षेत्रों में बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ने से खेती, आवास, पेयजल स्रोत और रोजगार सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय विस्थापन का खतरा भी बढ़ सकता है, जो सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता को जन्म देगा।
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नदी डेल्टा वे भू-आकृतिक क्षेत्र होते हैं, जहां नदियां समुद्र में मिलने से पहले अपने साथ लाई मिट्टी और गाद को जमा करती हैं। यही प्रक्रिया डेल्टा की भूमि को अत्यंत उपजाऊ बनाती है, जिसके कारण यहां घनी आबादी, कृषि, व्यापार और बड़े शहर विकसित हुए। भारत का गंगा–ब्रह्मपुत्र डेल्टा, मिस्र का नील डेल्टा और दक्षिण-पूर्व एशिया का मेकांग डेल्टा इसका प्रमुख उदाहरण हैं। लेकिन वही उपजाऊ भूमि अब तेजी से नीचे धंस रही है, जिससे इन क्षेत्रों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। वर्जीनिया टेक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का यह अध्ययन नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में दुनिया के 40 बड़े नदी डेल्टा का विश्लेषण किया गया, जिनमें 18 ऐसे पाए गए जिनका धंसना समुद्र स्तर में हो रही वृद्धि से अधिक तेज है।
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भूजल का सर्वाधिक दोहन प्रमुख कारण
वैज्ञानिकों ने डेल्टा के धंसने के पीछे तीन प्रमुख मानवजनित कारणों की पहचान की है। पहला और सबसे बड़ा कारण भूजल का अत्यधिक दोहन है। जब भूमिगत जल को तेजी से निकाला जाता है तो जमीन के भीतर खाली जगह बनती है और सतह धीरे-धीरे बैठने लगती है। दूसरा कारण नदियों में मिट्टी और गाद की कमी है। बड़े बांधों, नहरों और जल-नियंत्रण संरचनाओं के कारण वह प्राकृतिक गाद डेल्टा तक नहीं पहुंच पा रही, जो जमीन को मजबूत बनाए रखती थी। तीसरा कारण तेज और अनियोजित शहरीकरण है। भारी इमारतें, सड़कें और औद्योगिक ढांचे जमीन पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं, जिससे धंसने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
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भविष्य का नहीं, वर्तमान का संकट....
शोधकर्ताओं के अनुसार यह समस्या किसी दूर के भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट है। डेल्टा क्षेत्रों में बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ने से खेती, आवास, पेयजल स्रोत और रोजगार सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय विस्थापन का खतरा भी बढ़ सकता है, जो सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता को जन्म देगा।
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