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निजता मौलिक अधिकार, लेकिन हर अधिकार की एक सीमा: जे चेलमेश्वर 

Fri, 25 Aug 2017 11:35 AM IST
amarujala.com- Presented by: अभिषेक तिवारी
amarujala.com- Presented by: अभिषेक तिवारी Updated Fri, 25 Aug 2017 11:35 AM IST
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Right to privacy is fundamental right but a limit of every right says J Chelameswar
supreme court

जस्टिस जे चेलमेश्वर ने 46 पेज के अपने फैसले में निजता के अधिकार पर बहस की बुनियाद पर चर्चा की है। उन्होंने अपने फैसले में लिखा कि निजता के अधिकार का विमर्श तीन सवालों पर खड़ा है। 1. क्या भारत के संविधान में निजता का मौैलिक अधिकार है? 2. अगर है तो यह कहां है? 3. अगर है तो इसकी रूप-रेखा क्या है?

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उन्होंने कहा, मैं नहीं समझता कि इस देश में कोई भी शख्स यह चाहेगा कि राज्य का अफसर उसकी मर्जी के बगैर उसके घर में घुस आए। उसके संपत्ति में घुसपैठ करे या कोई सैनिक उसके यहां डेरा जमा ले। मुझे नहीं लगता कि कोई यह पसंद करेगा कि राज्य उसे बताए कि वह क्या खाए या क्या पहने। अपने निजी, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में किन लोगों से संबंध रखे।
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संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (सी) ने सामाजिक और राजनीतिक संबद्धता की स्वतंत्रता की गारंटी दी है। निजी, राजनीतिक और सामाजिक  संबद्धता के साथ ही यात्रा करने का मामला पूरी तरह निजी है और ये निजता अधिकार के दायरे में आते हैं। ये लोगों के निहायत ही अंतरंग फैसले होते हैं।  

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पढ़ें- राइट टू प्राइवेसी: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बोली सरकार, हमें क्यों बताया जा रहा गुनहगार?


मौलिक अधिकार दखलंदाजी रोकने की दीवार 
मौैलिक अधिकार लोगों की आजादी में राज्य के दखलंदाजी को रोकने की एक मात्र दीवार हैं। लिहाजा निजता का अधिकार लोगों की प्रमुख आजादियों में से एक है और इसकी सुरक्षा होनी चाहिए। अनुच्छेद 21 में जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, निजता का अधिकार उसी का हिस्सा है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि कोई भी कानूनी अधिकार संपूर्ण नहीं होता। हर अधिकार की एक सीमा है। इसलिए निजता के मौलिक अधिकार की भी एक सीमा है। लेकिन यह मामला दर मामला निर्भर करेगा। 

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प्राइवेसी, जीने के अधिकार का ही एक हिस्सा: जस्टिस आर एफ नरीमन 

जस्टिस आर एफ नरीम नरीमन ने 122 पेज के अपने फैसले में उन बिंदुओं को गिनाया है जो निजता के मौलिक अधिकारों में आएंगे। ये हैं  1. व्यक्ति की निजता। इसमें राज्य की ओर से व्यक्ति के शरीर पर दखल से जुड़ा मामला शामिल है। जैसे व्यक्ति को आजादी से कहीं भी जाने का अधिकार है। 2. व्यक्ति का अपने निजी जानकारियों पर नियंत्रण है।

वह अपने बारे में सूचना के प्रसार को नियंत्रित कर सकता है। अगर इसका उल्लंघन होता है तो यह निजता का उल्लंघन माना जाएगा। 3. पसंद का अधिकार। व्यक्ति की अपनी निजी पसंद पर अख्तियार है। हम संविधान का प्रस्ताव देख चुके हैं जो इसकी मूल भावनाओं को दर्शाता है।

संविधान में आजादी के प्रस्ताव में सोच, अभिव्यक्ति, विश्वास, मत और पूजा का जिक्र है। ये मूल्य आजादी से संबंधित है। इसलिए प्राइवेसी के अधिकार को भी केस-टु-केस की प्रक्रिया से गुजरना होगा। निजी आजादी से जुड़े मामले, जैसे देश में कहीं भी जाने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार हैं। लेकिन ये संपूर्ण नहीं हैं। 

कई अंतरराष्ट्रीय फैसलों का जिक्र 
जस्टिस नरीमन ने प्राइवेसी के संदर्भ में कई अंतरराष्ट्रीय अदालती निर्णयों का जिक्र किया है। उन्होंने पीयूसीएल बनाम केंद्र सरकार के 1997 के एक प्रसिद्ध केस का उदाहरण दिया है जिसमें कोर्ट ने कहा था कि हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है प्राइवेसी जीने के अधिकार का एक ही हिस्सा है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है।

साथ ही एम पी शर्मा और खड़क  सिंह मामले का जिक्र करते हुए कहा कि बाद के फैसलों में अदालत ने प्राइवेसी को मौलिक अधिकार माना है और इस पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है।

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