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'आज नहीं तो कल इस्तीफा देना ही होगा': ज्ञानेश कुमार पर चिदंबरम हमलावर, कहा- सीईसी के हटने तक जारी रहेगा आंदोलन
Sat, 03 Oct 2026 08:09 PM IST
प्रशांत तिवारी
एएनआई, नई दिल्ली
एएनआई, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Sat, 03 Oct 2026 08:09 PM IST
सार
वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद, एसआईआर के तहत मतदाता सूची में बदलाव और विपक्ष के आरोपों को मुद्दा बनाया है।
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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने शनिवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग में वोटर लिस्ट के रिवीजन को लेकर सामने आ रहे अंदरूनी मतभेदों के बीच ज्ञानेश कुमार के लिए सबसे समझदारी भरा कदम यही होगा कि वह तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे दें। चिदंबरम ने दावा किया कि आने वाले समय में उनका इस्तीफा होना तय है और अगर उन्होंने अभी पद नहीं छोड़ा तो विपक्ष का आंदोलन और तेज होगा।
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'इस्तीफा दें, वरना विरोध जारी रहेगा'
एएनआई से बातचीत में चिदंबरम ने कहा कि उन्हें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ज्ञानेश कुमार को किसी न किसी दिन इस्तीफा देना पड़ेगा। उनके मुताबिक, अगर वह अभी इस्तीफा दे देते हैं तो यह उनके लिए बेहतर होगा, लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो विरोध-प्रदर्शन लगातार जारी रहेंगे। चिदंबरम ने आगे कहा कि इंडिया ब्लॉक का विरोध जारी रहेगा। दूसरे संगठन भी प्रदर्शन कर रहे हैं और उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उनके लिए सबसे समझदारी की बात यही है कि वह अभी इस्तीफा दे दें।
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महाराष्ट्र-कर्नाटक से लेकर ओडिशा तक का जिक्र
चिदंबरम ने अपने आरोपों के समर्थन में अलग-अलग राज्यों के वरिष्ठ चुनाव अधिकारियों से जुड़े हालिया घटनाक्रम का भी जिक्र किया। उन्होंने महाराष्ट्र और कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के बयानों का हवाला दिया। साथ ही ओडिशा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से समय से पहले सेवानिवृत्ति लेने के लिए दिए गए अनुरोध का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि इन घटनाक्रमों को केवल अलग-अलग मामलों के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों के सामने आ रहे सवालों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।
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'अधिकारी खुद बताएं कि उन्हें क्या निर्देश मिले'
चिदंबरम ने देशभर के राज्य स्तरीय चुनाव अधिकारियों से भी खुलकर सामने आने की अपील की। उन्होंने कहा कि अगर आगे दूसरे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय इस मामले में जांच शुरू करते हैं और राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को बुलाते हैं, उससे पहले ही अधिकारियों को यह बताना चाहिए कि उन्हें चुनाव आयोग की ओर से क्या निर्देश मिले थे, कब मिले थे और उन्होंने उन निर्देशों पर किस तरह अमल किया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि यह साफ है कि एसआईआर प्रक्रिया गैरकानूनी है। क्या अधिकारियों ने इस बारे में अपनी आपत्ति जताई थी? अगर उन्होंने आपत्ति जताई थी, तो क्या चुनाव आयोग या मुख्य चुनाव आयुक्त ने उसे दरकिनार कर दिया? उन्हें अब बोलना चाहिए। यही समय है।
फिलहाल निशाने पर सिर्फ सीईसी, बाकी दो आयुक्तों पर नहीं
जब चिदंबरम से पूछा गया कि क्या विपक्ष की मांग चुनाव आयोग के दूसरे सदस्यों के इस्तीफे तक भी जाती है, तो उन्होंने कहा कि फिलहाल ऐसा नहीं है। उनका कहना था कि विपक्ष उन्हीं लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा है, जिनकी भूमिका को लेकर उसके पास सवाल उठाने के आधार हैं। अगर हमें पता चलता है कि बाकी दो चुनाव आयुक्तों की भूमिका भी संदिग्ध या गैरकानूनी है, तो हम उनके इस्तीफे की मांग करेंगे। लेकिन फिलहाल ऐसा कोई सबूत नहीं है।
'सरकार कभी बचाती है, कभी कहती है हमारा कोई लेना-देना नहीं'
चिदंबरम ने केंद्र सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार संवैधानिक स्वायत्तता का हवाला देकर मुख्य चुनाव आयुक्त का बचाव कर रही है। सरकार कभी चुनाव आयुक्त का बचाव करती है और कभी यह कहती है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसका सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। चिदंबरम ने दावा किया कि साफ तौर पर कोई न कोई उन्हें बचा रहा है। कोई न कोई उन्हें इस्तीफा न देने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। लेकिन आखिरकार उन्हें इस्तीफा देना ही होगा। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक सीईसी पद से नहीं हटते, विरोध-प्रदर्शन और व्यापक होते जाएंगे।
14 बार दर्ज हुई आपत्तियों की बात ने बढ़ाई हलचल
यह पूरा विवाद उन रिपोर्टों के बाद और गहरा गया, जिनमें दावा किया गया कि पिछले 10 महीनों के दौरान दो चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और सुखबीर संधू ने महत्वपूर्ण फाइलों पर 14 बार औपचारिक रूप से अपनी आपत्तियां दर्ज कीं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टों के हवाले से कहा गया कि नोटशीट में ऐसी चिंताएं दर्ज थीं कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में पूरी सहमति के बिना कुछ फैसलों को आगे बढ़ाया जा रहा था। हालांकि, इसे केवल सामान्य मतभेद नहीं माना गया और चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे।
एसआईआर शुरू हुआ तो सड़कों पर भी दिखा विरोध
चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर की प्रक्रिया शुरू किए जाने के बाद यह विवाद और राजनीतिक हो गया। आधिकारिक तौर पर एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूचियों को व्यवस्थित करना है। इसके तहत डुप्लीकेट नाम हटाने, मृत मतदाताओं के नाम निकालने और नए योग्य मतदाताओं के नाम जोड़ने जैसी प्रक्रिया की जाती है। लेकिन इस बार एसआईआर को लेकर कई राज्यों में सड़क पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए।
विपक्ष का आरोप-बड़ी संख्या में नाम हटाए गए
विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बदलाव के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे नाम हटा दिए गए, जिनका पता लगाना मुश्किल था। उनका कहना था कि कई मतदाताओं को उनके नाम हटाए जाने की पर्याप्त जानकारी या नोटिस नहीं मिला। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ बूथों पर बूथ लेवल ऑफिसर्स यानी बीएलओ पर नाम हटाने के लक्ष्य पूरे करने का दबाव था। इन आरोपों के बाद मामला महज मतदाता सूची के प्रशासनिक संशोधन तक सीमित नहीं रहा और सीधे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया।
चुनाव आयोग पर विपक्ष का गंभीर आरोप
इसके बाद विपक्षी दलों ने देशभर में प्रदर्शन शुरू किए। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने भी विपक्षी दलों के साथ मिलकर राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। विपक्षी दलों का आरोप था कि चुनाव आयोग की कार्रवाई उसकी संस्थागत स्वतंत्रता को प्रभावित कर रही है। उनका यह भी दावा था कि जानबूझकर या अनजाने में मतदाता सूचियों से नाम हटाने की प्रक्रिया का असर विपक्ष के समर्थन वाले इलाकों पर पड़ रहा है और इससे सत्तारूढ़ दल को फायदा हो सकता है।
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चुनाव आयोग ने आरोपों पर क्या कहा?
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को लेकर अलग रुख रखा है। आंतरिक मतभेदों के सवाल पर आयोग का कहना है कि किसी भी सामूहिक या कोलेजियल संस्था में अलग-अलग सदस्यों की राय अलग होना सामान्य बात है। आयोग के अनुसार, अंतिम फैसले और एसआईआर जैसी प्रक्रिया को तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई। मतदाता सूची से नाम हटाने के आरोपों पर आयोग का कहना है कि किसी भी नाम को मनमाने तरीके से हटाया नहीं जा सकता। आयोग के मुताबिक इसके लिए तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है, जिसमें मैदानी सत्यापन, नोटिस और फॉर्म 7 के तहत आदेश जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को अपडेट और साफ-सुथरा रखना जरूरी है, खासकर आगामी चुनावों को देखते हुए, ताकि डुप्लीकेट, मृत या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा सकें और योग्य मतदाताओं को सूची में शामिल किया जा सके।