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Hindi News ›   India News ›   Researcher Wilson, activist Dhawale walk out of prison on getting bail in 2018 Elgar case News In Hindi

Elgar Case: छह साल बाद जेल से बाहर आएं शोधकर्ता विल्सन व कार्यकर्ता धवले, बॉम्बे हाईकोर्ट ने दी थी जमानत

Fri, 24 Jan 2025 03:10 PM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: शुभम कुमार Updated Fri, 24 Jan 2025 03:10 PM IST
सार

एल्गर केस में छह साल पहले गिरफ्तार हुए शोधकर्ता विल्सन और कार्यकर्ता धवले आखिरकार आज  जेल से बाहर आ गए। 8 जनवरी को इन दोनों को जमानत देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि वे 2018 से जेल में हैं और उनके खिलाफ मामला अब तक शुरू नहीं हुआ है। इ

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Researcher Wilson, activist Dhawale walk out of prison on getting bail in 2018 Elgar case News In Hindi
मुंबई हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

शोधकर्ता रोना विल्सन और कार्यकर्ता सुधीर धावले को शुक्रवार को मुंबई हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जहां उन्हें एल्गर परिषद-माओवादी मामले में रिहा कर दिया गया है। दोनों छह साल से ज्यादा समय से जेल में थे।  बता दें कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने 8 जनवरी को इन दोनों को जमानत देते हुए कहा था कि वे 2018 से जेल में हैं और उनके खिलाफ मामला अब तक शुरू नहीं हुआ है। इसके बाद, शुक्रवार को विशेष एनआईए अदालत में जमानत की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद, वे दोपहर करीब 1:30 बजे नवी मुंबई की तलोजा जेल से बाहर आए।
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अभियोजक पक्ष ने 300 से ज्यादा गवाहों का दिया हवाला
उच्च न्यायालय ने रोना विल्सन और सुधीर धावले को राहत देते हुए कहा कि वे 2018 से जेल में हैं और उनके खिलाफ आरोप भी अभी तय नहीं किए गए हैं। अभियोजन पक्ष ने 300 से ज्यादा गवाहों का हवाला दिया है, इसलिए मामले के जल्द निपटने की संभावना नहीं है। एक आपराधिक मामले में आरोप तय होने के बाद ही मुकदमा शुरू होता है।

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साथ ही इस मामले में धवले और विल्सन के अलावा 14 अन्य कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें से आठ लोगों को जमानत मिल चुकी है, जिनमें वरवर राव, सुधा भारद्वाज, आनंद तेलतुम्बडे, वर्नोन गोंजाल्विस, अरुण फरेरा, शोमा सेन, गौतम नवलखा और महेश राउत शामिल हैं। महेश राउत की जमानत को लेकर एनआईए ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है और इस कारण वह अभी भी जेल में हैं।

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क्या है पूरा मामला
गौरतलब है कि यह मामला 31 दिसंबर 2017 को पुणे में आयोजित एल्गर परिषद सम्मेलन से जुड़ा है, जहां कथित तौर पर भड़काऊ भाषण दिए गए थे, जिसके बाद पुणे के पास कोरेगांव-भीमा गांव में हिंसा हुई थी। पुणे पुलिस ने दावा किया था कि इस सम्मेलन को माओवादियों का समर्थन प्राप्त था। बाद में इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अपने हाथ में ले ली।

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