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नेपाल के चंपा और चिंपू

Tue, 26 Dec 2017 10:27 AM IST
भद्रा शर्मा और कई शुल्ज
भद्रा शर्मा और कई शुल्ज Updated Tue, 26 Dec 2017 10:27 AM IST
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Rescued Chimpanzees champa and chimpu of nepal
champa and chimpu of nepal
सादे कपड़ों में जांच दलों के कुछ लोग करीब दो महीने पहले काठमांडू में एक स्मगलर के घर के बाहर इकट्ठा हुए थे। उन्हें यह सूचना मिली थी कि दो बेबी चिंपांजी नेपाल के जरिये विदेश भेजे जा रहे हैं। जब जांच दल ने उस स्मगलर के घर पर धावा बोला, तो उन्हें वहां गैरकानूनी तरीके से छिपाए गए अनेक वन्यजीवों के होने की जानकारी मिली। हवाई अड्डे पर कस्टम विभाग की आंखों में धूल झोंकने के लिए तस्करों ने एक विशाल क्रेट में चिंपांजियों को घुसा दिया था और उसके चारों ओर तोते तथा तीतरों के दर्जनों पिंजड़ों के साथ अनेक बंदरों को भी ठूंस दिया था। इन चिंपांजियों को नाइजीरिया से नेपाल लाया गया था। लेकिन नेपाल आते-आते न केवल उनका वजन आधा रह गया था, बल्कि उन्हें निमोनिया हो गया था। काठमांडू के एक पुलिस अधिकारी जीवन कुमार श्रेष्ठ ने कहा, यह पता करना कठिन था कि चिंपांजी क्रेट में हैं भी या नहीं। वे दम घुटने से मर भी सकते थे।
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नेपाल पशु-पक्षियों और उनके अंगों की तस्करी के एक बड़े वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है, तो उसकी बड़ी वजह भारत और नेपाल के साथ लगती इसकी सीमाएं भी हैं। हाल के वर्षों में अधिकारियों ने यहां से सैकड़ों तस्करों को गिरफ्तार किया है। न्यायिक और कस्टम अधिकारियों के भ्रष्ट होने के कारण यहां से बारहसींगों के सींग, तिब्बती हिरण तथा उनके ऊन, दुर्लभ उल्लू और बंदरों की लुप्तप्राय नस्लों की तस्करी आम है।
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पर मुश्किल तब होती है, जब तस्करी कर ले जाए जाने वाले वन्यजीवों को जब्त कर लिया जाता है। अब पकड़े गए उन दो चिंपांजियों का ही उदाहरण लीजिए। विगत 17 अक्तूबर को उन्हें तस्करों के कब्जे से छुड़ाया गया था। तब से नाइजीरिया की सरकार उन्हें अपने यहां भेजने के लिए काठमांडू पर दबाव बना रही है, जबकि काठमांडू में स्थानीय वन्यजीवन अधिकारी उन्हें नेपाल के सेंट्रल जू में रखना चाहते हैं। उन्होंने उन दो चिंपाजिंयों का नाम भी चंपा और चिंपू रख दिया है। लुप्तप्राय जीवों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते के मुताबिक, छुड़ाए गए जानवरों को उन्हीं देशों में भेजे जाने का प्रावधान है, जहां से उन्हें लाया गया है। लेकिन वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ जू ऐंड एक्वेरियम्स के प्रमुख डाउग क्रेस कहते हैं कि इस समझौते का पालन करना आसान नहीं है। ज्यादातर देशों में तस्करी के दौरान छुड़ाए गए वन्यजीवों के रख-रखाव और उनके स्वास्थ्य जांच की बेहतर व्यवस्था नहीं है। वन्यजीवों के भोजन और उनकी चिकित्सा में भी बहुत अधिक खर्च आता है। ऐसे जानवरों को उनके अपने देश में वापस भेजने में वर्षों लग जाते हैं।

बंदरों की लुप्तप्राय नस्लों की, जो दुनिया के सबसे बुद्धिमान जीवों में से हैं, तस्करी आज के दौर में लाखों डॉलर का कारोबार है। वन्यजीवन कार्यकर्ता कहते हैं कि हर साल विश्व बाजार में हजारों गोरिल्ले, चिंपांजी और ओरांग ओटान की तस्करी होती है। दरअसल छुड़ाए गए वन्यजीवों को लंबे समय तक तस्करों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सुबूत के तौर पर रखा जाता है। नेपाल में छुड़ाए गए चिंपांजियों का मामला भी ऐसा ही है।


नेपाल, भारत और पाकिस्तान के पांच तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए उन्हें काठमांडू में ही रखा गया है। उन पांचों तस्करों को अपनी करतूत के लिए दस साल जेल में काटने पड़ सकते हैं। जांच अधिकारियों के मुताबिक, दो चिंपांजियों समेत सौ से अधिक वन्यजीवों को एक संदिग्ध नाइजीरियाई कंपनी ने भेजा था, जो चिड़ियों और दूसरे वन्यजीवों को तस्करी के जरिये इस्तांबुल, दोहा और कतर आदि देशों में भेजती है। पुलिस का कहना है कि तस्करों की मंशा इन चिंपांजियों को भारत में भेजने की थी, जो वन्यजीवों की तस्करी का एक बड़ा केंद्र बन गया है। हालांकि यह साफ नहीं है कि भारत में इन्हें तस्करी के जरिये भेजने के पीछे मकसद क्या था। नाइजीरियाई अधिकारियों द्वारा इन चिंपांजियों को वापस भेजने की मांग पर नेपाल ने उन्हें कहा है कि जांच पूरी होने तक वे यहीं रहेंगे और इन्हें वापस नाइजीरिया भेजने का शुल्क उस देश को चुकाना होगा। डाउग क्रेस के मुताबिक, अभी इन चिंपांजियों का डीएनए टेस्ट होना है, जिसके बाद यह साफ हो सकेगा कि वे नाइजीरिया के ही हैं या किसी दूसरे अफ्रीकी देश के।

क्रेस की संस्था इन चिंपांजियों को नेपाल के सेंट्रल जू से निकालने की कोशिश में है, क्योंकि वहां उनकी ठीक से देखभाल नहीं हो रही। क्रेस कहते हैं, चिंपांजी बेहद बुद्धिमान और भावुक जीव होते हैं तथा उनकी समय-समय पर छोटे बच्चों की तरह देखभाल करते रहना जरूरी है। सेंट्रल जू के सहायक क्यूरेटर गणेश कोइराला कहते हैं, ‘चिड़ियाघर में इन दो चिंपांजियों के आने से मैं बहुत खुश हूं। इस चिड़ियाघर में इससे पहले 1974 में चिंपांजियों का एक जोड़ा था, जिन्हें अमेरिका ने उपहार में दिया था। इन्हें नाइजीरिया नहीं भेजा चाहिए। हम इनकी अच्छी तरह देखभाल करने में सक्षम हैं।’ 
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