गणतंत्र दिवस 2020: कश्मीरी पंडितों की एक पीढ़ी बर्बाद हो गई, दूसरी जड़ों से कट गई, पढ़ें खास रिपोर्ट
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देश का गणतंत्र जब 70 साल पूरे कर रहा है, तो एक दुखद अध्याय के भी 30 साल पूरे हो रहे हैं। अपने ही घर से कश्मीरी पंडितों का निष्कासन, वह भी सिर्फ मजहब के आधार पर, देश की ऐसी हकीकत है, जो शर्मसार करती है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति और ताजा फिल्म ‘शिकारा’ के बहाने पंडितों की व्यथा-कथा फिर चर्चा के केंद्र में है। गणतंत्र दिवस पर अमर उजाला उस व्यथा को साझा कर रहा है। जम्मू से बविंद्र वशिष्ठ और नई दिल्ली से मनीष कुमार सिंह की खास रिपोर्ट...
बिना कुसूर घर-गांव छोड़ने को मजबूर कश्मीरी पंडितों की एक नहीं, दो-दो पीढ़ियां प्रभावित हुई हैं। विस्थापन के दंश के चलते उस दौर के कई युवा और किशोर अपने सपनों को अाकार नहीं दे पाए। वे न पढ़ाई कर सके, न उन्हें नौकरी मिल पाई। बिगड़े माहौल में दर-ब-दर हुए परिवार को समेटने और जरूरतें पूरी करने में ही वक्त निकल गया। अब न नौकरी की उम्र बची है, न ही कोई काम-धंधा।
सरकार की मदद से घर चल रहा है, लेकिन इस पीढ़ी को सपने साकार नहीं कर पाने की टीस है। इनसे आगे की पीढ़ी पर भी 1990 के पलायन का असर पड़ा। पढ़ाई व रोजगार की तलाश में बाहर निकली पीढ़ी जड़ों से ही कट गई है। जम्मू में जगती माइग्रेंट कॉलोनी में रह रहे 46 साल के रवि कुमार कौल कहते हैं, जब उनका परिवार कश्मीर से निकला था, तो उनकी उम्र 16 साल थी।
पढ़ाई छूट गई। जरूरतें पूरी करने को छोटा-मोटा काम किया, लेकिन वो भी ज्यादा नहीं चला। अब जैसे-तैसे परिवार चला रहे हैं। इसी कॉलोनी में रह रहे 48 साल के टकिंद्र धर भी विस्थापन से व्यथित हैं। कहते हैं, जवाहर नगर में पिता की अच्छी दुकान थी। 19 जनवरी 1990 की रात को पूरे परिवार को सब कुछ छोड़ पलायन करना पड़ा। उस समय उनकी उम्र 18 साल थी। पढ़ने का शौक था, लेकिन बदली परिस्थितियों में इसे आगे नहीं बढ़ा सका।
जम्मू में आकर पांच सौ रुपये की नौकरी कर ली। अब फोटोग्राफी का छोटा-मोटा काम करता हूं। इसे बढ़ाना चाहता हूं, लेकिन बैंक वाले कहते हैं जमीन के दस्तावेज लाओ तो लोन मिलेगा। कश्मीर में जमीन थी, उस पर लोगों ने कब्जा कर लिया है। घर बर्बाद हो चुका है। पलायन के समय 26 साल के रहे हवा कदल के राजकुमार कहते है- कश्मीर छोड़ते समय सोचा था कि हालात सुधरते ही तीन माह में लौट आएंगे, लेकिन आज तीस साल हो गए। जो युवावस्था में सपने देखे थे, वे साकार नहीं हो सके। ऐसी ही कहानियां कश्मीरी पंडित समुदाय के हजारों लोगों की हैं।
कश्मीरी पंडितों का तीन स्तर पर हुआ जनसंहार
1984 दंगों की तरह खोले जाएं कश्मीर त्रासदी केस
1984 के सिख दंगों के केस दोबारा खुल सकते हैं तो 1990 में कश्मीरी पंडितों पर जुल्म के केस क्यों नहीं खुल सकते? अनुच्छेद 370 हटाने से पहले जो कदम उठाए गए, ऐसे कदम 1990 में उठाए होते तो कश्मीरी पलायन करने को मजबूर नहीं होते। बड़ा सवाल यह है कि कश्मीरी पंडितों का कसूर क्या है? घाटी में पंडितों को बेरहमी से मारने वाले सार्वजनिक तौर पर अपना जुर्म कुबूल चुके हैं, पर आजतक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। गृहमंत्री से मुलाकात कर मैंने इस मसले को उठाया था, लेकिन कार्रवाई का इंतजार है। पंडितों के विस्थापन के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या तत्कालीन सरकार और प्रशासन का हाथ था? किसकी शह पर आतंक का नंगा नाच हुआ? इसकी जांच होनी चाहिए। केंद्र सरकार को श्वेतपत्र लाना चाहिए, तब ही इंसाफ मिल पाएगा। - एडवोकेट रविंद्र रैना, अध्यक्ष, ऑल स्टेट कश्मीरी पंडित कॉन्फ्रेंस