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Report: पांच दिन की हीटवेव बन सकती है 30 हजार मौतों की वजह, भीषण गर्मी के बीच आई डराने वाली रिपोर्ट; NGT सख्त
Fri, 29 May 2026 03:44 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Fri, 29 May 2026 03:44 PM IST
सार
Report On India Heatwave Deaths: भारत में बढ़ती भीषण गर्मी अब बड़ा स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। एक नए अध्ययन के अनुसार, देश में एक दिन की अत्यधिक गर्मी से करीब 3400 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जबकि पांच दिन की हीटवेव लगभग 30 हजार लोगों की जान ले सकती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में शामिल हैं।
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लू का भयंकर प्रकोप।
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
देश में लगातार बढ़ती भीषण गर्मी अब सिर्फ मौसम की परेशानी नहीं, बल्कि बड़ा स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि भारत में एक दिन की अत्यधिक गर्मी से करीब 3400 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जबकि लगातार पांच दिन तक चलने वाली हीटवेव लगभग 30 हजार लोगों की जान ले सकती है। यह अध्ययन अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया बर्कले के इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर के शोधकर्ताओं ने किया है। रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है और लोग भीषण लू का सामना कर रहे हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में गर्मी से होने वाली मौतों का आंकड़ा और तेजी से बढ़ सकता है।
आखिर इस अध्ययन में क्या सामने आया?
शोधकर्ताओं पियूष नारंग और अशोक गाडगिल ने भारत के 10 शहरों में गर्मी से होने वाली मौतों के पुराने आंकड़ों का विश्लेषण कर देशभर के जिलों के लिए अनुमान तैयार किया। यह अध्ययन ‘फ्रंटियर्स इन एनवायरमेंटल हेल्थ’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसमें ‘एक्सेस डेथ’ यानी अतिरिक्त मौतों का आकलन किया गया। इसका मतलब है कि सामान्य परिस्थितियों की तुलना में कितने ज्यादा लोगों की मौत गर्मी के कारण हो सकती है। अध्ययन के अनुसार, पांच दिन की भीषण हीटवेव के दौरान सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में देखने को मिल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल उत्तर प्रदेश में ही पांच दिन की लू के दौरान करीब 8100 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। वहीं अहमदाबाद, जयपुर और सूरत जैसे शहरों में एक ही गर्मी की घटना में 250 से ज्यादा मौतों का खतरा है।
किन राज्यों पर सबसे ज्यादा खतरा बताया गया?
अध्ययन में बताया गया है कि जिन राज्यों की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है, वहीं गर्मी से मौतों का खतरा सबसे ज्यादा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात देश की कुल अतिरिक्त मौतों का 66 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं, जबकि देश की जीडीपी में इनकी हिस्सेदारी केवल 29 प्रतिशत है। शोधकर्ताओं ने कहा कि यह असमानता बेहद चिंताजनक है। इसका मतलब है कि गरीब और कम संसाधनों वाले राज्य गर्मी का सबसे ज्यादा नुकसान झेल रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक देश के शीर्ष 100 जिले, जहां लगभग एक-तिहाई आबादी रहती है, पांच दिन की हीटवेव के दौरान कुल अनुमानित मौतों का 44 प्रतिशत हिस्सा बन सकते हैं। इससे साफ है कि हीटवेव का खतरा केवल जनसंख्या पर नहीं, बल्कि आर्थिक और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरी पर भी निर्भर करता है।
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ये भी पढ़ें- 'एनटीए में 16 नए वरिष्ठ पद सृजित किए': NTA का SC में हलफनामा, बताया नीट लीक के बाद सुधार के लिए क्या कदम उठाए
सरकार के लिए क्या बड़ा संदेश दिया गया?
शोधकर्ताओं ने कहा कि भारत को अब हीटवेव से निपटने के लिए अपनी नीति और फंडिंग मॉडल बदलने होंगे। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी योजनाओं के तहत ज्यादा फंड उन राज्यों को दिया जाए, जहां मौतों का खतरा ज्यादा है। शोधकर्ताओं ने कहा कि सिर्फ आबादी के आधार पर संसाधन बांटना पर्याप्त नहीं होगा। जिन राज्यों के पास स्वास्थ्य सेवाएं, बिजली, पानी और राहत व्यवस्था कमजोर है, वहां विशेष तैयारी जरूरी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दक्षिण एशिया, खासकर भारत, गर्मी से होने वाली मौतों के मामले में दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल होता जा रहा है।
लगातार बढ़ती गर्मी क्यों बन रही है बड़ा खतरा?
पिछले कुछ दिनों से राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में तापमान लगातार 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। मौसम विभाग ने कई जगहों पर भीषण लू की चेतावनी जारी की है। डॉक्टरों के अनुसार, अत्यधिक गर्मी शरीर में पानी की कमी, हीट स्ट्रोक, सांस की परेशानी और दिल संबंधी समस्याओं को तेजी से बढ़ा देती है। सबसे ज्यादा खतरा बुजुर्गों, बच्चों, मजदूरों और पहले से बीमार लोगों को होता है। अध्ययन में कहा गया है कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन के कारण हीटवेव की घटनाएं और ज्यादा गंभीर हो सकती हैं। ऐसे में लोगों को सतर्क रहने, पर्याप्त पानी पीने, दोपहर में बाहर निकलने से बचने और प्रशासन को राहत केंद्र बढ़ाने की जरूरत है।
क्या अब हीटवेव को राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपदा मानने का समय आ गया?
विशेषज्ञों का मानना है कि हीटवेव अब केवल मौसमी घटना नहीं रही। यह तेजी से राष्ट्रीय स्वास्थ्य और आर्थिक संकट का रूप ले रही है। अध्ययन ने साफ संकेत दिया है कि अगर सरकार और समाज ने अभी तैयारी नहीं की, तो आने वाले वर्षों में गर्मी हजारों लोगों की जान ले सकती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना, गरीब इलाकों में ठंडे आश्रय केंद्र बनाना, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना और हीट अलर्ट सिस्टम को बेहतर करना बेहद जरूरी है। भारत जैसे विशाल और घनी आबादी वाले देश में गर्मी से लड़ाई अब सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल होती जा रही है।
एनजीटी ने केंद्र और कई राज्यों से मांगा जवाब
देशभर में बढ़ती भीषण गर्मी और हीटवेव को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सख्त रुख अपनाया है। एनजीटी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड व छत्तीसगढ़ समेत कई राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि हीटवेव अब गंभीर पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य संकट बन चुकी है। एनजीटी ने कहा कि शहरों में प्रदूषण, हरियाली की कमी और बढ़ती बिजली खपत से गर्मी और बढ़ रही है, जबकि गांवों में लोग बिना पर्याप्त सुविधाओं के खुले में काम करने को मजबूर हैं। ट्रिब्यूनल ने सभी पक्षों से एक्शन प्लान और हलफनामा मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी।
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आखिर इस अध्ययन में क्या सामने आया?
शोधकर्ताओं पियूष नारंग और अशोक गाडगिल ने भारत के 10 शहरों में गर्मी से होने वाली मौतों के पुराने आंकड़ों का विश्लेषण कर देशभर के जिलों के लिए अनुमान तैयार किया। यह अध्ययन ‘फ्रंटियर्स इन एनवायरमेंटल हेल्थ’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसमें ‘एक्सेस डेथ’ यानी अतिरिक्त मौतों का आकलन किया गया। इसका मतलब है कि सामान्य परिस्थितियों की तुलना में कितने ज्यादा लोगों की मौत गर्मी के कारण हो सकती है। अध्ययन के अनुसार, पांच दिन की भीषण हीटवेव के दौरान सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में देखने को मिल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल उत्तर प्रदेश में ही पांच दिन की लू के दौरान करीब 8100 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। वहीं अहमदाबाद, जयपुर और सूरत जैसे शहरों में एक ही गर्मी की घटना में 250 से ज्यादा मौतों का खतरा है।
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किन राज्यों पर सबसे ज्यादा खतरा बताया गया?
अध्ययन में बताया गया है कि जिन राज्यों की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है, वहीं गर्मी से मौतों का खतरा सबसे ज्यादा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात देश की कुल अतिरिक्त मौतों का 66 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं, जबकि देश की जीडीपी में इनकी हिस्सेदारी केवल 29 प्रतिशत है। शोधकर्ताओं ने कहा कि यह असमानता बेहद चिंताजनक है। इसका मतलब है कि गरीब और कम संसाधनों वाले राज्य गर्मी का सबसे ज्यादा नुकसान झेल रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक देश के शीर्ष 100 जिले, जहां लगभग एक-तिहाई आबादी रहती है, पांच दिन की हीटवेव के दौरान कुल अनुमानित मौतों का 44 प्रतिशत हिस्सा बन सकते हैं। इससे साफ है कि हीटवेव का खतरा केवल जनसंख्या पर नहीं, बल्कि आर्थिक और स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरी पर भी निर्भर करता है।
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सरकार के लिए क्या बड़ा संदेश दिया गया?
शोधकर्ताओं ने कहा कि भारत को अब हीटवेव से निपटने के लिए अपनी नीति और फंडिंग मॉडल बदलने होंगे। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी योजनाओं के तहत ज्यादा फंड उन राज्यों को दिया जाए, जहां मौतों का खतरा ज्यादा है। शोधकर्ताओं ने कहा कि सिर्फ आबादी के आधार पर संसाधन बांटना पर्याप्त नहीं होगा। जिन राज्यों के पास स्वास्थ्य सेवाएं, बिजली, पानी और राहत व्यवस्था कमजोर है, वहां विशेष तैयारी जरूरी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दक्षिण एशिया, खासकर भारत, गर्मी से होने वाली मौतों के मामले में दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल होता जा रहा है।
लगातार बढ़ती गर्मी क्यों बन रही है बड़ा खतरा?
पिछले कुछ दिनों से राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में तापमान लगातार 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। मौसम विभाग ने कई जगहों पर भीषण लू की चेतावनी जारी की है। डॉक्टरों के अनुसार, अत्यधिक गर्मी शरीर में पानी की कमी, हीट स्ट्रोक, सांस की परेशानी और दिल संबंधी समस्याओं को तेजी से बढ़ा देती है। सबसे ज्यादा खतरा बुजुर्गों, बच्चों, मजदूरों और पहले से बीमार लोगों को होता है। अध्ययन में कहा गया है कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन के कारण हीटवेव की घटनाएं और ज्यादा गंभीर हो सकती हैं। ऐसे में लोगों को सतर्क रहने, पर्याप्त पानी पीने, दोपहर में बाहर निकलने से बचने और प्रशासन को राहत केंद्र बढ़ाने की जरूरत है।
क्या अब हीटवेव को राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपदा मानने का समय आ गया?
विशेषज्ञों का मानना है कि हीटवेव अब केवल मौसमी घटना नहीं रही। यह तेजी से राष्ट्रीय स्वास्थ्य और आर्थिक संकट का रूप ले रही है। अध्ययन ने साफ संकेत दिया है कि अगर सरकार और समाज ने अभी तैयारी नहीं की, तो आने वाले वर्षों में गर्मी हजारों लोगों की जान ले सकती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना, गरीब इलाकों में ठंडे आश्रय केंद्र बनाना, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना और हीट अलर्ट सिस्टम को बेहतर करना बेहद जरूरी है। भारत जैसे विशाल और घनी आबादी वाले देश में गर्मी से लड़ाई अब सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल होती जा रही है।
एनजीटी ने केंद्र और कई राज्यों से मांगा जवाब
देशभर में बढ़ती भीषण गर्मी और हीटवेव को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सख्त रुख अपनाया है। एनजीटी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड व छत्तीसगढ़ समेत कई राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि हीटवेव अब गंभीर पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य संकट बन चुकी है। एनजीटी ने कहा कि शहरों में प्रदूषण, हरियाली की कमी और बढ़ती बिजली खपत से गर्मी और बढ़ रही है, जबकि गांवों में लोग बिना पर्याप्त सुविधाओं के खुले में काम करने को मजबूर हैं। ट्रिब्यूनल ने सभी पक्षों से एक्शन प्लान और हलफनामा मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी।