पढ़िए राफेल सौदे की पूरी राजनीतिक लड़ाई, राहुल के आरोप से जेटली के पलटवार तक
अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि भारत फ्रांसीसी विमान निर्माता और इंटीग्रेटर कंपनी से 36 राफेल लड़ाकू विमानों को खरीदेगा। राफेल को 2012 में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और रूस से प्रतिद्वंद्वी प्रस्तावों पर चुना गया था। मूल योजना यह थी कि भारत फ्रांस से 18 ऑफ द शेल्फ जेट खरीदेगा, जिसमें 108 अन्य लोगों को राज्य संचालित हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड या बंगलूरू में एचएएल द्वारा भारत में इकट्ठा किया जा रहा है।
एनडीए सरकार का दावा
हालांकि, मोदी की अगुआई वाली भाजपा सरकार ने पिछली यूपीए सरकार की 126 राफेल खरीदने की प्रतिबद्धता से पीछे हटकर कहा कि डबल इंजन वाले विमान बहुत महंगे होंगे और यह समझौता भारत और फ्रांस के बीच लगभग एक दशक लंबी वार्ता के बाद हुआ था। विमान की लागत पर पहले से ही बहुत हिचकिचाहट थी। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हस्तक्षेप किया और फ्रांस से प्रौद्योगिकी हासिल करने की कोशिश करने और इसे बनाने के बजाय 36 "रेडी-टू-फ्लाई" विमान खरीदने की बात कही।
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एनडीए सरकार ने दावा किया कि यह सौदा उसने यूपीए से ज्यादा बेहतर कीमत में किया है और करीब 12,600 करोड़ रुपये बचाए हैं। लेकिन 36 विमानों के लिए हुए सौदे की लागत का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया। सौदा घोषित होने के तुरंत बाद, कांग्रेस ने भाजपा पर अरबों डॉलर के सौदे में गैर-पारदर्शिता का आरोप लगाया और इसे 'मेक-इन-इंडिया' कार्यक्रम का "सबसे बड़ी विफलताओं में से एक" कहा। जनवरी 2016 में, भारत ने फ्रांस के साथ रक्षा सौदे में 36 राफेल जेटों के आदेश की पुष्टि की और इस सौदे के तहत, डेसॉल्ट और इसके मुख्य सहयोगियों के साथ कुछ तकनीक साझा करने की बात कही।
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डबल इंजन राफेल लड़ाकू जेट को शुरुआत से ही एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड अटैक के लिए बहु-भूमिका सेनानी के रूप में डिजाइन किया गया है, परमाणु रूप से सक्षम है और इसका पुनर्निर्माण भी किया जा सकता है। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस की यात्रा के दौरान प्रस्ताव की घोषणा के करीब डेढ़ साल बाद अंततः सितंबर 2016 में फ्रांस के साथ एक अंतर सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसे "राफेल सौदा" कहा जाता है। इसमें भारत ने 36 राफेल डबल-इंजन के लिए 58,000 करोड़ रुपये खर्च दिए। इस लागत का लगभग 15 प्रतिशत अग्रिम भुगतान किया गया। इस समझौते के मुताबिक, भारत को मिसाइल समेत स्पेयर और हथियार भी मिलने की डील हुई।
राफेल पर कांग्रेस का आरोप
नवंबर 2016 में, राफेल सौदे पर एक राजनीतिक युद्ध शुरू हुआ और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार ने करदाताओं के पैसे को नुकसान पहुंचाया है, इस सौदे में बड़ी धांधली हुई है। कांग्रस ने दावा किया कि अनिल अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को फ्रांसीसी फर्म के साथी के रूप में गलत तरीके से चुना गया था। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि 2012 में फ्रांस के साथ पिछली यूपीए सरकार से हुई बातचीत के मुकाबले भाजपा के सौदे में प्रत्येक विमान की लागत तीन गुना अधिक है।
यूपीए सरकार के दौरान इस पर समझौता नहीं हो पाया, क्योंकि खासकर तकनीक ट्रांसफर के मामले में दोनों पक्षों में गतिरोध बन गया था। डेसॉल्ट एविएशन भारत में बनने वाले 108 विमानों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थी। डेसॉल्ट का कहना था कि भारत में विमानों के उत्पादन के लिए 3 करोड़ मानव घंटों की जरूरत होगी, लेकिन एचएएल ने इसके तीन गुना ज्यादा मानव घंटों की जरूरत बताई, जिसके कारण लागत कई गुना बढ़ जानी थी।
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रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और अनिल अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस डिफेंस लिमिटेड ने भी इस मामले पर सफाई दी थी। सरकार ने दावा किया कि पिछले यूपीए सरकार से इस बार समझौता और पारदर्शी और बेहतर है क्योंकि इसमें एक बेहतर हथियार पैकेज और सैन्य सहायता शामिल है। हालांकि, कांग्रेस ने कथित अनियमितताओं पर राफेल सौदे के बारे में जानकारी देने से इनकार करने के लिए सरकार पर अपने हमलों को बरकरार रखा।
राहुल गांधी ने केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश यहीं से शुरू कर दी। उन्होंने ट्वीट करके डील के बारे में कई सवाल किए। उन्होंने लिखा कि 'कृपया बताइए कि राफेल जेट को किस कीमत पर खरीदा गया? क्या आपने कैबिनेट कमिटी ऑफ सिक्यॉरिटी (सीसीएस) की अनुमति लेना जरूरी नहीं समझा? भारत सरकार के उपक्रम हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से ये डील छीनकर रक्षा क्षेत्र में बिना अनुभव वाले डबल ए रेटेड बिजनेसमैन को क्यों सौंपी गई?'
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गरमाता रहा मुद्दा
गुजरात चुनाव से पहले राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया था कि वह गुजरात में विधानसभा चुनाव से पहले राफेल सौदे और जय शाह की सच्चाई को सामने नहीं लाना चाहते हैं। यही वजह है कि संसद के शीत सत्र को देरी से शुरू किया गया। इसी क्रम में उन्होंने पीएम मोदी से तीन सवाल पूछे थे। उन्होंने पूछा था कि क्या फ्रांसीसी कंपनी के साथ पहले और दूसरे सौदे में राफेल विमान की कीमत में कोई फर्क आया है?
उनका दूसरा सवाल था कि क्या सौदे के अनुसार भारत ने इस विमान के लिए पहले के मुकाबले कम या ज्यादा कीमत चुकाई है और क्या जिस उद्योगपति को यह कांट्रैक्ट दिया गया है, उसकी कंपनी ने कभी विमान बनाए हैं? इनसे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार ने सौदा करते समय सभी स्थापित प्रक्रियाओं का पालन किया है? क्या सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी से इसकी मंजूरी ली गई थी?
लगातार इसी तरह कई सवाल पूछने के साथ ही राहुल ने राफेल सौदे पर सही कीमत के कई कयास लगाए। देखते-देखते राहुल के साथ पूरी पार्टी राफेल सौदा मामले में भाजपा पर आक्रामक हो गई। इसी बीच राफेल सौदे को लेकर देश भर में प्रेस कांफ्रेस कर रही कांग्रेस ने एक बार फिर सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। दिल्ली में कांग्रेस ने पूर्व केंद्रीय मंत्री एस. जयपाल रेड्डी ने कहा कि मेरे विचार में यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अनिल अंबानी के बीच सीधा सौदा है। मैं जिम्मेदार तरीके से विरोध कर रहा हूं मेरे पास इसका आधार है। रेड्डी ने कहा कि पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के चलते सात दिनों के शोक के चलते वे इस मुद्दे को उठाना नहीं चाहते थे।
होने लगा पलटवार
इसी तरह के लगातार आरोपों के चलते रिलायंस ग्रुप के चेयरमैन अनिल अंबानी ने पंजाब कांग्रेस के प्रधान व सासंद सुनील जाखड़ समेत 8 कांग्रेस नेताओं को नोटिस भेज दिए। लेकिन सुनील जाखड़ ने यह कहते हुए इस नोटिस के कागज का जहाज बना दिया कि जिस अनिल अंबानी को कागज का जहाज बनाना नहीं आता वह राफेल विमान क्या बनाएंगे।
खास बात यह भी है कि अनिल अंबानी द्वारा जाखड़ के अलावा रणदीप सुरजेवाला, अशोक चव्हाण, संजय निरुपम, अनुराग नारायण सिंह, उमैन चंडी, गोहल, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रियंका चतुर्वेदी को नोटिस भेजे गए। हालांकि, इस सूची में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम नहीं था।
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तो आज अरुण जेटली ने सवाल दागा कि क्या इस डील में देरी के कारण ही भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर शंका नहीं खड़ी हुई। जेटली ने सीधे राहुल गांधी पर भी सवाल दागा। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने कई बार सरकार पर आरोप लगाते हुए राफेल के अलग-अलग दामों का जिक्र किया है। क्या राहुल गांधी को तथ्यों की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि सच सिर्फ एक होता है, लेकिन झूठ के कई चेहरे होते हैं।
जेटली ने कहा कि 2007 के राफेल ऑफर को लेकर राहुल गांधी खुद अपनी अलग-अलग स्पीच में 7 तरह के दाम बता चुके हैं। जेटली ने कहा कि कांग्रेस और राहुल गांधी जिस तरह की बात कर रहे हैं, वह प्राइमरी स्कूल के स्तर की डिबेट है। वित्त मंत्री ने कहा कि 2007 के मुकाबले 2015 में हुई राफेल डील रेट्स के मुकाबले कहीं बेहतर है।