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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: क्या मूल संगठन में महिलाओं को शामिल करने की तैयारी है, भागवत के दशहरा भाषण पर नजर
Wed, 13 Oct 2021 06:52 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Wed, 13 Oct 2021 06:52 PM IST
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
- फोटो :
फाइल फोटो
विस्तार
बीते कुछ दिनों पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम में कहा कि संघ का उद्देश्य हिन्दू समाज को एकजुट करना है, लेकिन जब हम कार्यक्रम आयोजित कराते हैं तो हमें सिर्फ पुरुष दिखाई देते हैं। अगर हमें पूरे समाज को संगठित करना है तो इन कार्यक्रमों में कम से कम 50 फीसदी महिलाओं को शामिल होना पड़ेगा। संघ प्रमुख के इस बयान का कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने यह अनुमान लगाया है कि क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने मूल संगठन में महिलाओं को प्रवेश देने की तैयारी में है? क्या भागवत के इस बयान को उनके प्रारंभिक संकेत के तौर पर समझा जाए कि संघ का मूल संगठन ‘सिर्फ पुरुषों के लिए’ नहीं रहने वाला है।सवाल क्यों?
संघ में महिलाओं की भूमिका और उनकी हिस्सेदारी को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। संघ में महिलाओं के साथ काम करने या प्रवेश को लेकर शुरु से ही हिचक रही है। संघ के दूसरे सहयोगी संगठन विद्यार्थी परिषद, भाजपा और अन्य संगठनों में महिलाओं की न केवल हिस्सेदारी है बल्कि वे पदाधिकारी भी हैं, लेकिन संघ के मूल संगठन में अब भी महिलाएं शामिल नहीं है।
संघ को जानने वाले बताते हैं कि संघ ने समाज के बदलावों को बखूबी समझा है और वक्त के साथ चलने की कोशिश की है। यहां तक कि समाज और परिवार के स्तर पर जो बदलाव हो रहे हैं उसे भी संघ स्वीकार कर रहा है लेकिन सौ साल पूरे होने वाले इस संगठन में अब भी महिलाओं की भूमिका को लेकर चर्चा ही चल रही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में पूर्ण गणवेश में भाग लेते स्वयंसेवक (फाइल फोटो)
महिलाओं का प्रवेश मुश्किल
संघ को जानने वाले एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि इस बात की संभावना बेहद कम है कि संघ अपने मूल संगठन में महिलाओं को प्रवेश देगा क्योंकि उसका यह मानना है कि यह पुरुषों का पूर्णकालिक संगठन है और महिलाओं के लिए अलग संगठन है। इसलिए उसमें घालमेल करना ठीक नहीं।
वे कहते हैं कि यही सवाल संघ की शाखाओं में महिलाओं के शामिल नहीं होने पर भी उठता रहता है। केशव बलिराम हेडगेवार यह मानते थे कि संघ की शाखा में खुले मैदान में शारीरिक प्रशिक्षण होता है, इसलिए महिलाओं को इसमें शामिल करना ठीक नहीं है, इसलिए महिलाएं मूल संगठन में शामिल नहीं की जा सकीं। लेकिन संघ ने महिलाओं के लिए एक अलग संगठन बनाकर यह साफ कर दिया कि वह महिला विरोधी नहीं है।
संघ के बहुत से विभागों जैसे सेवा विभाग, सम्पर्क विभाग, प्रचार विभाग, गोरक्षा, धार्मिक कार्यक्रम और कुटुंब गतिविधियों में बहुत महिलाएं काम कर रही हैं। लेकिन फिर भी इतना कहा जा सकता है कि भले ही संघ को महिला विरोधी नहीं माना जाएगा लेकिन महिलाएं यहां निर्णायक भूमिका में नहीं होती है। जबकि विदेशों में जो संघ की शाखाएं हैं वे पारिवारक शाखाएं हैं। उसमें पूरा परिवार शामिल होता है। इसी तरह पुणे में भी परिवार शाखा की शुरूआत हुई है। संघ का मानना था कि इससे उसकी 'सिर्फ पुरुषों के लिए' वाली छवि बदलेगी।
राहुल गांधी उठाते रहे हैं सवाल
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी हमेशा संघ के मूल संगठन में महिलाओं के नहीं होने पर संघ को निशाने पर लेते रहे हैं। उनका आरोप रहा है कि संघ महिलाओं के साथ भेदभाव करता है, इसलिए वे न तो संघ में है और संघ की शाखाओं में शामिल होती हैं।
संघ को जानने वाले एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि इस बात की संभावना बेहद कम है कि संघ अपने मूल संगठन में महिलाओं को प्रवेश देगा क्योंकि उसका यह मानना है कि यह पुरुषों का पूर्णकालिक संगठन है और महिलाओं के लिए अलग संगठन है। इसलिए उसमें घालमेल करना ठीक नहीं।
वे कहते हैं कि यही सवाल संघ की शाखाओं में महिलाओं के शामिल नहीं होने पर भी उठता रहता है। केशव बलिराम हेडगेवार यह मानते थे कि संघ की शाखा में खुले मैदान में शारीरिक प्रशिक्षण होता है, इसलिए महिलाओं को इसमें शामिल करना ठीक नहीं है, इसलिए महिलाएं मूल संगठन में शामिल नहीं की जा सकीं। लेकिन संघ ने महिलाओं के लिए एक अलग संगठन बनाकर यह साफ कर दिया कि वह महिला विरोधी नहीं है।
संघ के बहुत से विभागों जैसे सेवा विभाग, सम्पर्क विभाग, प्रचार विभाग, गोरक्षा, धार्मिक कार्यक्रम और कुटुंब गतिविधियों में बहुत महिलाएं काम कर रही हैं। लेकिन फिर भी इतना कहा जा सकता है कि भले ही संघ को महिला विरोधी नहीं माना जाएगा लेकिन महिलाएं यहां निर्णायक भूमिका में नहीं होती है। जबकि विदेशों में जो संघ की शाखाएं हैं वे पारिवारक शाखाएं हैं। उसमें पूरा परिवार शामिल होता है। इसी तरह पुणे में भी परिवार शाखा की शुरूआत हुई है। संघ का मानना था कि इससे उसकी 'सिर्फ पुरुषों के लिए' वाली छवि बदलेगी।
राहुल गांधी उठाते रहे हैं सवाल
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी हमेशा संघ के मूल संगठन में महिलाओं के नहीं होने पर संघ को निशाने पर लेते रहे हैं। उनका आरोप रहा है कि संघ महिलाओं के साथ भेदभाव करता है, इसलिए वे न तो संघ में है और संघ की शाखाओं में शामिल होती हैं।
धर्मपुर में भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश कार्य समिति की बैठक (फाइल फोटो )
- फोटो :
अमर उजाला
महिलाओं के लिए दरवाजा खोल दे संघ
संघ को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं कि यदि वे चाहते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों में महिलाओं की संख्या 50 फीसदी हो तो पहले उन्हें अपने मूल संगठन में जोड़ना होगा। संघ को अब महिलाओं के लिए दरवाजा खोल देना चाहिए। यानी संघ की मुख्यधारा में महिलाओं की एंट्री हो तभी तो ऐसा हो सकता है। क्यों संघ महिलाओं को मुख्यधारा में शामिल नहीं करता, अखिल भारतीय कार्यकारिणी मंडल में भागीदारी नहीं देता है।
उनका मानना है कि ऐसा दरअसल इसलिए होता है क्योंकि पितृसत्तामक समाज में महिलाओं को साज-सज्जा की वस्तु समझा जाता है। महिलाओं की संख्या बढ़नी चाहिए यह इसलिए बोला गया है क्योंकि यह राजनीतिक तौर पर सही है लेकिन महिलाएं इसलिए शामिल नहीं की जाएंगी क्योंकि सत्ता में बंटवारा होने का डर है। वे मानते हैं कि उन्हें फिलहाल इस बात की कोई संभावना नजर नहीं आती कि संघ में महिलाएं मुख्यधारा में शामिल होंगी क्योंकि महिलाओं के लिए अलग संगठन की बात करके हमेशा इस सवाल से बचने की कोशिश की गई है।
बदलाव क्यों नहीं हो सकता
लेकिन संघ के एक प्रचारक का कहना है कि मूल आरएसएस में महिलाओं के प्रवेश को लेकर अभी न तो कोई चर्चा है और न विचार चल रहा है, लेकिन बदलाव क्यों नहीं हो सकता? क्या आपने रातों-रात कुछ बदलते देखा है। अभी तक तो एनडीए में महिलाएं शामिल नहीं हो सकती थीं लेकिन अब तो हो सकती हैं। कोई भी बदलाव होने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है।
संघ को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं कि यदि वे चाहते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों में महिलाओं की संख्या 50 फीसदी हो तो पहले उन्हें अपने मूल संगठन में जोड़ना होगा। संघ को अब महिलाओं के लिए दरवाजा खोल देना चाहिए। यानी संघ की मुख्यधारा में महिलाओं की एंट्री हो तभी तो ऐसा हो सकता है। क्यों संघ महिलाओं को मुख्यधारा में शामिल नहीं करता, अखिल भारतीय कार्यकारिणी मंडल में भागीदारी नहीं देता है।
उनका मानना है कि ऐसा दरअसल इसलिए होता है क्योंकि पितृसत्तामक समाज में महिलाओं को साज-सज्जा की वस्तु समझा जाता है। महिलाओं की संख्या बढ़नी चाहिए यह इसलिए बोला गया है क्योंकि यह राजनीतिक तौर पर सही है लेकिन महिलाएं इसलिए शामिल नहीं की जाएंगी क्योंकि सत्ता में बंटवारा होने का डर है। वे मानते हैं कि उन्हें फिलहाल इस बात की कोई संभावना नजर नहीं आती कि संघ में महिलाएं मुख्यधारा में शामिल होंगी क्योंकि महिलाओं के लिए अलग संगठन की बात करके हमेशा इस सवाल से बचने की कोशिश की गई है।
बदलाव क्यों नहीं हो सकता
लेकिन संघ के एक प्रचारक का कहना है कि मूल आरएसएस में महिलाओं के प्रवेश को लेकर अभी न तो कोई चर्चा है और न विचार चल रहा है, लेकिन बदलाव क्यों नहीं हो सकता? क्या आपने रातों-रात कुछ बदलते देखा है। अभी तक तो एनडीए में महिलाएं शामिल नहीं हो सकती थीं लेकिन अब तो हो सकती हैं। कोई भी बदलाव होने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है।
राष्ट्र सेविका समिति द्वारा पथ संचलन में शामिल सेविकायें (फाइल फोटो)
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अमर उजाला
संघ में महिलाएं-पुरुष बराबर
संघ को समझने वाले जानकार बताते हैं कि संघ महिलाओं और पुरुषों को बराबर समझता है और परिवार में महिलाओं की स्थिति और भ्रूण हत्या के खिलाफ है। लेकिन फिर भी संघ में महिलाओं को नहीं देखकर ऐसा माना जाता है कि संघ केवल पुरुषों का संगठन है। विकल्प के तौर पर डॉ हेडगेवार ने न केवल महिलाओं के लिए ‘राष्ट्र सेविका समिति’ बनाने की केवल मंजूरी दी थी बल्कि इस संगठन को मजबूत करने के लिए भी काम किया। उन्होंने 1936 में 27 साल की एक विधवा लक्ष्मीबाई केलकर को राष्ट्र सेविका समिति बनाने के लिए कहा जो संघ की भावना के मुताबिक हो।
समिति में सभी पदों पर महिलाएं
समिति में भी पूर्णकालिक प्रचारक की तरह प्रचारिका बनाई गईं। समिति में सभी पदों पर सिर्फ महिलाएं ही होती है। इस समय समिति के सदस्य देश भर में फैले हैं। इसकी भारत में 4,900 और 16 देशों में शाखाएं हैं। लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा महाजन इस समिति की प्रमुख सदस्यों में रही। उनका मानना रहा है कि महिलाएं संघ में बराबरी पर हैं। आजादी के वक्त भी राष्ट्र सेविका समिति की सदस्यों की भूमिका रही।
भागवत ने दिया था जवाब
2018 में विज्ञान भवन में हुए संघ के व्याख्यानमाला कार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ को महिला विरोधी बताने वालों को जवाब देते हुए राष्ट्र सेविका समिति का जिक्र किया था। उन्होंने कहा ऐसा वे लोग कहते हैं कि जो संघ की गतिविधियों को लेकर भ्रम के शिकार हैं। उन्होंने कहा कि संघ में महिलाओं के लिए समानांतर एक संगठन है। वे संघ की गतिविधियों में बराबरी से सक्रिय रहती हैं। पिछले सप्ताह रांची में एक सवाल के जवाब में भी उन्होंने कहा अधिक से अधिक महिलाएं संघ कार्य से जुड़ें ऐसी हमारी अपेक्षा है। इसके लिए राष्ट्र सेविका समिति का गठन किया गया है। इससे जुड़कर महिलाएं संघ का कार्य कर सकती हैं।
संघ को समझने वाले जानकार बताते हैं कि संघ महिलाओं और पुरुषों को बराबर समझता है और परिवार में महिलाओं की स्थिति और भ्रूण हत्या के खिलाफ है। लेकिन फिर भी संघ में महिलाओं को नहीं देखकर ऐसा माना जाता है कि संघ केवल पुरुषों का संगठन है। विकल्प के तौर पर डॉ हेडगेवार ने न केवल महिलाओं के लिए ‘राष्ट्र सेविका समिति’ बनाने की केवल मंजूरी दी थी बल्कि इस संगठन को मजबूत करने के लिए भी काम किया। उन्होंने 1936 में 27 साल की एक विधवा लक्ष्मीबाई केलकर को राष्ट्र सेविका समिति बनाने के लिए कहा जो संघ की भावना के मुताबिक हो।
समिति में सभी पदों पर महिलाएं
समिति में भी पूर्णकालिक प्रचारक की तरह प्रचारिका बनाई गईं। समिति में सभी पदों पर सिर्फ महिलाएं ही होती है। इस समय समिति के सदस्य देश भर में फैले हैं। इसकी भारत में 4,900 और 16 देशों में शाखाएं हैं। लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा महाजन इस समिति की प्रमुख सदस्यों में रही। उनका मानना रहा है कि महिलाएं संघ में बराबरी पर हैं। आजादी के वक्त भी राष्ट्र सेविका समिति की सदस्यों की भूमिका रही।
भागवत ने दिया था जवाब
2018 में विज्ञान भवन में हुए संघ के व्याख्यानमाला कार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ को महिला विरोधी बताने वालों को जवाब देते हुए राष्ट्र सेविका समिति का जिक्र किया था। उन्होंने कहा ऐसा वे लोग कहते हैं कि जो संघ की गतिविधियों को लेकर भ्रम के शिकार हैं। उन्होंने कहा कि संघ में महिलाओं के लिए समानांतर एक संगठन है। वे संघ की गतिविधियों में बराबरी से सक्रिय रहती हैं। पिछले सप्ताह रांची में एक सवाल के जवाब में भी उन्होंने कहा अधिक से अधिक महिलाएं संघ कार्य से जुड़ें ऐसी हमारी अपेक्षा है। इसके लिए राष्ट्र सेविका समिति का गठन किया गया है। इससे जुड़कर महिलाएं संघ का कार्य कर सकती हैं।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के प्रांतीय सम्मेलन में उमड़े लोग (फाइल फोटो)
- फोटो :
amarujala
महिलाओं की आवाज सुनाई क्यों नहीं देती
संघ की मुख्यधारा में महिलाओं के शामिल होने के बारे में महिलाएं आवाज क्यों नहीं उठातीं? क्या वे अलग संगठन में रहकर खुश हैं? इसके जवाब में समिति से जुड़ी एक पदाधिकारी का कहना है कि संघ से जुड़ी महिलाएं वामपंथी महिलाओं की तरह आजादी -आजादी के नारे नहीं लगाती हैं। यह बात पहले से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पुरुषों का संगठन हैं तो भला इसमें महिलाएं कैसे शामिल हो सकती हैं? जैसे सिर्फ लड़कों के स्कूल या कॉलेज में लड़कियां पढ़ने नहीं जा सकतीं उसी तरह पुरुषों के संगठन में महिलाएं कैसे भागीदार बन सकती हैं? समिति अलग-अलग क्षेत्रों में काम करह हैं और महिलाओं से जुड़े मुद्दे पर ध्यान देती हैं।
'सेवक' शब्द को जेंडर न्यूट्रल बना दें
समिति के एक अन्य सदस्य का कहना है कि यदि सिर्फ ‘सेवक’ शब्द की एक बड़ी बाधा है और इसी कारण संघ की मुख्यधारा के संगठन में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है, तो इसे ‘जेंडर न्यूट्रल’ भी तो बनाया जा सकता है। महिला-पुरुष दोनों क्रिकेट खेलते हैं इसलिए अब नया शब्द ‘बैटर’ चलन में आया है। इसी तरह संघ चाहे तो सेवक को जेंडर न्यूट्रल शब्द माना जा सकता है और महिलाओं के लिए मुख्यधारा के संगठन में प्रवेश का रास्ता खोला जा सकता है। बदलाव कैसे करना है और कब करना है तो यह संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी ही जानते हैं लेकिन महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को देखते हुए अब उन्हें भी मुख्यधारा में लाने की कोशिश जरूर होनी चाहिए।
संघ की मुख्यधारा में महिलाओं के शामिल होने के बारे में महिलाएं आवाज क्यों नहीं उठातीं? क्या वे अलग संगठन में रहकर खुश हैं? इसके जवाब में समिति से जुड़ी एक पदाधिकारी का कहना है कि संघ से जुड़ी महिलाएं वामपंथी महिलाओं की तरह आजादी -आजादी के नारे नहीं लगाती हैं। यह बात पहले से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पुरुषों का संगठन हैं तो भला इसमें महिलाएं कैसे शामिल हो सकती हैं? जैसे सिर्फ लड़कों के स्कूल या कॉलेज में लड़कियां पढ़ने नहीं जा सकतीं उसी तरह पुरुषों के संगठन में महिलाएं कैसे भागीदार बन सकती हैं? समिति अलग-अलग क्षेत्रों में काम करह हैं और महिलाओं से जुड़े मुद्दे पर ध्यान देती हैं।
'सेवक' शब्द को जेंडर न्यूट्रल बना दें
समिति के एक अन्य सदस्य का कहना है कि यदि सिर्फ ‘सेवक’ शब्द की एक बड़ी बाधा है और इसी कारण संघ की मुख्यधारा के संगठन में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है, तो इसे ‘जेंडर न्यूट्रल’ भी तो बनाया जा सकता है। महिला-पुरुष दोनों क्रिकेट खेलते हैं इसलिए अब नया शब्द ‘बैटर’ चलन में आया है। इसी तरह संघ चाहे तो सेवक को जेंडर न्यूट्रल शब्द माना जा सकता है और महिलाओं के लिए मुख्यधारा के संगठन में प्रवेश का रास्ता खोला जा सकता है। बदलाव कैसे करना है और कब करना है तो यह संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी ही जानते हैं लेकिन महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को देखते हुए अब उन्हें भी मुख्यधारा में लाने की कोशिश जरूर होनी चाहिए।