त्वरित टिप्पणी: अम्बेडकर को राम से जोड़ने की बेताबी क्यों
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बाबा साहेब के नाम में राम जुड़ने की खबर आने के बाद लगता है देश में रामराज्य आ ही गया। राम की जन्मस्थली है उत्तर प्रदेश और राज्यपाल हैं राम नाईक। राम नाईक साहब मूल रूप से महाराष्ट्र के हैं। इतने साल महाराष्ट्र में रहे और केन्द्र में तमाम मंत्रालय देखे और अब राम के प्रदेश के पिछले चार साल से महामहिम हैं। अब उन्हें अचानक याद आया है कि महाराष्ट्र में नाम के पहले पिता का नाम लगाने की परंपरा है। इसलिए उत्तर प्रदेश के सरकारी कामकाज में अब बाबा साहेब का नाम हो गया है - बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर।
इधर ये उत्सुकता भी जाग रही है कि भला खुद राम नाइक साहब के पिता का नाम उनके नाम के साथ क्यों नहीं है? राम नाईक के पिता का नाम दामोदर नाईक था, लेकिन न तो महामहिम का नाम राम दामोदर नाईक हैं और न ही दामोदर राम नाईक। उन्हें तो शुरू से ही देश राम नाईक के नाम से जानता है। बेहद सीधे, सरल और जमीन से जुड़े राम नाईक।
लेकिन राम नाम की महिमा भी खूब है। खासकर उत्तर प्रदेश में जहां के राज्यपाल नाईक साहब चार साल से हैं। फिलहाल उत्तर प्रदेश में भगवान राम और अयोध्या में राम मंदिर के दावों से बड़ा कुछ नहीं है। अब जब रामनवमी के जुलूस निकलें, हथियार लहराए जाएं और जय श्रीराम के नारों से माहौल गुंजायमान हो जाए और कथित तौर पर दंगे होने लगें तो भला उस माहौल में बाबा साहब सिर्फ बाबा साहब कैसे रह सकते हैं?
इतिहास तलाशा गया तो पता चला कि बाबा साहब के पिता जी तो राम जी थे। मामला कुछ जम गया। तो लीजिए साहब फरमान जारी हो गया – बाबा साहब का नाम अब से बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर होगा। महाराष्ट्र में पिता का नाम तो लगाना वैसे भी जरूरी है, भले ही महामहिम के लिए हो न हो।
कहानी दिलचस्प है। बाबा साहब कोई ऐसे वैसे बाबा नहीं थे। न बाबा रामदेव जैसे, न बाबा राम रहीम जैसे, न ही किसी और सियासी और अंधविश्वासी बाबा जैसे। संविधान निर्माता, दलितों के मसीहा और बहुजन समाज की बात करने वाले बाबा थे डॉ भीमराव अम्बेडकर। अब यूपी का सियासी मिजाज ऐसा है कि यहां दलितों के नाम पर सत्ता के समीकरण बनते बिगड़ते हैं, वोटों का गणित लगाया जाता है और बाबा साहब की अहमियत महाराष्ट्र के साथ-साथ अगर कहीं सबसे ज्यादा है तो वो उत्तर प्रदेश में ही है। और जब बाबा साहब के सियासी गणित में माहिर बुआ-भतीजे एक हो जाएं तो फिर भाजपा जैसी पार्टी क्या करे?
सोचिए फिर राम का ही सहारा लगता है। राम तो सब में हैं। सर्वव्यापी हैं। फिर दलितों के लिए सिर्फ बाबा क्यों, रामजी क्यों नहीं। वैसे भी कांशीराम में भी राम हैं, रामनाथ कोविंद में भी राम हैं, रामगोपाल यादव में भी राम हैं, रामविलास पासवान में भी राम हैं, जीतनराम मांझी में भी राम हैं और जाने कितने नामों में राम ही राम हैं, तो भला बाबा साहब कैसे अछूते रह जाएं। आखिरकार तलाश पूरी हुई और बाबा साहब में भी रामजी मिल गए। राम की महिमा अपरंपार है। वैसे भी राम नाम की लूट है, लूट सके सो लूट।