Rajasthan: सत्ता, अंदरूनी कलह और रार में फंसा राजस्थान, देखिए किधर पलटती है भाजपा और कांग्रेस की बाजी?
वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र व्यास कहते हैं कि जिन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा का टिकट चाहिए, वह चुरू जाएंगे। विधानसभा का घेराव भी करेंगे। लेकिन जिन्हें इसकी परवाह नहीं है, वह वसुंधरा राजे का जन्मदिन मनाएंगे।
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फाग का महीना आ गया है। रण बांकुरों की धरती राजस्थान में इस बार राजनीति का रंग नई ठसक लिए है। क्या भाजपा और क्या कांग्रेस? दोनों ही दलों में 'अपनों' ने ही 'अपनों' के लिए चक्रव्यूह से लेकर कांटे बिछा दिए हैं। भाजपा की नेता, पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता, पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट, दोनों की महत्वाकांक्षा धार पर है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पांच साल का कार्यकाल पूरा करने, पायलट को मुख्यमंत्री न बनने देने के लिए कटिबद्ध हैं। तो दूसरी तरफ केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल, भाजपा के अध्यक्ष सतीश पुनिया समेत भाजपा के कमांडर वसुंधरा राजे के सपने पर पानी फेरने के लिए तैयार हैं। देखिए! किधर बाजी पलटती है।
भाजपा के विधायकों के सामने खड़ा हो गया है असमंजस, इधर जाएं या उधर?
पहले बात वसुंधरा राजे की। दौसा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गए थे। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तरफ देखा तक नहीं। संवाद नहीं हुआ। यह संदेश भाजपा के नेताओं, विधायकों के लिए था। यह ठीक वैसे ही था, जैसे पिछले कई सालों से वसुंधरा राजे राजस्थान भाजपा के कार्यक्रमों में नहीं शरीक होती थीं। जब मुख्यमंत्री थी तो डिजी फेस्ट हो या अन्य सरकारी कार्यक्रम केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल समेत अन्य को कोई भाव नहीं देती थीं। राजस्थान की राजनीति को गहराई से समझने वालों को पता है कि केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल, राजस्थान भाजपा अध्यक्ष सतीश पुनिया समेत अन्य से वसुंधरा राजे कैम्प के नेताओं की एक दूसरे को काटने की लगातार प्रतिस्पर्धा चल रही है। चुरू के राजेन्द्र सिंह राठौड़ बड़े असमंजस में हैं कि 4 मार्च को वह वसुंधरा राजे के जन्मदिन समारोह में शामिल हों या नहीं।
4 मार्च को इधर जाएं या उधर जाएं?
भाजपा के एक विधायक ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि 4 मार्च का वसुंधरा का कार्यक्रम उनका निजी है। वह सालासर में 8 से12 बजे तक पूजा-अर्चना करेंगी, जन्मदिन मनाएंगी और लोगों को संबोधित करेंगी लेकिन इसी दिन प्रदेश भाजपा ने राजस्थान विधानसभा का 11-12 बजे तक के घेराव का आह्वान किया है। सूत्र का कहना है कि यह पार्टी का कार्यक्रम है। इसलिए रहना जरूरी है। जबकि भाजपा के विधायक, पूर्व अध्यक्ष अशोक परनामी पहले चुरू जाएंगे। कालीचरण भी चुरू जाएंगे। यूनुस खान, विधायक प्रताप सिंघवी भी वसुंधरा राजे का जन्मदिन मनाएंगे। इन सभी का कहना है कि पहले वसुंधरा जी का कार्यक्रम तय हुआ था। जो पहले तय हुआ है, उसमें पहले जाएंगे। बाद में पार्टी के विधानसभा कार्यक्रम में जाएंगे। सनद रहे कि सालासर से जयपुर की दूरी 100 किमी से अधिक है। सड़क से यात्रा में कम से कम 3 घंटे लगते हैं। इसलिए जो जयपुर में रुका तो पार्टी के कार्यक्रम में रहेगा और जो चुरू पहुंचा वो वसुंधरा राजे की शान बढ़ाएगा।
यह वसुंधरा का राजनीतिक टेस्ट है?
सच यही है। राजस्थान भाजपा ने मानो दिल्ली का इशारा पाकर और सही समय देखकर वसुंधरा की राजनीतिक ताकत आंकने का खुला निर्णय ले लिया है। वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र व्यास कहते हैं कि जिन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा का टिकट चाहिए, वह चुरू जाएंगे। विधानसभा का घेराव भी करेंगे। लेकिन जिन्हें इसकी परवाह नहीं है, वह वसुंधरा राजे का जन्मदिन मनाएंगे। अशोक परनामी के सचिव मुकेश कहते हैं चुरू में तैयारी जोरदार चल रही है। प्रताप सिंघवी को पूरे राजस्थान से लोगों के आने का भरोसा है। वसुंधरा कैंप के एक और विधायक को उम्मीद है कि कम से कम दो दर्जन विधायक जन्मदिन समारोह मनाकर जयपुर आएंगे। इस बारे में राजस्थान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश पुनिया से कई बार के प्रयास के बाद भी कोई बात नहीं हो पाई। तमाम भाजपा के नेताओं से संपर्क की कोशिश की गई और गिने-चुने ने ही प्रतिक्रिया देना उचित समझा। जयपुर में चर्चा बस केवल एक है। चुरू में कार्यक्रम सफल हुआ तो वसुंधरा की जयकार होगी और दिल्ली तथा जयपुर की भाजपा पर दबाव बढ़ेगा। डेढ़-दो हजार की भीड़ में कार्यक्रम निबटा तो आगे आप समझ सकते हैं। भाजपा के एक नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि वसुंधरा का चेहरा मीडिया का बनाया हुआ है। याद रखिए पार्टी का चेहरा हमेशा उसके किसी भी नेता से बड़ा होता है। सूत्र का कहना है कि इसे हमारी पूर्व मुख्यमंत्री अपने हिसाब से समझती हैं।
कांग्रेस की चिंता - कौन जिताएगा 2023 चुनाव, गहलोत या पायलट?
राजस्थान में कांग्रेस के बड़े नेता सचिन पायलट भी हैं। महत्वाकांक्षा मुख्यमंत्री बनने की है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल, पायलट जैसे नेताओं की गिनती पार्टी के काले घोड़ों में करते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपना कार्यकाल पूरा करने और सचिन पायलट को राज्य का मुख्यमंत्री न बनने देने की लाइन तय कर रखी है। राजस्थान की इस समस्या का कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पास फिलहाल कोई हल नहीं है। इस मुद्दे पर चर्चा करने पर कांग्रेस के प्रभार और वहां की जिम्मेदारी से जुड़े पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की राय अलग-अलग है। सचिन पायलट का खेमा अभी भी कहता है कि अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने रहे तो 2023 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ेगा। जनता की नाराजगी को कम कर पाना मुश्किल होगा। जयपुर की फिजाओं में इस बार राजनीति अपने नये रंग ले रही है। अशोक गहलोत के समर्थक पायलट समर्थकों के दावे को इसी रंग में खारिज कर देते हैं। एक युवा विधायक का कहना है कि सचिन पायलट,ऊर्जावान और जमीनी पकड़ रखने वाले नेता हैं, लेकिन उन्होंने अपने दायरे को बहुत नहीं बढ़ाया। कम से कम मुख्यमंत्री बनने लायक तो बिल्कुल नहीं। जबकि अशोक गहलोत राजस्थान में हर वर्ग, जाति, क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखते हैं और अनुभवी हैं।
भाजपा तो प्रधानमंत्री के चेहरे पर लड़ेगी, कांग्रेस का अभी पता नहीं?
वसुंधरा राजे के समर्थक कहते हैं कि राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री को चेहरा बनाने के बाद 2023 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में पार्टी को शानदार बहुमत मिलना तय है। ऐसा न हुआ तो नतीजा कुछ और होने की संभावना है। वसुंधरा सर्मथकों के इस जवाब के समानांतर भाजपा के नेता कहते हैं कि उनके पास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। वह देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं, उनकी दमदार अंतरराष्ट्रीय छवि है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर पार्टी को न केवल लोकसभा चुनाव में जबरदस्त बहुमत मिलता है, बल्कि राज्यों में भी लगातार सफलता मिल रही है। पार्टी नेताओं के इस तर्क से साफ है कि 2023 में भाजपा राजस्थान विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के चेहरे को प्रमुखता देकर ही उतरेगी।
कांग्रेस पार्टी में 2023 के विधानसभा चुनाव को लेकर तस्वीर बहुत साफ नहीं है। राजस्थान के लिए पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे कोई बड़ा और स्वीकार्य चेहरा नहीं हैं। भावी चेहरे को लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच में राजनीतिक रार फिर देखने में आ सकती है। इस अंदरुनी विरोधाभास पर काबू पाना कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।